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क्या दिल्ली में दंगों की बुनियाद पर बनेगी नई सरकार..

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-ओम थानवी||

उत्तर प्रदेश में जब चुनाव सर पर थे, वहां दंगे भड़के। धर्म के नाम पर लोगों को डरा कर गोलबंद किया गया। दिल्ली में क्या वही दास्तान दुहराने का इरादा है?bhavana_hindu_mahapanchyat

त्रिलोकपुरी और नंदनगरी के बाद उत्तरी दिल्ली का बवाना क्षेत्र सांप्रदायिक तनाव की चपेट में है। शोक के पर्व मुहर्रम पर ताजियों के रास्ते को लेकर विवाद था, तो मुसलिम समुदाय रास्ता ही बदलने को तैयार हो गया। इसकी जानकारी पुलिस और इलाके के सयानों को दे दी गई। फिर भी रविवार को “महापंचायत” बुलाना क्या जाहिर करता है? उसमें स्थानीय भाजपा विधायक सहित और लोगों ने उत्तेजक भाषण दिए। पता चला है कि यह महापंचायत प्रशासन की अनुमति से आयोजित नहीं की गई। लेकिन प्रशासन को इसकी खबर जरूर थी। प्रशासन ने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया जब ताजियों का रास्ता बदलने का एलान भी हो चुका था?

अहम सवाल यह भी है कि यह महापंचायत क्या बला है? कौन से कानून के तहत ऐसी संस्थाएं सिर उठाती हैं? महापंचायत के लिए बांटे गए एक परचे की भाषा देखिए – जब हिंदू बंटता है तब हिंदू घटता है/उपद्रव के विरोध में चलो बवाना/अवैध शक्ति प्रदर्शन के विरोध में/शांति भंग करने/मुख्य सड़क के यातायात को घंटों भंग करने के विरोध में…। यह लिखित परचा है, जुबानी उद्गारों का क्या मिजाज रहा होगा इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं।

यह देश धर्म-निरपेक्ष है (प्रयोग बहुत रूढ़ हो चुका है, इसलिए पंथ-निरपेक्ष नहीं लिखता)। सब साथ रहते आए हैं। प्रधानमंत्री ने भी सबको साथ लेकर चलने का वादा किया है। इसका असर कम से कम दिल्ली में तो दिखाई दे। सबके अपने पर्व हैं। उन्हें शांति से मनाना और मनाने देना चाहिए। जो पर्व के नाम पर अशांति फैलाता है, वह अपराधी है चाहे किसी धर्म का हो। पर ऐसे तत्त्वों से निपटने का काम शासन-प्रशासन का है, किसी पंचायत-महापंचायत का नहीं। वे तो जितना दूर रहें, उतना ही अच्छा।

(जनसत्ता के संपादक ओम थानवी की फेसबुक वाल से)

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