टीम अण्णा की दुकान पर दो-तरफ़ा खतरा मंडराया – सुरेश चिपलूनकर

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– सुरेश चिपलूनकर||

बड़ी मेहनत से NGO वादियों ने अण्णा को “मोहरा” बनाकर, मीडिया का भरपूर उपयोग करके, अपने NGOs के नेटवर्क के जरिये एक खिचड़ी पकाई, उसमें मैगसेसे पुरस्कार विजेताओं वाला “तड़का” भी लगाया। दुकान खोलकर बैठे ही थे, बोहनी भी नहीं हुई और दोतरफ़ा मुसीबत का सामना शुरु हो गया है…

टीम अण्णा की पहली मुसीबत आई आडवाणी द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ़ “रथयात्रा” की घोषणा से। यानी जो “माल” NGO गैंग ने अपनी “दुकान” पर सजाकर रखा था, वही माल एक “स्थापित दुकान” पर आ गया तो चुनौती मिलने की तगड़ी सम्भावना दिखने लगी। रथयात्रा की घोषणा भर से टीम अण्णा ऐसी बिफ़री है कि ऊलजलूल बयानों का दौर शुरु हो गया…मानो भ्रष्टाचार से लड़ना सिर्फ़ टीम अण्णा की “बपौती” हो। कल अण्णा साहब “टाइम्स नाऊ” पर फ़रमा रहे थे कि हम “ईमानदार” लोगों का साथ देंगे।

हम अण्णा जी से पूछना चाहते हैं कि – हवाला डायरी में नाम आने भर से इस्तीफ़ा देने और जब तक मामला नहीं सुलझता तब तक संसद न जाने की घोषणा और अमल करने वाले आडवाणी क्या “ईमानदार” नहीं हैं? फ़िर उनकी रथयात्रा की घोषणा से इतना बिदकने की क्या जरुरत है? क्या उमा भारती पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप है? फ़िर टीम अण्णा ने उन्हें अपने मंच से क्यों धकियाया?

टीम अण्णा की “अधपकी खीर” में दूसरा चम्मच पड़ा है दलित संगठनों का…

दरअसल टीम अण्णा चाहती है कि 11 सदस्यीय लोकपाल समिति में “आरक्षण” ना हो…। अर्थात टीम अण्णा चाहती है कि जिसे “सिविल सोसायटी” मान्यता प्रदान करे, ऐसे व्यक्ति ही लोकपाल समिति के सदस्य बनें। जबकि ऐसा करना सम्भव नहीं है, क्योंकि ऐसी कोई भी सरकारी संस्था जिसमें एक से अधिक पद हों वहाँ आरक्षण लागू तो होगा ही। टीम अण्णा के इस बयान का दलित संगठनों एवं कई क्षेत्रीय दलों के नेताओं ने विरोध किया है और कहा है कि 11 सदस्यीय जनलोकपाल टीम में SC भी होंगे, ST भी होंगे, पिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदाय का एक-एक सदस्य भी होगा… यानी मैगसेसे पुरस्कार विजेताओं वाली शर्त की “गई भैंस पानी में…”।

तात्पर्य यह है कि “टीम अण्णा” की दुकान जमने से पहले ही उखड़ने का खतरा मंडराने लगा है, इसीलिए कल केजरीवाल साहब “वन्देमातरम” के नारे पर सवाल पूछने वाले पत्रकार पर ही भड़क लिए। असल में टीम अण्णा चाहती है कि हर कोई उनसे “ईमानदारी” का सर्टीफ़िकेट लेकर ही रथयात्रा करे, उनके मंच पर चढ़े, उनसे पूछकर ही वन्देमातरम कहे… जबकि टीम अण्णा चाहे, तो अपनी मर्जी से संसद को गरियाए, एक लाइन से सभी नेताओं को बिकाऊ कहे… लेकिन कोई इन “स्वयंभू सिविलियनों” से सवाल न करे, कोई आलोचना न करे।

टीम अण्णा द्वारा यह सारी कवायद इसलिये की जा रही है कि उन्होंने जो “ईमानदारी ब्राण्ड का तेल-साबुन” बनाया है, उसका मार्केट शेयर कोई और न हथिया सके…।

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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6 thoughts on “टीम अण्णा की दुकान पर दो-तरफ़ा खतरा मंडराया – सुरेश चिपलूनकर

  1. अब अन्ना देश को सर्टिफिकेट देंगे की कौन भ्रष्ट है और कौन नहीं.
    अन्ना के बयानों से लगता है की उनकी मेहनत की फसल अनत: कोंग्रेस ही काटेगी.
    कोंग्रेसियो से फटकार और लानत-मलानत झेलने के बाद भी अन्ना कोंग्रेस के प्रति सोफ्ट हैं.
    दूसरी तरफ भाजपा, संघ परिवार, बाबा रामदेव आदि से बिना शर्त सहयोग पाने के बावजूद अन्ना उन्हें कोस रहे हैं!!
    क्या यही है अन्ना का ‘गांधीवादी’ चेहरा या ‘मोहरा’??

  2. “गाँधीवादी” श्री अन्नाहजारे जी को कल एक टी. वी. चैनल से कहते देखा “मनमोहन सिंह बड़े अच्छे है” “सोनिया गाँधी बड़ी अच्छी है” “कांग्रेस में सभी बड़े अच्छे है” कुछ लोगो से उन्हें सिकायत है जैसे दिग्बिजय सिंह “वो भी बड़े अच्छे थे साथ में वर्षो काम भी किये अब न जाने क्या हो गया है” हाँ ये अलग बात है की “चेहरे की मुस्कराहट और आँखों का संतोष बिना शब्दों के दिग्बिजय, कपिल, तिवारी, जैसे लोगो को अपनी टी. आर. पि. बढ़ाने के लिये सहृदय धन्यवाद और “कांग्रेस कि विजय” के लिए आशीर्वाद दे रहा था” ख़ैर आगे अपने ब्याख्यान में बुरे लोगो के बारे में भी प्रकाश डालते हुए कहा “अडवाणी को रथयात्रा कि क्या जरुरत है लोकपाल बिल बनवा देते” चुटकी लेते हुए इस बात को तो बस जुमले कि तरह इस्तेमाल किया सिर्फ अगले बुरे आदमी “बाबा रामदेव” पर प्रहार करने के लिए “मैने तो बाबारामदेव से उसी दिन फोन करके रिश्ता तोड़ लिया था जिसदिन अपनी सेना बनाने कि बात बोली थी” ख़ैर “गाँधीवादी” श्री अन्नाहजारे जी आपने बहुत अच्छा किया रालेगावं से जिस बिचारधारा (आदमी) कि ऊँगली पकड़ कर दिल्ली तक आये थे उसे दिल्ली से उठवा कर हरिद्वार फेकवा दिया बहुत अच्छा किया, अगर आप एसा न करते तो इतिहास अधुरा रह जाता, कहते है दोस्त का दुसमन कभी दोस्त नहीं होता और बाबा रामदेव ने तो आपके कुनबे से ही दुश्मनी कर ली, कोई बात नहीं “गाँधीवादी” श्री अन्नाहजारे जी अब तो ये देश ही तय करेगा कि उसे २०१४ में वर्णशंकर के “युवराज” की ताजपोशी एक “गाँधीवादी” के हाथो देखना मंजूर है या एक कर्मबीर, समग्र बिकास, सम्पूर्ण स्वतंत्रता, के पथ पर अग्रसर बाबा रामदेव जी जैसे के साथ अपने उचित हक़ के लिए लड़ना

  3. टीम अन्ना के सदस्यों पर इतने आरोप हैं कि अब टीम अन्ना निष्ठा साबित करने के लिए पूरी तैयारी कर रही है.
    कुछ सवाल पिछले कुछ दिन से मुझे परेशान करने लगे हैं। अखबारों, समाचार चैनलों और सूचना के अन्‍य माध्‍यमों के इतर नेट पर मैंने कुछ सवाल देखे, वह विचलित कर देने वाले लगते हैं, हालांकि अब भी मैं अन्‍ना और उनकी टीम को संदेह के घेरे में नहीं लेता, पर कहीं भविष्‍य में यह नूरा कुश्‍ती सिद्ध हुई तो सवा अरब भारतियों के साथ मैं भी गहरे अवसाद में चला जाउंगा। हो सकता है खुद ही भ्रष्‍टाचार के नए कीर्तीमान स्‍थापित करने लगूं। मेरा ईश्‍वर मुझे इसकी अनुमति नहीं देता, पर गीता में कृष्‍ण यह कहकर कि ‘विवेक के अनुसार जो सही है वही सही है’ मुझे भ्रष्‍टाचार का रास्‍ता अपनाने का विवेक दे देते हैं।

  4. अन्ना और टीम अन्ना पर इस तरह के सवाल खड़े कर उन्हें कठघरे में खड़ा करने की आपकी मंशा को मैं तो नहीं जानता पर यह सवाल सबसे बड़ा है कि क्या आम आदमी वर्तमान राजनीतिज्ञों को ईमानदार मानता है? जबाब किसी आम आदमी से पूछ कर देखिएगा?

    सच ही कहा गया कि राजनीति तर्के के आधार पर होती है….

  5. टीम अन्ना और अन्ना का आज हर देशवासी सम्मान करता है पर आडवानी जी पर ऊँगली उठाना गलत है ! इतने लम्बे राजेनेतिक जीवन में इतनी साफ़ छवि का व्यक्ति किसी भी पार्टी में मिलना मुस्किल है !

    1. अभी पिछले लोक सभा में ही अडवाणी संसद में दिखाई दिए थे. अन्ना के कहने से कोई इमानदार नहीं होगा. अडवाणी वाला सवाल फिजूल है. ये अडवाणी को खुद साबित करना होगा. इसके लिए जन लोकपाल चाहिए. अगर अडवाणी इमानदार हैं तो गुजरात में लोकपाल आयुक्त की नियुक्ति से उन्हें क्यों ऐतराज है? वैसे इस तरह अन्ना पे सवाल उठाने की बजाये हम उनकी मुहीम को जो की सभी मानते है सही है उसका साथ दें. बाकी सब को क्या मिलेगा ये सोचकर जो हमें मिलने वाला है उसे ना खोएं.

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