ओय गुइयाँ, फिर जनता-जनता..

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मोदी लहर ऐसी आयी कि जा ही नहीं रही है! लोकसभा चुनाव में लहर लहराती रही, फिर महाराष्ट्र में लहरी. हरियाणा में लहरी और चौटाला जी साफ़ हो गये. अभी झारखंड में भी विरोधियों के पसीने छुड़ा रही है! तो अब बिहार में क्या होगा? कुछ महीनों बाद वहाँ चुनाव होने हैं. उत्तर प्रदेश में 2017 में चुनाव होंगे. तो दाँव पर हैं नीतीश, लालू और मुलायम के क़िले! अगर ये क़िले इस बार ढह गये तो लालू, नीतीश, मुलायम सबके दिन लद जायेंगे, उन्हें राजनीति फिर कोई मौक़ा दे न दे, कोई कह नहीं सकता. तो अब जान पर बन गयी है, तो इसलिए फिर से जनता टानिक घोटने की तैयारी है..

 

– क़मर वहीद नक़वी||
ओय गुइयाँ, चल फिर खेलें जनता-जनता! तय हो गया है. वही पुरानी चटनी फिर बनेगी. समाजवादी चटनी, जो बार-बार बनती है, और फिर चटपट ही सफ़ाचट भी हो जाती है. चटनी पुरानी होती है, पार्टी नयी होती है. इस बार भी नयी पार्टी बनेगी. सुना है नाम भी तय हो गया है. शायद समाजवादी जनता दल! नाम थोड़ा लम्बा है, हालाँकि पार्टी अपने पहले के संस्करणों से काफ़ी छोटी होगी! नेता के नाम पर इस बार कोई विवाद नहीं लगता. मुलायम सिंह यादव नेता होंगे. वही मुलायम सिंह जो लालू यादव के अड़ंगी मार देने से युनाइटेड फ़्रंट सरकार के प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गये थे! वही मुलायम सिंह और लालू यादव फिर गलबहियाँ डाले घूमने को तैयार हैं! नीतीश कुमार पहले ही अपनी जानी दुश्मनी भुला कर लालू जी का आशीर्वाद ले चुके हैं!hasin sapane

लालू, नीतीश, मुलायम के क़िले
क्या करें? मजबूरी है! अभी ताज़ा मजबूरी का नाम मोदी है! यह जनता खेल तभी शुरू होता है, जब मजबूरी हो या कुरसी लपकने का कोई मौक़ा हो! इधर मजबूरी गयी, उधर पार्टी गयी पानी में! किसी मौक़े ने जोड़ा था, नया मौक़ा तोड़ देता है! तो इस बार मजबूरी भी है और raagdesh-lalu-nitish-mulayam-going-for-Janata-experiment-againमौक़ा भी! मोदी लहर ऐसी आयी कि जा ही नहीं रही है! लोकसभा चुनाव में लहर लहराती रही, फिर महाराष्ट्र में लहरी. हरियाणा में लहरी और चौटाला जी साफ़ हो गये. अभी झारखंड में भी विरोधियों के पसीने छुड़ा रही है! तो अब बिहार में क्या होगा? कुछ महीनों बाद वहाँ चुनाव होने हैं. उत्तर प्रदेश में 2017 में चुनाव होंगे. तो दाँव पर हैं नीतीश, लालू और मुलायम के क़िले! अगर ये क़िले इस बार ढह गये तो लालू, नीतीश, मुलायम सबके दिन लद जायेंगे, उन्हें राजनीति फिर कोई मौक़ा दे न दे, कोई कह नहीं सकता. तो अब जान पर बन गयी है, तो इसलिए फिर से जनता टानिक घोटने की तैयारी है.

तीन बार की जली- भुनी खिचड़ी
सैंतीस साल पहले इन्दिरा गाँधी की इमर्जेन्सी के ख़िलाफ़ पहली बार 1977 में जनता पार्टी बनी थी. तब इन्दिरा मजबूरी थी! एक तरफ़ इन्दिरा, बाक़ी सब इन्दिरा को कैसे हरायें? इसलिए कहीं की ईंट और कहीं का रोड़ा जोड़ कर जनता पार्टी बन गयी. और दो साल में टूट-फूट कर छितर गयी. फिर कुछ साल बाद आया मौक़ा. बोफ़ोर्स में दलाली के आरोप लगे. वीपी सिंह के इर्द-गिर्द फिर जमावड़ा हुआ. लगा कि वीपी के बहाने सत्ता की सीढ़ी मिल जायेगी. मिली भी. फिर फूट-फाट कर सब अपने-अपने तम्बू उठा-उठा अलग हो गये. फिर कुछ साल बाद एक और मौक़ा आया. युनाइटेड फ़्रंट की नौटंकी चली और बीच रास्ते फिर मटकी फूट गयी! अब आज मोदी की मजबूरी है! एक मोदी, बाक़ी सब मोदी के थपेड़ों से अकबकाये हुए!

इसलिए तीन बार की जली-भुनी खिचड़ी अब चौथी बार भी हाँडी पर चढ़ाने की जुगत हो रही है! हालाँकि इस बार तरह-तरह के बाराती नहीं है. सिर्फ़ पाँच पार्टियाँ हैं. पुराने जनता परिवार की. पाँचों क्षेत्रीय पार्टियाँ हैं. अपने-अपने प्रदेशों के बाहर लगभग बेअसर. देवेगौड़ा कर्नाटक के बाहर कोई ज़ोर नहीं रखते, नीतीश कुमार और लालू यादव बिहार के बाहर झुनझुनों की तरह भी बजाये नहीं जा सकते, मुलायम सिंह अपने उत्तर प्रदेश को छोड़ किसी और अखाड़े में ताल ठोकने लायक़ नहीं हैं, ओम प्रकाश चौटाला हरियाणा में ही पिट कर बैठे हैं. तो फिर ये एक-दूसरे के साथ आ कर एक-दूसरे का क्या भला कर सकेंगे कि पाँच पार्टियों का विलय कर नयी पार्टी बनायी जाये! एक नयी राष्ट्रीय पार्टी क्यों? पाँच क्षेत्रीय पार्टियाँ क्यों नहीं? अब तक तो इन क्षेत्रीय पार्टियों को एक साथ आने की ज़रूरत नहीं हुई, और अगर ज़रूरत महसूस हुई भी तो चुनावी गठबन्धन कर भी तो काम चलाया जा सकता था! तो गठबन्धन क्यों नहीं, विलय ही क्यों? राष्ट्रीय पार्टी बन कर क्या मिलेगा? सवाल बस यही है.

मोदी के तरकश में तीन तीर
‘राग देश’ के पाठकों को याद होगा, क़रीब डेढ़ महीने पहले (25 अक्तूबर 2014को) इसी स्तम्भ में लिखा गया था कि ‘अबकी बार क्या क्षेत्रीय दल होंगे साफ़?’ मोदी की विकास मोहिनी ने क्षेत्रीय दलों के तमाम जातीय समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है और क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल को कई राज्यों में तो पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया है. लोगों का मूड अभी राष्ट्रीय विकास, राष्ट्रीय राजनीति की तरफ़ ज़्यादा है. फिर आम तौर पर देश के सभी क्षेत्रीय दल किसी एक नेता के करिश्मे पर चलते रहे हैं. लेकिन मोदी करिश्मे की चकाचौंध में फ़िलहाल सारे क्षेत्रीय करिश्मे अपनी चमक खो चुके हैं. कुल मिला कर क्षेत्रीय दल अब तक जिस आधार पर खड़े थे, वह कई राज्यों में तो काफ़ी हद तक दरक चुका है. लोग विकास को क्षेत्रवाद के ऊपर तरजीह दे रहे हैं. इसलिए क्षेत्रीय दलों के भविष्य पर संकट साफ़ दिख रहा है. जनता परिवार की सभी क्षेत्रीय पार्टियों की राजनीति का एक बड़ा आधार उनका जातीय वोट बैंक भी था. लेकिन मोदी ने विकास के साथ-साथ पिछड़ी जाति का कार्ड खेल कर यहाँ भी गहरी सेंध लगा दी. मोदी के तरकश में अब तीन तीर हैं, विकास, पिछड़ा वर्ग और हिन्दुत्व!

इसलिए, सबसे बड़ा लाभ मुलायम सिंह ऐंड कम्पनी को यही दिखता है कि राष्ट्रीय पार्टी के रूप में अपने आपको बदलने से कम से कम उन्हें आज नकारात्मक समझी जा रही अपनी क्षेत्रीय पहचान से छुटकारा मिलेगा. दूसरे यह कि राष्ट्रीय पहचान का ग़िलाफ़ चढ़ा कर भी जातीय आधार को मज़बूती के साथ बाँधे रखा जा सकता है ताकि मोदी के पिछड़ा कार्ड को अपने जातीय वोट बैंक में घुसपैठ करने से रोका जा सके. साथ ही एक तगड़े सेकुलर विकल्प के नाम पर मुसलिम वोटों का बँटवारा भी काफ़ी हद तक शायद वह रोक पायें. पार्टी के लिए प्रचार करने के लिए धुरन्धर नेताओं की बड़ी फ़ौज भी उपलब्ध हो जायेगी तो बीजेपी के प्रचार अभियान का मुक़ाबला भी पहले से आसान हो जायेगा. गठबन्धन के मुक़ाबले विलय होने से पार्टी नेताओं के अपने-अपने जातीय आधार का जो भी सहारा दूसरे को मिल सकता है, वह दिया जा सकेगा. संसद में विपक्ष की एक बड़ी ताक़त के रूप में भी अपने को पेश किया जा सकेगा.

नीतीश फिर उभर सकते हैं
विलय के पीछे यह सारे कारण तो हैं, कुछ और कारण भी हैं. मुलायम सिंह को पार्टी का नेता घोषित किया गया है. उनकी समाजवादी पार्टी में कोई नेता ऐसा नहीं है, जो मुलायम के बाद पार्टी को सम्भाल सके. अखिलेश को अपनी जैसी धाक जमा लेनी चाहिए थी, वह फ़िलहाल अब तक वैसा नहीं कर पाये हैं. उधर, बिहार में लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल में भी कोई ऐसा नहीं है, जिसके करिश्मे की बदौलत पार्टी दौड़ सके. दूसरी तरफ़, चौटाला और देवेगौड़ा दोनों अपनी सीमाएँ जानते हैं और राष्ट्रीय राजनीति में प्रासंगिक बने रहने के लिए उन्हें इस विलय में कोई नुक़सान नहीं दिखता. मुलायम और लालू की बढ़ती उम्र के कारण नीतीश पार्टी में आसानी से अपने आपको नम्बर दो पर स्थापित कर लेंगे. मोदी-विरोधी होने के साथ-साथ विकास और गवर्नेन्स की अपनी पहचान को भुना कर वह राष्ट्रीय स्तर पर अपने आपको मोदी के ठोस विकल्प के रूप में पेश भी कर सकते हैं.

नयी पार्टी बनाने के पीछे सोच और कारण फ़िलहाल यही नज़र आते हैं. लेकिन मजबूरी, मौक़े की ज़रूरत और जोड़-तोड़ से चिपकायी गयी पार्टियाँ न चल पाती हैं और न जनता में अपनी कोई साख बना पाती हैं. न कार्यक्रम हो, न संकल्प हो और न निष्ठा, तो पार्टी किस ज़मीन पर खड़ी होगी, ख़ास कर तब जबकि सामने तीन तीरों वाला धनुर्धर मोदी हो, जिसने अब तक सारे चुनावी निशाने सही लगाये हैं!

(लोकमत समाचार, 6 दिसम्बर 2014)  राग देश

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