भस्मासुरों से कैसे बचोगे पाकिस्तान? पेशावर के स्कूल पर आतंकी हमले में सैकड़ों निरीह छात्रो की मौत..

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तहरीक-ए- पाकिस्तान के पांच तालिबानियों ने दिन मे १२ बजे के आसपास वजीरिस्तान मे आतंकियों के खिलाफ पाक सरकार के सैन्य अभियान का बदला लेने के लिए पेशावर के सैनिक स्कूल पर धावा बोलते हुए अधाधुंध कत्लेआम मे निरीह-मासूम बच्चों को गोलियों से उड़ा दिया…१५०० छात्रों की उपस्थिति वाले इस स्कूल में अंतिम समाचार मिलने तक १०४ बच्चों की मौत हो चुकी थी कई अध्यापक भी हत हुए, सैकड़ों घायल हैं. पांच आतंकियों ने छावनी एरिया में यह दुस्साहसिक काररवाई की. एक आतंकी अंदर दाखिल होते ही खुद को उड़ा चुका था…807564-essa_BW-1418726306-790-640x480
कश्मीर के नाम पर आतंकियों को मुजाहिदीन बताने वाला पाक अब उस स्थिति में आ चुका है जहां शेर अपनी पीठ पर सवार के गिरने का इंतजार कर रहा है…ताकि उसका भोजन कर सके. याद है न भस्मासुर की कहानी… बस यही हाल है पाक का कि जिसे बनाया, वही अब उसी को निशाने पर ले चुका है और भारत विभाजन से जनमा पाक विशुद्ध असफल राष्ट्र में तब्दील हो गया है, यह बेहिचक स्वीकार करना होगा.
आज से ३२ साल पहले मुझे पेशावर जाने का मौका मिला था. कराची से फ्लाइट लगभग दो घंटे की थी. इस दौरान मैं पाक पर्यटन विभाग की ओर से जारी पुस्तिका पढ़ कर बार बार चौंकता रहा. नहीं जानते होंगे दोस्तों आप कि पुष्पपुर का अपभ्रंश है पेशावर. हमे कभी बताया ही नहीं गया था. जी हां, कभी यह इलाका सनातन, बौद्ध और जैन धर्म का मुख्य केंद्र हुआ करता था, जहां विशाल मंदिरों के भग्नावशेष उस समय भी यत्र तत्र देखे जा सकते थे. वेदपाठ के मामले मे पश्चिमोत्तर की काशी कहा जाने वाला सूखे मेवों और किसिम किसिम के पकौड़ों ( चिड़िया के भी ) के लिए सुनाम यह शहर कितनी खुली हवा में सांस लेता था कि वहां के विश्वविद्यालय छात्र संघ की प्रेसीडेंट एक खूबसूरत छात्रा थी…! हम तीन दिनी अभ्यास मैच के दौरान वहां खूब घूमें. कबायली देशों मे एक बाड़े ही नहीं गए बल्कि आधी रात को पाकिस्तानी खुफिया विभाग की मदद से शून्य तापमान के बीच खैबर दर्रे की भी सैर कर आए. रास्ता किस्सा ख्वानी बाजार ( दिलीप कुमार का पुश्तैनी मकान भी यहीं है) से होकर खैबर जाता था. वे चार दिन मानों जन्नत की सैर के नाम थे….३२ साल बाद यही नगर किस कदर जहन्नुम में तब्दील हो चुका है, यह भी भला बताने की जरुरत है ?
पाकिस्तान के आज के हालातों पर दुष्यंत की चंद पंक्तियां याद आ रही हैं – ‘ अब इस शहर में कोई बारात हो या वारदात, किसी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां ‘..कभी अकबर इलाहाबादी ने कितना सही कहा था, ‘जब से नक्शे-जहां में दहशत गर्द हुए पैदा, हिब्लिश ने सोचा हम साहिब-ए-औलाद हो गये’

(वरिष्ठ पत्रकार पदमपति शर्मा की फेसबुक वाल से)

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