ये है मायावती की माया – एक दिन में ही स्थापित हो जाता है नया विश्वविद्यालय

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-शिवनाथ झा।।

शीर्षक पढ़ के चौंकिएगा नहीं. यह सच है मायावती के राज का जहाँ शिक्षा मंत्री “टेलीफोन” पर विश्वविद्यालय की स्थापना का अनुमोदन करते है और सम्बंधित फाइल पर सात आला अधिकारी एक ही दिन में अपना-अपना अनुमोदन देते है तथा उसी दिन विश्वविद्यालय की स्थापना भी हो जाती है.

उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री और प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री शीघ्र ही प्रदेश में कुकुरमुत्तों की तरह खुल रहे निजी विश्वविद्यालय से सम्बंधित एक बहुत बड़े “स्कैम” में फंस सकते है जिसमे प्रदेश के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव के अतिरिक्त कई एक आला अधिकारी “बराबर” के हिस्सेदार होंगे.

भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय से उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर यह प्रकाश में आया है कि “राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् (एआई.सी.टी.इ.) द्वारा के तय मापदंडो का खुलेआम उल्लंघन कर कुकुरमुत्तों कि तरह प्रदेश में निजी विश्वविद्यालय खोलने और शैक्षणिक-सत्र प्रारंभ करने हेतु धड़ले से अनुमति दे रहे हैं. इस कार्य में प्रदेश के राज्यपाल, जो राज्यों में विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति होते हैं, कि “कथित भूमिका” को नजर-अंदाज नहीं किया जा सकता है.”

मानव संसाधन मंत्रालय के एक आला अधिकारी ने कहा कि इस सम्बन्ध में जाँच के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् (ऐ.आई.सी.टी.इ.) को भी लिखा गया है साथ ही उसे यह भी कहा गया है कि पूरे देश में ऐसे खुल रहे सभी निजी नए विश्वविद्यालयों कि “जांच-पड़ताल” कर शीघ्र ही मंत्रालय को रिपोर्ट सौपा जाये ताकि उनके विरुद्ध क़ानूनी कारर्वाई कि जा सके.

आप माने या नहीं लेकिन यह सत्य है की हमारा देश भारत और भारत का सबसे बड़ा सूबा उत्तर प्रदेश निश्चित रूप से वैज्ञानिक-युग के चरम पर पहुँच गया है जहाँ राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री “टेलीफोन” पर किसी विश्व-विद्यालय की स्थापना का अनुमोदन करते है और उसी दिन राज्य प्रमुख सचिव सहित शिक्षा विभाग के सात आला अधिकारी एक विश्वविद्यालय के स्थापना हेतु विधेयक तैयार करने तथा विधायी विभाग से विधिक्षित कराने के सम्बन्ध में प्रस्तावित विधेयक का आलेख तैयार करने हेतु अपनी-अपनी स्वीकृति अनुमोदित करते हैं.

जरा देखिए घटना क्रम को. दिल्ली के दरियागंज स्थित 4460/6, प्रकाश अपार्टमेन्ट पार्ट – 2 से संचालित श्रीमती शकुंतला एजुकेशनल एंड वेल्फेर सोसाइटी को उत्तर प्रदेश शासन   से छह फरवरी, 2008 को गौतमबुद्ध नगर के ग्रेटर नोएडा में निजी क्षेत्र में गलगोटियाज विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु अनुमति प्रदान किया जाता है. आशय पत्र में उल्लिखित शर्तों को पूर्ण किये जाने के सम्बन्ध में जांच-पड़ताल हेतु प्रोफ़ेसर के.एन.त्रिपाठी, जो आगरा विश्वविद्यालय के कुलपति थे, की देख-रेख में बनी एक समिति को अधिकृत किया जाता है. दस टिप्पणियों और आज्ञाओं सहित यह समिति अपनी रिपोर्ट उत्तर प्रदेश शासन को प्रस्तुत करती है.

 

अपने वरिष्ठ अधिकारीयों के अवलोकनार्थ प्रेषित पांच पन्ने के एक नोट में उच्च शिक्षा विभाग के अनु. सचिव श्री सुरजन सिंह लिखते हैं, “इस सम्बन्ध में समिति की उपर्युक्त रिपोर्ट के रिपोर्ट के अवलोकन से यह विदित होता है कि प्रायोजक संस्था द्वारा शासनादेश दिनांक छह फरवरी, 2008 के प्रस्तर – 2.9 के उप-प्रस्तर (3) में वर्णित मानक के अनुसार भवन का निर्माण कार्य पूरा नहीं किया गया है. प्रायोजक संस्था द्वारा प्रस्तुत वचनबद्धता स्टाम्प पेपर पर दी गई है कदाचित यह शपथ पत्र की श्रेणी में नहीं आता है. शासनादेश दिनांक छह फरवरी, 2008 की व्यवस्था के अनुसार….. प्रस्तावित विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु इस शर्त के अधीन विचार किया जा सकता है कि प्रश्नगत संस्था को विश्वविद्यालय आरम्भ करने हेतु वांछित अधिकार पत्र तभी निर्गत किया जायेगा जब मानक के अनुरूप भवन निर्मित होने के पुष्टि कर ली जाएगी.”

 

सिंह आगे लिखते हैं कि : “कृपया समिति द्वारा प्रस्तुत सत्यापन रिपोर्ट से प्रमुख सचिव तथा माननीय उच्च शिक्षा मंत्रीजी को अवगत करते हुए गलगोटियाज विश्वविद्यालय कि स्थापना हेतु विधेयक तैयार करने तथा विधायी विभाग से विधिक्षित कराने के सम्बन्ध में आदेश प्राप्त किये जाने हेतु पत्रावली प्रस्तुत है”

 

इस नोट के मिलते ही मानो विभाग में जैसे खलबली मच गयी हों और उसी दिन शाशन के विशेष सचिव (उच्च शिक्षा) श्री बिमल किशोर गुप्ता, दिनांक २७.१२.२०१० को उस नोट पर जो लिखते है वह उससे भी भयानक है: श्री गुप्ता लिखते हैं: “माननीय उच्च शिक्षा मंत्री जी मुख्यालय से बाहर हैं. समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट से अधोहस्ताक्षरी अवं प्रमुख सचिव द्वारा माननीय मंत्रीजी को दूर-भाष पर अवगत कर दिया गया है. कृपया गलगोटियाज विश्वविद्यालय कि स्थापना हेतु विधेयक तैयार करने तथा विधायी विभाग से विधिक्षित कराने के सम्बन्ध में प्रस्तावित गलगोटियाज विश्वविद्यालय के विधेयक का आलेख्य (अंग्रेजी) विधिक्षित करने हेतु प्रमुख सचिव, विधायी से अनुरोध करना चाहें.” आश्चर्य यह है कि इस नोटिंग के बाद उसी दिन, यानि 27-12-2010 को ही शासन के प्रमुख सचिव सहित सभी अन्य सात आला अधिकारी अपनी-अपनी स्वीकृतियां हस्ताक्षर कर के दे देते हैं.

 

दिनांक 27-12-2010 को जो आपत्ति जताई गई थी उनमें भवन निर्माण और पाठ्यक्रम संचालन एक मुख्य विषय था, जो स्थिति आज भी बरकार है. लेकिन प्रदेश के राज्यपाल किन परिस्थितियों में सिर्फ चार महीनो के अन्दर सभी तथ्यों को दरकिनार कर दिनांक 18 अप्रैल 2011 को पाठ्यक्रम संचालन की अनुमति देते हैं, यह एक जांच का विषय है.

 

शासन के सचिव श्री अवनीश कुमार अवस्थी सोसाइटी के अध्यक्ष श्री सुनील गलगोटिया को लिखते हैं: “अपने शपथ पत्र दिनांक 18-04-2011 का कृपया सन्दर्भ ग्रहण करें जिसके द्वारा गलगोटियाज विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश अधिनियम, 2011 की धारा – 5 के अंतर्गत गलगोटियाज विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोयडा, गौतमबुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश का संचालन शैक्षणिक सत्र 2011-12 से प्रारंभ करने हेतु प्राधिकार पत्र निर्गत किये जाने का अनुरोध किया गया है.”

श्री अवस्थी आगे लिखते हैं: “इस सम्बन्ध में मुझे यह कहने का निर्देश हुआ है कि श्री राज्यपाल महोदय गलगोटियाज विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश अधिनियम 2011 की धारा – 5 में निहित शक्ति का प्रयोग करते हुए गलगोटियाज विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा, गौतमबुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश का संचालन शैक्षणिक सत्र 2011-12 से प्रारंभ करने के हेतु एतद द्वारा अधिकार पत्र निर्गत करने की सहर्ष स्वीकृति प्रदान करते हैं”.

ज्ञातव्य हों कि उत्तर प्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा के प्रमुख सचिव को दिनांक 18-04-2011 को एक सौ रुपये के स्टाम्प पेपर पर गलगोटिया विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा का “शैक्षणिक सत्र 2011-12 के संचालन हेतु” एक शपथ पत्र प्रेषित किया गया था और उसी दिन (18-04-2011 को) पत्र संख्या – 486 / सत्तर – 1-2011-१६ (5)/2010 द्वारा राज्यके सचिव श्री अविनाश कुमार अवस्थी उस शपथ पत्र का जबाब देते लिखते हैं.

दिलचस्प बात यह है कि अभी विश्वविद्यालय का भवन भी नहीं बना, छात्र-छात्राओं को बैठने की जगह भी मुक़र्रर नहीं हुई, पढ़ाई शुरू हुई भी नहीं और कागज पर  दौड़ते सम्बंधित विश्वविद्यालय को राज्य सरकार की ओर से “बेस्ट प्राइवेट युनिवर्सिटी ऑफ़ नॉदर्न इंडिया” का ख़िताब भी मिल जाता है. हाल ही में किसी बेनामी संस्था ने गुड़गांव के एक रेस्टोरेंट में गलगोटिया विश्वविद्यालय को इस खिताब से नवाजा। अब यह तमगा जैसे भी मिला हो, लोगों को लुभाने के लिये यह बुरा भी नहीं है। हालांकि इस बारे में विश्वविद्यालय प्रशासन ने कुछ भी कहने से मना कर दिया है.

बहुत ताक़त है “लक्ष्मी में”- ऐसा लगता है. काश, सरकार, अधिकारी और शिक्षाविद सही मायने में राज्य और देश में शिक्षा के प्रसार-प्रचार में “लक्ष्मी के बिना” इतनी “तत्परता” दिखाते तो देश “कहाँ से कहाँ” होता!

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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16 thoughts on “ये है मायावती की माया – एक दिन में ही स्थापित हो जाता है नया विश्वविद्यालय

  1. पैसे के लोभियों ने शिक्षा को बाजारू औरत बना दिया है , जब चाहे जैसे चाहे अपने अनुसार प्रयोग करते है !
    हमे शर्म आती है ऐसे घटिया लोगो और उनके कर्मो पर ????????

    कफ़न में है लिपटी प्रजातंत्र,
    काला साया है यहाँ पर,
    शाशन कहो या कहो पागलपन
    सब माया है यहाँ पर.

    भ्रष्टाचार,भ्रष्टाचार,भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार .
    भ्रष्टाचार .भ्रष्टाचार .भ्रष्टाचार कहिये .
    जाही विधि रक्खे सरकार ताहि विधि रहिये…

    मुख में हो सुधार नाम भ्रष्टाचार सेवा हाथ में .
    तू अकेला नाहिं प्यारे सारे भ्रष्टाचारी तेरे साथ में .
    विधि का विधान जान हानि लाभ सहिये . …..

    किया विरोध तो फिर जाब नहीं पायेगा .
    होगा प्यारे वही जो सरकार को भायेगा .
    सुधार आशा त्याग भ्रष्ट कर्म करते रहिये…..

    सुधार की डोर सौंप हाथ सरकार के .
    महलों मे राखे चाहे झोंपड़ी मे वास दे .
    धन्यवाद निर्विवाद जय जय कर करीए …..

    आशा एक सरकार से दूजी आशा छोड़ दे .
    नाता एक भ्रष्टाचारी से दूजे नाते तोड़ दे .
    सरकार संग भ्रष्टाचार रंग अंग अंग रंगिये .
    सुधार रस त्याग प्यारे भ्रष्टाचार रस पगिये …..

    भ्रष्टाचार,भ्रष्टाचार,भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार .
    भ्रष्टाचार .भ्रष्टाचार .भ्रष्टाचार कहिये .
    जाही विधि रक्खे सरकार ताहि विधि रहिये…
    जय हिंद जय भारत ,वन्देमातरम
    नरेश कुमार शर्मा
    “आल इंडिया स्टुडेंट्स वैलफेयर काउंसिल”

  2. मायावती अपने नाम के अनुरूप ही मायावी गुणों से भरपूर हैं। उन्हें कानूनों की भी थोड़ी-बहुत समझ है क्योंकि दिल्ली विश्वविद्यालय के लॉ सेंटर से लॉ ग्रेजुएट भी हैं। इसके अलावा, बी.एड की डिग्री भी हैं उनके पास। खैर ये तो हुई उनकी योग्यता या कहिए डिग्री जो उचित लगे। लेकिन एक बात जो सभी पर भारी पड़ती है वो है नेताओं को पैसे से प्यार और इसके लिए वो कोई भी गुनाह करने को तैयार रहते हैं/ रहती हैं। अगर मेहनत या ईमानदारी से ही काम करना होता तो नेता लोग कुछ और ना करते। हर वो काम जिसमें पैसा मिले और थोड़ा-बहुत नाम हो जाए, कहने का अर्थ कि लोगों में चर्चा होती रहे तो ऐसे लोग करने से नहीं हिचकिचाते हैं। कहते हैं कि नेता/अपराधी लोगों में कानून का डर खत्म हो गया है। नेताओं,अपराधियों और लोभी व्यापारियों का यह कुत्सित गठजोड़ देश को कहां ले जाएगा कह नहीं सकते। आजादी के बाद से भारत में किसी भी नेता पर कोई आरोप साबित नहीं हो पाया है और हो भी कैसे जब सारा प्रशासन ही साथ हो तो न्याय की परिभाषा खुद-ब-खुद बदल जाती है। समरथ को नहीं दोष गोसाईं। तुलसी दास जी ने ये पंक्तियां रामचरित मानस में सैकड़ों वर्ष पहले लिखी थीं और ये आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। रही बात चाहे वो मायावती हो या कोई और नेता सब के सब एक ही घाट पर पानी पीते हैं। आज यूं ही नहीं नेताओं से लोगों को घृणा होने लगी है। क्योंकि इंटरनेट और मोबाइल के इस युग में लोगों को हकीकत पता होते देर नहीं लगती। सब जानते हैं लेकिन अकर्मण्यों की तरह सोये रहते हैं। जब आपके पड़ोसी पर अत्याचार हो रहा हो और आप अपनी आंखें मूंद लेते हैं तो समझ लीजिए कि अगला नंबर आपका है। और यह बात हर क्षेत्र में लागू होती है। आज देश की राजनीति, जाति, धर्म, संप्रदाय, प्रांत पर आधारित हैं और यही निकम्मे और चोर नेताओं के लिए तुलसीदल की तरह रामवाण का काम करती है । अपने जाति में दूसरे विपक्षी नेताओं के आरापों पर कहो कि वे हमारी वृद्दि को पसंद नहीं करते हैं। फिर अगड़ों/पिछड़ों/ अनुसूचित जातिओं में बंटे समाज में क्या कहें। बहुत दु:ख होता है यह सब देखकर।

    लेकिन जैसे हर चीज की इंतिहा होती है तो समझ लीजिए कि इनके दिन भी अब पूरे होने को है।
    देर आयत दुरुस्त आयत।

  3. कफ़न में है लिपटी प्रजातंत्र,
    काला साया है यहाँ पर,
    शाशन कहो या कहो पागलपन
    सब माया है यहाँ पर.

  4. ॐ,
    मित्रो ,
    माया की माया निराली/चमत्कारिक है,बह एक क्या हजारो विस्वविस्यलायो को सेकंडो में बना सकती है ,कोई नै बात नहीं है,बैसे भी पूर्ण प्रदेश मफिययो के चंगुल में fasa है ,उदाहरनार्थ लखनऊ राजधानी को ही ले लीजिये जहा कई खली पड़े मकान/प्लाट जबरदस्ती मफिययो द्वारा कब्ज़ा क्र लिया है,पीड़ित लोग थानों/कोर्ट/कचाहेरियो के चक्कर कट रहे ,और पट्बरी/र,इ./तहसीलदार/स.डी.म./अ.डी.म.,थानेदार/आइ.जी./डी.आइ .जी /पुलिस आधीक्षक/आदिक्षक आदि सब आफिसर या तो पैसे ,या मफिययो से डॉ कर कोई कारबाही नहीं कर रहे ,भुक्त भोगी जनता त्रहि२ कर चुप -चाप क्रंदन कर रही है ,मै भी एक भुक्त भोगी बन कर असहाय होकर नेयालाययो की बाट जोह रहा हु,मेरा एक प्लाट.नो.२०७&२०८ अ ,३०००बेर्ग फीट ,जो इन्देर्पुरी कोलोनी ,महारिशी मंदिर विद्यालय,आइ .आइ.म./सीतापुर रोड लखनऊ ,उत्तेर प्रदेश में है जिसे तथाकथित माफिया श्री प्रदीप कुमार पाण्डेय ,जो अपने को एक बड़े मंत्री जो लखनऊ में रहते है युवा है,जीने मान नीय श्री नकुल दुबे जी है का सम्बन्धी बता ता है ,बिल्डर ,बक्सितलब ,लखनऊ ने फ़र्जी रजिस्ट्री कराकर जबरदस्ती कब्ज़ा दिनांक ०१.०७.२०११को मकान पर कब्ज़ा कर लिया ,में thane दार madiyaom श्री सिंह से लेकर,…आइ .जी,डी.आइ.जी,पुलिश आधीक्षक श्री ठाकुर से मिला ,तथा पटवारी/नायब तहसीलदार /स.डी.म./अ.डी.म.से मिला लेकिन डाक के तीन पात ,किसी ने हमारे उपर रहम नहीं किया ,मैंने सबको बड़ी बिनाम्रता से समझाने की कोशिश की मुझे कथित माफिया द्वारा मदियोम थाने परिसर में जान से मरने तथा लखनऊ से तत्काल भागने की धमकी दी गई,किन्तु किसी भी आफिसर ने नहीं सुनी ,और अब नयायालय की शरण में हूँ ,और आगे क्या होता है ,इस्वेर जाने.आज बड़ी हिम्मत करके यह मज़बूरी में लिख रहा हूँ जब उत्तेर प्रदेश माया की महा माया के बारे में आपके लेख को पड़ा ,तोमन नहीं माना ,और सब लोगो के सामने प्रमाण प्रस्तुत करने की कोशिश की ,आप सब से निबेदन है,अन्न्यथा न लेकर हमारे जैसे हजारो भाई /बहनों की तरफ देखने/दिखने का कास्ट करे तो इस भ्रस्त /लुटरे शासन /प्रशासन का पर्दाफाश कर प्रदेश की जनता को सच्चाई से अबगत करा सके ,तो बहुतो को आंशु पोछने का काम कर सकते है| धन्यवाद,वन्देमातरम,जय हिंद.|

  5. @ नीतू : लगता है आपका पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा वास्ता नहीं है नीतू जी.. इस रिपोर्ट में उन्ही इंजीनियरिंग कोलेज वाले गलगोटिया की आने वाली यूनिवर्सिटी यानि विश्व विद्यालय के बारे में बताया गया है की कैसे धांधली कर उन्होंने एक ही दिन में इसका लाइसेंस हासिल कर लिया. कृपया अच्छी तरह पढ़ने के बाद ही कमेन्ट लिखें

  6. hi आपको जब कुछ नही पता हो तो सही न्यूज़ दिया करो. आप जिसे ही न्यूज़ गलत छाप रहे है गलगोटिया ग्रठेर नॉएडा मैं काफी बड़ा engg. कॉलेज है न वो ७-१० साल ओल्ड कॉलेज है… उससे पड़ कर मेरा भाई जॉब भी कर रहा है ..सहरम नही आती आपको …सो सेड सेड सेड /….

    1. नीतूजी, लिखने में हमेशा शब्दों का प्रयोग “सुन्दर” होना चाहिए – यह आपके रहन-सहन, शिक्षा-दीक्षा और संस्कार को दर्शाता है. सभी को पता है वह इंजीनियरिंग कालेज है और आपके भाई वहां से शिक्षा प्राप्त कर नौकरी में हैं. इश्वर उनकी हरेक मुरादें पूरी करे. आपने शायद पूरी खबर नहीं पढ़ी.. यह इंजीनियरिंग कालेज के बारे में है ही नहीं. यह तो विश्वविद्यालय के बारे में है जिसे किस तरह उत्तर प्रदेश में उच्च शिक्षा मंत्री, राज्यपाल और आला अधिकारी कितनी तीव्रता से कागजी कार्रवाई पूरी करते है. काश यह काम अन्य लोगों के साथ भी ऐसे ही करते! आप इस लेख में लगे सभी पत्रों को देखे, पढ़ें. आप बहुत अच्छी महिला हैं, आपको टीका-टिपण्णी करने की पूरी स्वतंत्रता है लेकिन “शब्दों के प्रयोग में बारीकियत होने से मन प्रसन्न हों जाता है-लिखने वाले का भी और पढने वाले का भी.

  7. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से लगातार, बार-बार, इस देश का,खासकर छात्र-छात्राओं का दुर्भाग्य रहा है कि वे हमेशा “प्रयोगशाला” में ही रहे है, जहाँ राजनितिक लाभ उठाने के लिए कुंठित मानसिकता के राजनेता और उनके अधिकारीगन, साथ ही, उन राजनेताओं से लाभ उठाने वाले “तथाकथित शिक्षाविद” शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग करते आये हैं. वर्तमान दसवीं कक्षा तक कि शिक्षा प्रणाली (सी.सी.इ. सिस्टम) एक ज्वलंत उदाहरण है. सरकार भले ही इस बात का दावा करे कि वह शिक्षा का व्यवसायीकरण होने से रोकने के लिए प्रचुर मात्रा में नियम-कानून बनाये है ताकि मध्यम और निम्न वर्ग के परिवार से आने वाले छात्र-छात्राओं को अधिक कीमत पर शिक्षा ना लेना पड़े, परन्तु हकीकत यह है कि शिक्षा के क्षेत्र में प्राइवेट शैक्षणिक संस्थाओं को आने के बाद, जहाँ, ईंट, पठार, सीमेंट, बालू, कच्छा-बनियान, शराब आदि-आदि बेचने वाले इन शैक्षणिक संस्थाओं के मालिक हों, मध्यम और निम्न परिवार के बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा तो एक सपना ही रहेगा. देश को यह तय करना होगा कि कुकुरमुत्तों कि तरह बढ़ रहे ये शैक्षणिक संस्थाएं कहाँ तक न्यायसंगत हैं?

  8. Ye hai maayaawati ki maayaa,,kahi dhoop kahi chhaayaa,,ghotalo ka aisa kehar dhaayaa k,,saayaa v sharmaya,,ki karoge bhaayaa,,ye hai mayawati ki maayaa jisne hai janta ko bharmaya

  9. प्रोफ़ेसर के.एन. त्रिपाठी, जो आगरा विश्वविद्यालय के कुलपति रहने के दौरान गलगोटियाज विश्वविद्यालय बने या नहीं, से सम्बंधित नियमों कि जांच-पड़ताल किये थे, जानकर सूत्रों के अनुसार, आज वे गलगोटियाज विश्वविद्यालय के करता-धर्ता/ सर्वे सर्वा हैं.

  10. मायावती जी और उनके कामकाज के बारे में कहना ही क्या? कभी नेपाल के बारे में सुना था आपने. मुखे कानून छह .. ठीक वैसा ही सबकुछ हो रहा है उत्तरप्रदेश में. माया की महिमा अजीब है. एक दिन तो बरी बात , मैडम चाहें तो एक घंटे में विश्वविद्यालय बनवाकर उसे चालू करा सकती हैं. पता नहीं वहां के ऑफिसर को भ्रसटाचार को लेकर आसन्न अन्ना आंधी का खौफ है भी या नहीं. वैसे इसके लेकाख को मेरी एक नेक सलाह – बच के रहिये वरना आप मनुवादी घोषित किये जा सकते हैं.

  11. बने हैं अहले हवस मुद्दई भी, मुंसिफ भी।
    किसे वकील कहें, किससे मुंसिफी चाहें।।

    मायावती अपने नाम के अनुरूप ही मायावी गुणों से भरपूर हैं। उन्हें कानूनों की भी थोड़ी-बहुत समझ है क्योंकि दिल्ली विश्वविद्यालय के लॉ सेंटर से लॉ ग्रेजुएट भी हैं। इसके अलावा, बी.एड की डिग्री भी हैं उनके पास। खैर ये तो हुई उनकी योग्यता या कहिए डिग्री जो उचित लगे। लेकिन एक बात जो सभी पर भारी पड़ती है वो है नेताओं को पैसे से प्यार और इसके लिए वो कोई भी गुनाह करने को तैयार रहते हैं/ रहती हैं। अगर मेहनत या ईमानदारी से ही काम करना होता तो नेता लोग कुछ और ना करते। हर वो काम जिसमें पैसा मिले और थोड़ा-बहुत नाम हो जाए, कहने का अर्थ कि लोगों में चर्चा होती रहे तो ऐसे लोग करने से नहीं हिचकिचाते हैं। कहते हैं कि नेता/अपराधी लोगों में कानून का डर खत्म हो गया है। नेताओं,अपराधियों और लोभी व्यापारियों का यह कुत्सित गठजोड़ देश को कहां ले जाएगा कह नहीं सकते। आजादी के बाद से भारत में किसी भी नेता पर कोई आरोप साबित नहीं हो पाया है और हो भी कैसे जब सारा प्रशासन ही साथ हो तो न्याय की परिभाषा खुद-ब-खुद बदल जाती है। समरथ को नहीं दोष गोसाईं। तुलसी दास जी ने ये पंक्तियां रामचरित मानस में सैकड़ों वर्ष पहले लिखी थीं और ये आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। रही बात चाहे वो मायावती हो या कोई और नेता सब के सब एक ही घाट पर पानी पीते हैं। आज यूं ही नहीं नेताओं से लोगों को घृणा होने लगी है। क्योंकि इंटरनेट और मोबाइल के इस युग में लोगों को हकीकत पता होते देर नहीं लगती। सब जानते हैं लेकिन अकर्मण्यों की तरह सोये रहते हैं। जब आपके पड़ोसी पर अत्याचार हो रहा हो और आप अपनी आंखें मूंद लेते हैं तो समझ लीजिए कि अगला नंबर आपका है। और यह बात हर क्षेत्र में लागू होती है। आज देश की राजनीति, जाति, धर्म, संप्रदाय, प्रांत पर आधारित हैं और यही निकम्मे और चोर नेताओं के लिए तुलसीदल की तरह रामवाण का काम करती है । अपने जाति में दूसरे विपक्षी नेताओं के आरापों पर कहो कि वे हमारी वृद्दि को पसंद नहीं करते हैं। फिर अगड़ों/पिछड़ों/ अनुसूचित जातिओं में बंटे समाज में क्या कहें। बहुत दु:ख होता है यह सब देखकर।

    लेकिन जैसे हर चीज की इंतिहा होती है तो समझ लीजिए कि इनके दिन भी अब पूरे होने को है।
    देर आयत दुरुस्त आयत।

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