बिना शिक्षकों के क्या शिक्षा दोगे, इससे बेहतर तो मर जाना है..

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शिक्षकों की मांग को ले कर छात्राओं ने अनिश्चित कालीन हड़ताल शुरू की..

भीम , भीम के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में 700 लड़कियां है और पढ़ाने वाले शिक्षक सिर्फ 4 है .प्रधानाचार्य का पद 10 वर्ष से रिक्त है ,राजनीती विज्ञान के व्याख्याता का पद 17 वर्ष से खाली है ,वहीँ गृह विज्ञान के शिक्षक 13 वर्ष से नहीं है ,हिंदी व्याख्याता के पद पर विगत 10 साल से किसी कि नियुक्ति नहीं हुयी है .विद्यालय में 21 शिक्षक एवं 8 अन्य कर्मचारियों के पद स्वीकृत है ,लेकिन कार्यरत है सिर्फ 9 ,जिसमे भी पढ़ाने वाले महज़ 4 ही है .ऐसे में कैसे पढाई करेगी बालिकायें ?IMG-20141008-WA0025

गौरतलब है कि यहाँ पर पढ़ने वाली ज्यादातर बच्चियां दलित और पिछड़े वर्ग की है ,यहाँ पर सिर्फ 15 बालिकाएं सामान्य वर्ग की है ,जबकि 558 छात्राएं अन्य पिछड़े वर्ग से ,109 दलित ,4 आदिवासी और 5 अल्पसंख्यक समुदाय की है,शायद यह भी एक बड़ी वजह है की इन बालिकाओं की मांग पर कोई भी ध्यान नहीं दे रहा है ,जिस तरह समाज में दलित पिछड़ों की आवाज़ को कोई तव्वजो नहीं दी जाती है ,ठीक वैसे ही इन बालिकाओं को भी वंचना का शिकार होना पड़ रहा है .

भीम की बालिका विद्यालय की ये छात्राएं 2 अक्टूबर से ही आन्दोलनरत है, इन्होने गाँधी जयंती को अपने आन्दोलन के लिए चुना ,हालाँकि छात्राओं के इस शांतिपूर्ण आन्दोलन का यहाँ के एक जनप्रतिनिधि ने आलोचना की है .उनका कहना था कि गाँधी जयंती के दिन स्वच्छ भारत अभियान कि शुरुआत थी , ऐसे दिन को प्रदर्शन के लिए चुनना ठीक नहीं था ,जबकि आन्दोलनकारी लड़कियों का कहना था कि आन्दोलन के लिए गाँधी जयंती से उपयुक्त और क्या दिन हो सकता है ,इसलिए हमने वह दिन ही चुना .

भीम में आन्दोलनरत छात्राओं ने 2 अक्टूबर को ही प्रशासन को चेता दिया था कि अगर 7 अक्टूबर तक उनकी मांग नहीं मानी गयी तो वे 8 से पुन: आन्दोलन करेगी ,चूँकि प्रशासन ने 3 शिक्षक तुरंत लगाने का वायदा किया था ,जिसे पूरा नहीं किया गया ,इससे बालिकाएं और अधिक आक्रोशित हो गयी और उन्होंने आज से अनिश्चितकालीन हड़ताल प्रारम्भ कर दी तथा विद्यालय के मुख्यद्वार पर ताला जड़ दिया और चिलचिलाती धुप की परवाह किये बगैर स्कूल के बाहर धरने पर बैठ गयी .

आज के आन्दोलन की पूरी बागडोर छात्राओं ने संभाली ,वे ही मंच का सञ्चालन कर रही थी और नारे लगा रही थी ,बालिकाओं का कहना था कि उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है ,लड़कों के स्कूल में पर्याप्त शिक्षक है ,जबकि लड़कियों का स्कूल शिक्षकों के लिए तरस रहा है ,विद्यालय में ना तो पढ़ाने के लिए शिक्षक है और ना ही पीने के लिए स्वच्छ पानी की व्यवस्था है ,विभिन्न गांवों से आने वाली छात्राओं का कहना था कि किराया देने के बावजूद भी टेक्सी वाले उन्हें बिठा कर नहीं लाते है ,प्रशासन से कई बार बस की व्यवस्था करने की मांग की गयी है लेकिन हमारी सुनवाई नहीं की जाती है, लड़कियों ने पूंछा के क्या यह लेंगिंक भेदभाव नहीं है ?

एक छात्रा संध्या खेरालिया ने बताया कि उसके पिताजी की मृत्यु हो चुकी है और माँ मेहनत मजदूरी करके उसे यह सोच कर पढ़ा रही है कि उसकी बेटी पढ़ लिख कर कुछ बनेगी .लेकिन हमारे विद्यालय में तो कोई पढ़ाने वाला ही नहीं है , मैं कैसे पढ़ पाऊँगी ?

आज दर्जनों ऐसी छात्राओं ने अपनी व्यथा सुनाई कि उनके पिता की मृत्यु हो चुकी है और माँ बहुत मुश्किल से उन्हें पढ़ा रही है .ऐसी भी छात्राएं थी जो 40 किलोमीटर दूर से आती है लेकिन पढाई के नाम पर 6 घंटे की बर्बादी ही होती है ,छात्राओं का नारा था –हम दूर दूर से आती है और आ कर वापस जाती है .मतलब यह कि पढाई के नाम पर कुछ होता नहीं है .

उंडा वासन गाँव की ललिता जो कि कक्षा 12 की विद्यार्थी है ,उसने बताया कि वह स्कूल आने के लिए हर दिन 5 किलोमीटर पैदल चलती है,अक्सर वह समय पर नहीं पंहुच पाती है .ललिता के मुताबिक वह अपने गाँव की अकेली लड़की है जो 12 वी कक्षा तक पंहुच पायी है .अगर मुझे भी शिक्षा पूरी नहीं मिल पायी तो मैं अपने गाँव की अन्य लड़कियों को क्या प्रेरणा दूंगी ?

संतोष रैगर नामक छात्रा जो कि कक्षा 11 की विद्यार्थी है उसने बताया कि –मैं कक्षा 9 से ही यहाँ पर पढ़ रही हूँ ,पर यहाँ पर कोई अध्यापक ही नहीं है , फिर भी हम यहाँ पढ़ रहे हैं , ज्यादातर कक्षाओं में मॉनिटर ही कक्षा को संभालते है ,जिससे हमारा परिणाम कमजोर रहता है , गत वर्ष भी विद्यालय का परीक्षा परिणाम मात्र 40 प्रतिशत रहा है .इसी प्रकार की सैंकड़ों कहानियां आज बालिकाओं ने मंच पर आ कर सुनाई .

आन्दोलनरत बालिकाओं ने आज साफ शब्दों में प्रशासन को चेताया कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गयी तो वे सड़को पर अपना आन्दोलन जारी रखेगी , बाद में शाम 4 बजे एक रैली के रूप में सभी छात्राएं उपखंड अधिकारी के कार्यालय पर पंहुची तथा उन्होंने पुन :एक लिखित ज्ञापन सौंपा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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