मैं शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा दे देता..

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-डॉ.वीरेंद्र बर्तवाल।।

उत्तराखंड के शिक्षा मंत्री, मंत्री प्रसाद नैथानी जी ने बारहवीं तक हिंदी विषय की अनिवार्यता समाप्त कर दी, लेकिन स्कूलों का हाल देखिए कि शिक्षकों को अंग्रेजी में ‘उत्तराखंड’ लिखना नहीं आ रहा है । काशीपुर में प्राथमिक विद्यालयों के दो शिक्षकों को एसडीएम ने कहा कि अंग्रेजी में ‘उत्तराखंड’ लिखें तो उन्होंने वर्तनी यानी स्पेलिंग गलत लिखी । इन गुरुओं के शिष्यों का क्या हाल होगा, आप अनुमान लगा सकते हैं ।14-268x300

मंत्री प्रसाद जी को जमीन से जुड़ा, पहाड़ की परिस्थितियों से भली भांति वाकिफ माना जाता है । वे उच्च शिक्षित हैं । करीब ढाई साल पहले जब उन्हें शिक्षा महकमा मिला तो लगा था कि अवश्य यहां के सरकारी स्कूलों के दिन बहुरेंगे और उनमें पढ़ने वाले “गरीब नौनिहालों” का भविष्य उज्ज्चल होगा, लेकिन ये उम्मीदें धराशायी हो गईं । आज अनेक शिक्षक बेलगाम हैं, उन्हें नेतागीरी से फुर्सत नहीं । कई स्कूलों में शिक्षक ही नहीं, कहीं शिक्षक हैं तो छात्र नहीं । कई स्कूल बंद होने के कगार पर हैं और हमारे बेरोजगार बीटीसी—बीएड कर शिक्षक बनने के सपनों को सींच रहे हैं ।

सबसे अधिक रोजगार देने वाला शिक्षा विभाग आज सबसे अधिक बीमार है । मोटी तनख्वाह पाकर अपने व्यवसाय के प्रति हीलाहवाली करने वाले कुछ शिक्षक अपने परिवार के साथ भी धोखा कर रहे हैं । अपने बच्चों को पब्लिक—कान्वेंट स्कूलों में पढ़ा रहे अनेक गैर जिम्मेदार शिक्षकों को ही जब सरकारी स्कूलों की शिक्षा पर भरोसा नहीं तो एक होटल के वेटर और किसान को क्यों होगा ? वह भी अंग्रेजी स्कूलों की तरफ ही भागेगा ।
उत्तर प्रदेश के समय की तुलना में यहां शिक्षा महकमे में अफसरों की भारी भीड़ है, लेकिन परिणाम शून्य । यानि काम लेने वाला सही काम नहीं ले रहा । मुझे तो लगता नहीं कि इन ढाई सालों में मंत्री प्रसाद जी के खाते में इस विभाग की दशा सुधारने को लेकर कोई उपलब्धि होगी ? पाठकों को नजर आयें तो वे जरुर बतायें !

सच कहूं, इन हालातों में अगर मैं उत्तराखंड का शिक्षा मंत्री होता और मेरे राज्य के सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को अंग्रेजी में “उत्तराखंड” लिखना नहीं आता तो मैं पद से इस्तीफा दे देता, अब मंत्री जी क्या करते हैं, वही जानें ।

शिक्षा विभाग की वर्तमान दुर्गति पर एक गीत याद आ रहा है…
चुप रा छोरौं हल्ला नि करा,
मंत्रि दिदा सेणू च,
उत्तराखंड कू विकास घोसणा मा होणू च…
आओ हम भी शिक्षक नेताओं के साथ धरना-धरना खेले, आखिर निदेशालय-सचिवालय इसीलिए तो है ? साथ ही सलाम है उन रचनात्मक शिक्षकों के कर्म को जो तमाम बाधाओं और हतोत्साहित करने वाले अराजक तथा विपरीत माहोल में आज भी उम्मीदों को ज़िंदा रखे हुए हैं, जिन तक मंत्री जी और आला अधिकारियों की नजर कभी नहीं पहुँचती !

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