Home खेल न्यूज एक्सप्रेस की कमान अगर प्रसून शुक्ला ने तीन साल पहले संभाली होती..

न्यूज एक्सप्रेस की कमान अगर प्रसून शुक्ला ने तीन साल पहले संभाली होती..

-राकेश त्रिपाठी||

पत्रकारिता में पच्चीस साल का सफर पूरा कर चुका हूं. अखबार से शुरू हुआ ये सफर टेलीविजन और नए दौर की पत्रकारिता यानी वेब जर्नलिज्म से गुजरता हुआ न्यूज एक्सप्रेस चैनल पर आकर ठहरा. ठहरने का मतलब ठहराव नहीं है. ये कह सकते हैं कि जिस तरह आजकल न्यूज चैनलों में बड़ा काम और बड़े धमाकों के नाम पर नए नए बेतुके बदलाव किए जाते हैं वो दौर न्यूज एक्सप्रेस में खत्म हो चुका है. इस लिहाज से ठहराव नहीं बल्कि इसे स्थायित्व कह सकते हैं और इसका पूरा श्रेय जाता है चैनल के सीईओ और एडिटर इन चीफ श्री प्रसून शुक्ला को.prasoon-shukla-news-express

प्रसून शुक्ला को जानना और समझना एक खुशनुमा अहसास है. ठीक वैसे ही जैसे चट्टानों के बीच से निकलती सहस्त्रधारा देख रहे हों या फिर उमस भरी प्रचंड धूप में शीतल हवा का एक झोंका मिल जाए. जिंदादिली और अक्खड़पन, कस्बाई ठेठपन और कारपोरेटी चातुर्य, विद्रोह की भभक और संयम की शीतलता, हैरतअंगेज विरोधाभास … लेकिन गजब का संतुलन है इस व्यक्तित्व में. यही वो अद्भुत समीकरण है जिसने प्रसून जी को मीडिया कंपनी में इतना बड़ा ओहदा दिलाया है. अन्य बड़ी हस्तियों की तरह प्रसून जी को भी कामयाबी के इस पड़ाव तक पहुंचने में इनकी कार्यकुशलता और प्रतिभा, इच्छा-शक्ति और लगनशीलता, ईमानदारी और समर्पण ने साथ दिया. इन्ही गुणों के कायल न्यूज एक्सप्रेस कंपनी के शीर्ष प्रबंधन ने मुश्किल वक्त में एडिटर इन चीफ और सीईओ की जिम्मेदारी सौंपी. नतीजा सबके सामने है. चैनल कंटेंट और टीआरपी के लिहाज से लगातार आगे बढ़ रहा है.

उत्तर प्रदेश के पडरौना जिले में जन्मे प्रसून शुक्ला का बचपन बंजारे की तरह अलग-अलग शहरों में बीता. पिता स्वर्गीय कपिलदेव शुक्ला सरकारी महकमे में कार्यरत थे, उनका तबादला शहर दर शहर होता रहा. लिहाजा प्रसून जी छुटपन में ही यूपी के विभिन्न शहरों की माटी और मिजाज से रु–ब-रु हो लिए. लेकिन जिस शहर को सही मायने में जीया, जिस शहर की कई खट्टी-मिठी यादों की खुशबू एक अजीब सी ताजगी और मस्ती दिलो-दिमाग में घोलती है, वो शहर है बस्ती. स्कूली शिक्षा इसी शहर में हुई. जाहिर है बचपन की मस्ती, कैशौर्य की चेतना और यौवन की संवेदनशीलता बस्ती में ही अंकुरित-पुष्पित हुई. भाई बहनों में आप सबसे छोटे हैं इसलिए घर में सबसे दुलारे. ठाठ-बाठ में कमी थी नहीं. किताबी पढ़ाई से ज्यादा खेलने-कूदने, मौज-मस्ती और दोस्तों के संग धमा-चौकड़ी में ज्यादा समय बीतता था. लेकिन इम्तिहानों में भी अच्छे अंक आते रहे. प्रथम श्रेणी में 12 वीं की परीक्षा पास की और जा पहुंचे लखनऊ विश्वविद्यालय. लखनऊ में आकर करीब से देखा कि किस तरह सियासत और जुर्म की दुनिया का गठबंधन है. किस तरह माफिया का महिमा मंडन होता है. किस तरह ठेकेदारों और अपराधियों को दिग्गज नेताओं का वरदहस्त प्राप्त होता है, धनबल से नेता बनने-बनाने का उपक्रम होता है. प्रसून जी बताते हैं, “जहां मेरे अंदर खुद से लड़ने की जंग चल रही थी, नई परिस्थितियों से सामंजस्य बैठाने की, वहीं दूसरी ओर सत्ता-सियासत की विकृतियों और देश-समाज में फैली असमानता के प्रति आक्रोश भी मन में पल रहा था…”

यहां तक पहुंचने में प्रसून जी उतार-चढ़ाव के कई दौर से गुजरे. संघर्ष के पथरीले रास्तों की चुनौतियों का सामना करना पड़ा तो पिता और बड़े भाई का साया भी वक्त से पहले ही उठ गया. ये सब उस वक्त हुआ जब जवानी की दहलीज पर खड़ा युवा कैरियर के सपने देखता है. चुनौतियां एक के बाद एक इम्तिहान ले रही थीं.
प्रसून जी के भीतर विद्रोह का बीजारोपण उनके छुटपन में ही पड़ गया था जब इनके घर में अखबार की खबरों पर चर्चा होती और देश–समाज के ज्वलंत मुद्दों पर चिंतन और चर्चा होती. उन्हीं दिनों अयोध्या राम मंदिर का मुद्दा बेहद गरमाया हुआ था. मंदिर आंदोलन अपने चरम पर पहुंच गया. राम मंदिर के ताले खुलते ही इसपर सियासत शुरू हो गई. धर्म और राजनीति एक-दूसरे से गूंथते जा रहे थे, अयोध्या और उसके आसपास के इलाकों जैसे बस्ती, गोंडा, बहराइच, गोरखपुर, फैजाबाद, बाराबंकी जैसे शहरों में दहशत और बेचैनी का साया गहराता जा रहा था. कुछ लोग नवयुवकों को नक्सली बनाने, तो कुछ लोग हिन्दू सेना में भर्ती कराने की कोशिशें कर रहे थे तो मुस्लिम दोस्तों से मालूम चला कि उनको मुस्लिम संगठनों की तरफ से ऐसे ही कट्टरवादी संदेश मिल रहे थे. शांति-सुकून इन्हीं संगठनों के पास गिरवी पड़ा था. सबसे बड़ी बात जो अंदर से कचोट रही थी वो थी सरकार की तुष्टिकरण की नीतियों के चलते विश्व के मानचित्र पर भारत की छवि का खराब होना. सही और गलत के बीच की लकीर धुंधली पड़ती जा रही थी. इस माहौल का प्रसून जी की संवेदनशीलता पर गहरा प्रभाव पड़ा.

इसी वक्त प्रसून जी ने पूर्वांचल के ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद की ओर रुख किया. लेकिन यहां भी हालात जस के तस दिखे. एक साल के भीतर ही दिल्ली आ गये. जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में इतिहास से एम. ए. करने का फैसला किया और साथ ही साथ आई.एस.ए की तैयारी करने लगे. स्पैनिश भाषा सीखने की ललक जगी तो वहीं दाखिला भी ले लिया. लेकिन अंदर की संवेदनशीलता राजनीति माहौल को लेकर बेचैन कर रही थी. दिल्ली में कला-संस्कति का माहौल मिला तो लगा वहां कुछ शांति मिलेगी. मंडी हाउस स्थित साहित्य-कला अकादमी, त्रिवेणी कला संगम, एन.एस.डी में होने वाले आयोजनों, चर्चा-गोष्ठियों में दिल रमने लगा. देश–दुनिया के मशहूर चित्रकारों और उनके कला संसार में दिलचस्पी बढ़ने लगी. जामिया परिसर में भी रचनाशील जमायतों की ठीक-ठाक तादाद थी और बौद्धिक चर्चा वहां की दिनचर्या में शामिल थी. इसी दौरान प्रसून जी को पत्रकारिता का सुरुर चढ़ने लगा, लिहाजा पत्रकारिता और जनसंचार के कोर्स में दाखिला ले लिया. मानवाधिकार और सामाजिक दायित्वों को बारीकी से जानने-समझने की ललक काफी समय से थी जो यहां पूरी हुई और मानवाधिकार में पीजी डिप्लोमा का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ.

पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने के साथ ही प्रसून जी ने अपने कैरियर की शुरुआत की जी न्यूज चैनल से. कुछ वर्षों तक काम करने के बाद सहारा टीवी चैनल पहुंचे जहां उन्होंने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई. इसी दौरान वो गेस्ट फैकल्टी के तौर पर मीडिया स्कूलों में पत्रकारों की नई पौध भी तैयार करते रहे. शारदा यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता का पाठ्यक्रम इन्हीं के मार्गदर्शन में तैयार किया गया. पत्रकारिता में इनके योगदान की सराहना करते हुए कई चर्चित मीडिया संस्थानों ऐमिटी यूनिवर्सिटी, जयपुरिया यूनिवर्सिटी और कई दूसरे संस्थानों ने इन्हें सम्मानित किया.

एक सधे पत्रकार के रुप में अपनी पहचान बनाने के बाद प्रसून जी के प्रबंध कौशल ने उन्हें एक नई चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी निभाने का मौका दिया.
न्यूज एक्सप्रेस में इन्होंने ज्वायन तो किया था पॉलिटिकल कोऑर्डिनेटर के रुप में लेकिन जल्दी ही इन्हें एडिटर न्यूज़ ऑपरेशन बना दिया गया . इस अहम जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए इन्होंने न्यूज एक्सप्रेस एमपी, छत्तीसगढ़ चैनल लांच करवाया. इस वक्त तक कंपनी का उच्च प्रबंधन समझ चुका था कि प्रसून शुक्ला की प्रबंधकीय झमताएं कितनी व्यापक हैं.

साई प्रसाद मीडिया ग्रुप अपने विस्तार की खुशी मना रहा था उधर इसके प्रमुख चैनल न्यूज़ एक्सप्रेस की लोकप्रियता का ग्राफ दिनोंदिन गिरता जा रहा था. महत्वाकांक्षी बदलावों का नतीजा सिफर रहा था. कंटेंट में नए प्रयोग को दर्शकों ने नकार दिया था. और चैनल में काम करने वालों के बीच निराशा का माहौल था. टीआरपी शून्य से एक के बीच डूब उतरा रही थी. चैनल कितने दिन चलेगा इसको लेकर अफवाहों का बाजार गर्म था. तमाम कोशिशों के बाद भी जब चैनल अपनी स्थिति मजबूत नहीं कर पाया तो प्रबंधन ने एक बार फिर प्रसून शुक्ला पर दांव खेला. उन्हें प्रोमोशन देकर न्यूज एक्सप्रेस चैनल का सीईओ और एडिटर इन चीफ बना दिया गया.

दूसरों के लिए ये एक पद होता है और इसके साथ जुड़ी प्रतिष्ठा होती है. लेकिन मैंने देखा कि प्रसून जी ने इसे जिम्मेदारी और उससे भी बढ़कर एक चुनौती की तरह लिया. मुझे इस शख्सियत का एक अलग ही पहलू देखने को मिला जब उन्होंने कहा कि हमारी कमिटमेंट संस्था या कंपनी से ही नहीं होती है बल्कि खुद से भी होती है. ये निश्चय कि प्रबंधन ने जिस भरोसे से हमें ये जिम्मेदारी सौंपी है उसमें अपना सौ फीसदी देना है. इस सोच ने न्यूज एक्सप्रेस चैनल की तस्वीर, तकदीर और तदबीर बदल दी. कई दूसरे छोटे चैनलों पर ताला लगते देख निराश हो रहे न्यूज एक्सप्रेस के पत्रकारों को नई रोशनी दिखने लगी. उम्मीद जगी तो जोश जागा और चैनल ने तेजी से अपनी नई पहचान बनानी शुरू कर दी. कंटेंट में भी एक साफ सीधी लकीर खींच दी गई. क्या दिखाना है क्या नहीं दिखाना है. फूहड़पन, शिगूफेबाजी, स्टिंग ऑपरेशन के नाम पर सनसनीखेज दिखने वाली सामग्रियों पर पूरी तरह प्रतिबंध लग गया. सीधी साफ और सही खबरें दर्शकों तक पहुंची तो उसका नतीजा भी दिखा. आज न्यूज एक्सप्रेस की खबरें आम लोगों के साथ दूसरे चैनलों में भी मॉनिटर की जा रही हैं. इन सबका श्रेय श्री प्रसून शुक्ला को जाता है.

तकरीबन तीन दशक के अनुभव से मैं कह सकता हूं कि न्यूज एक्सप्रेस की कमान अगर प्रसून जी ने तीन साल पहले संभाली होती तो आज इसकी कहानी कुछ और ही होती. लेकिन कहते हैं ना… देर आए दुरुस्त आए… देर तो हुई लेकिन न्यूज एक्सप्रेस सफलता की नई कहानी लिख रहा है … प्रसून शुक्ला जी के कुशल नेतृत्व में.

(राकेश त्रिपाठी की फेसबुक वाल से)

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