ऑटो रिक्शा की सवारी भी महंगी है मंगलयान से..

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नई दिल्ली, अंतरिक्ष में तिरंगे की शान बढ़ाने वाले देश के पहले अंतरग्रहीय मिशन मंगलयान पर कुल चार अरब 50 करोड़ रुपए का खर्च आया. जो प्रति किलोमीटर के हिसाब से ऑटो की सवारी से भी कम बैठता है. मंगलयान करीब 67 करोड़ किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद अपने गंतव्य पर पहुंचा.24time4

इस तरह प्रति किलोमीटर इसकी लागत करीब सात रुपए है. दिल्ली में प्रति किलोमीटर ऑटो का किराया आठ रुपए है, जबकि मुंबई में यह लगभग दस रुपए प्रति किलोमीटर है. मंगलयान का वजन करीब 1350 किलोग्राम है. जो एक छोटी कार के वजन के बराबर है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मंगलयान के किफायती होने की चर्चा करते हुए कहा था कि हालीवुड फिल्म ‘ग्रेविटी’ को बनाने में जितना खर्च आया था उससे कम में मंगलयान अपनी मंजिल पर पहुंच गया. मंगलयान के अपने लक्ष्य पर पहुंचने के साथ ही सोशल मीडिया पर इस बारे में टिप्पणियों की बाढ़ आ गई.

ट्वीटर पर हर कोई अपने तरीके से इसके विश्लेषण में लगा हुआ है. एक ट्वीट है कि पूरे मंगलयान ऑपरेशन की लागत है. 450 करोड़ रुपए और कुल 67 करोड़ किलोमीटर की यात्रा के लिए सात रुपए प्रति किलोमीटर का खर्च हो रहा है. यानी ऑटोवालों के किराए से भी कम.

एक शख्स ने लिखा है कि मंगलयान पर 450 करोड़ रुपये की लागत आई है. यह खर्च उद्योगपति मुकेश अंबानी के घर एंटीलिया का सिर्फ दसवां भाग है. एक और ट्वीट में कहा गया है कि मंगल मिशन पर 450 करोड़ रुपये खर्च किए जबकि दीपावली पर भारत में पांच हजार करोड़ रुपए के पटाखे चला दिए जाते हैं.

एक ट्वीट में दावा किया गया है कि 2004 से प्रधानमंत्री के विदेश दौरों पर 640 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं, जबकि सरदार पटेल की मूर्ति बनाने में 2500 करोड़ रुपए खर्च होंगे. इसकी तुलना में मंगलयान का खर्च बहुत कम है, जबकि इस मिशन ने अंतरिक्ष विज्ञान में भारत को विशिष्ट क्लब में पहुंचा दिया है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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