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अमिलिया में आयोजित होने वाले ग्राम सभा से पहले उठने लगे कई सवाल..

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विवादों में घिरे महान कोल ब्लॉक को महान जंगल क्षेत्र आवंटित करने के प्रयास के तहत प्रशासन ने एक बार फिर से अमिलिया में नया ग्राम सभा करवाने का फैसला किया है लेकिन इस ग्राम सभा से पहले ही कई सवाल उठने लगे हैं. पिछले साल 6 मार्च 2013 को महान कोल लिमिटेड को महान जंगल आवंटित करने के लिये वनाधिकार कानून 2006 पर विशेष ग्राम सभा का आयोजन अमिलिया में किया गया था. इसी ग्राम सभा के आधार पर महान कोल लिमिटेड को वन व पर्यावरण मंत्रालय की तरफ से दूसरे चरण की पर्यावरणीय मंजूरी भी दे दी गई थी लेकिन आरटीआई के तहत मिले उक्त ग्राम सभा में पारित प्रस्ताव की कॉपी देखने पर कुछ और ही कहानी सामने आई. उक्त ग्राम सभा में सिर्फ 184 लोग उपस्थित थे लेकिन पारित प्रस्ताव में 1125 लोगों के द्वारा हस्ताक्षर दिखाया गया था, इन हस्ताक्षरित नामों में 9 लोग ऐसे थे जो सालों पहले मर चुके थे, वहीं दो लोग उस समय जेल में भी थे.save mahan forest

मीडिया ने उठाया था मामला, नहीं हुई अब तक कोई कार्रवाई
फर्जी ग्राम सभा की बाबत मीडिया ने खबर प्रकाशित की थी. साथ ही, कई सामाजिक संगठनों ने भी इस मामले को जोर-शोर से उठाया था. फरवरी में स्थानीय ग्रामीणों ने इस संबंध में माड़ा थाना में शिकायत भी दर्ज करवाया था, लेकिन काफी दिनों तक इस शिकायत पर एफआईआर भ दर्ज नहीं हो सका. इसके बाद महान संघर्ष समिति ने जबलपुर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जहां से कोर्ट ने एफआईआर न होने पर एसपी से जवाब तलब किया था. मामले को तूल पकड़ता देख जिला प्रशासन ने फिर से ग्राम सभा करवाने का निर्णय ले लिया लेकिन फर्जी ग्राम सभा में शामिल किसी अधिकारी-कर्मचारी पर अबतक कोई कार्रवायी नहीं की जा सकी है. इस फर्जी ग्राम के प्रस्ताव को सरपंच अमिलिया, सचिव अमिलिया, ग्राम रोजगार सहायक अमिलिया, पटवारी, पटवारी हल्का अमिलिया नं. 7, ग्राम पंचायक चौरा, चौकी प्रभारी, बंधौरा, आरपी सिंह राजस्व अधिकारी अमिलिया तथा विवेक गुप्ता, तहसीलदार माडा एवं प्रभारी अधिकारी विशेष ग्राम सभा सहित अन्य अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा प्रतिहस्ताक्षारित किया गया है.

दूसरी तरफ दूसरे चरण की पर्यावरण मंजूरी पर भी सवाल उठने लगे हैं. यदि यह मंजूरी फर्जी ग्राम सभा के आधार पर दी गयी है तो क्या वन व पर्यावरण मंत्रालय इस मंजूरी को रद्द कर सकता है.

सिर्फ अमिलिया ही क्यों?
प्रशासन ने अमिलिया में ग्राम सभा करवाने का फैसला किया है जबकि कोयला परियोजना से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से 54 गांवों के लोगों की जीविका प्रभावित होगी ऐसे में क्षेत्र के दूसरे ग्रामीण असमंजस की स्थिति में हैं. उनका कहना है कि महान जंगल में वो सदियों से अपनी जीविका के लिए निर्भर रहे हैं लेकिन आज प्रशासन सिर्फ अमिलिया वालों से जंगल के भविष्य का निर्णय करवा रहा है.

वनाधिकार कानून पर स्थिति स्पष्ट नहीं
वनाधिकार कानून 2006 के तहत प्रस्तावित ग्राम सभा से पहले स्थानीय जंगलवासियों को सामुदायिक वनाधिकार दिया जाना जरुरी है लेकिन अमिलिया सहित दूसरे गांवों में वनाधिकार को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है. एक तरफ प्रशासन के अनुसार अमिलिया में सामुदायिक वनाधिकार की प्रक्रिया पूरी हो गई है वहीं दूसरी तरफ महान संघर्ष समिति का आरोप है कि अभी तक किसी भी ग्रामीण को वनाधिकार का पट्टा नहीं दिया गया है. अगर प्रशासन की बात सच भी है तो जानकार बताते हैं कि परियोजना से 54 गांव प्रभावित होंगे फिर सिर्फ अमिलिया में वनाधिकार की प्रक्रिया पूरी करने की बजाय 54 गांवों में यह प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए इसके बाद ग्राम सभा का आयोजन करवा कर इन गांवों से जंगल पर निर्णय लिया जाना चाहिए.

फिलहाल नया ग्राम सभा की घोषणा करने वाले जिला कलेक्टर एम सेलेवेन्द्रन का तबादला हो चुका है और बहुत कुछ नये जिला कलेक्टर पर निर्भर करेगा, जिन्होंने अभी-अभी कमान अपने हाथ में ली है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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