खोने की जरूरत कहाँ? लोकतांत्रिक अधिकार छीन रही है सरकार!

admin
Read Time:6 Minute, 53 Second

मीडिया दरबार आलेख प्रतियोगिता के तहत प्रकाशित:-

राजीव रंजन प्रसाद – यह बुरा समय है। दिन स्याह और रात खौफनाक। सरकार लोकतांत्रिक अधिकार का ज़िबह कर रही है; लेकिन हमारी दिलफेर पीढ़ी सिनेमा ‘रेड्डी’ देखती हुई कहकहा लगा रही है। जनहित के संवेदनशील मुद्दे को ले कर छेड़े गए इस आन्दोलन का रूख या फिर हश्र क्या होगा? यह सवाल देशकाल की परिधि में ठोस एवं वस्तुपरक चिन्तन की मांग करता है। आलोचना जरूरी है, बशर्ते वह अपने स्वार्थ और मकसद में सोद्देश्यपूर्ण हो। बाबा रामदेव राजनीति कर रहे हैं; ऐसा कहने वाले भी कम नहीं हैं। मेरी स्थिति भिन्न है। कई नीतिगत, मूल्यगत और वैचारिक असहमति के बावजूद मैं बाबा रामदेव के साथ हँू। उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन मन को पीर देता है। योगगुरु बाबा रामदेव को योगासन सिखाने की सीख देने वाले, यह क्यों भूल रहे हैं कि बाबा के चरणों में लोटने वालों में उनका नाम भी अग्रिम पंक्ति में है। जनाधार खो चुके माननीय लालू प्रसाद यादव के बातों का आधार क्या है? पिछली इतिहास के पन्नों का पड़ताल करके ही जाना जा सकता है। बाबा के समर्थन में उन्होंने कुछ साल पहले जो स्तुतिगान गाये थे; वे हकीकत ही थे न कि फ़साना।

जनता की निगाहों में गिर चुकी सरकार में थोड़ी भी गैरत शेष नहीं बची है।
यह वही सरकार है जिसकी आलाकमान पिछले महीने गाजीपुर के इचवल में मुक्ति कुटीर का लोकार्पण करती हैं। शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानन्द सरस्वती के निकट माथा टेकती हैं; साथ ही उन्हें ‘स्वातन्य वीरोत्तम सम्मान’ से अलंकृत करती है। बाबा रामदेव क्या उस संत-परम्परा के संवाहक नहीं है? क्या उनके विचारों में राष्ट्रीय सौहार्द बिगाड़ने वाला रंजक-भंजक तत्त्व विद्यमान हैं? क्या उनकी वजह से देश के सम्मुख ऐसी समस्या आन खड़ी हो गई है कि राष्ट्रीय सम्प्रभुता की रक्षा हेतु उनके लोकतांत्रिक अधिकारों पर आपातकाल के कील ठोंक दिए जाएं।

क्या सरकार यह बता सकती है कि वह प्रत्येक भारतीयों से हर कागजी-स्थिति में ‘धर्म’ के बारे में क्यों पूछती है?

वह क्यों नहीं सिर्फ ‘भारतीय’ और ‘अभारतीय’ के विकल्प से काम चला लेती है? क्या ऐसा नहीं है कि सरकारी तुष्टिकरण की नीति ने ही राज-समाज और प्रान्त में ‘धर्म’ को ले कर ज्यादा बवेला मचाया है; कोहराम भी उन्हीं के गुर्गो ने अधिक किया है। इस घड़ी मूल मुद्दे से भटकाने और बरगलाने की साजिश रचकर सरकार पूरे देश को आखिर क्या संदेश देना  चाहती है? वह लोगों में बाबा रामदेव के प्रति उमड़ी अटूट निष्ठा और अप्रत्याशिन जन-समर्थन को छिन्न-भिन्न करने की मंशा से क्यों
अनर्गल प्रलाप कर रही है?

बाबा रामदेव का आमरण अनशन अभी भी जारी है। उनकी बिगड़ती हालत को देखते हुए उन्हंे आपात चिक्त्सिा मुहैया कराया जा रहा है। किन्तु इस नाजुक और चिन्ताजनक स्थिति में भी सरकार अपनी सामंती पाश्विकता को नहीं त्याग पा रही है। सरकारी खेमे से आने वाले बयान हतप्रभ करते हैं; उनकी आन्तरिक कुंठा और मानसिक विक्षिप्तता को द्योतित करते हैं। यूपीए सरकार यह भूल रही है कि यह समय जय-पराजय की नहीं है। सच की तस्वीर पूरे शिद्दत के साथ स्वीकारने की है। जीवनमूल्य के आधार पर अपनी आस्था व्यक्त करने में प्रवीण भारतीयों के लिए काले धन की वापसी की दिशा में ठोस एवं सकारात्मक पहल किए जाने की जरूरत है। नहीं तो, यह समय भारतीय लोकतंत्र में सिद्धांत और विचारधाराओं के अन्त का है। यह एक ऐसी पार्टी के ख़ात्मे का वक्त है जिसमें विचारवेत्ता तो सभी हैं, लेकिन विचार आयातीत या फिर दुर्भिक्ष के शिकार हैं। अंग्रेजी बोल बोलने वाले कांग्रेसी युवराज राहुल गाँधी की औकात इस घड़ी पार्टी में क्या और कितनी है; इसे और विज्ञापित करने की जरूरत नहीं है।

भाजपा जो कलतक अन्दरुनी झमेले में फँसी थी। आज वह बाबा रामदेव के साथ ‘रिले रेस’ कर रही है। जनता को भाजपा की बाज़ीगरी की भी समझ है। लेकिन इस घड़ी मामला कौन कितना किससे बेहतर साबित करने का नहीं है। यह चुनौतीपूर्ण समय है जिसमें हमंे यह देखना होगा कि साधु, संत, तपस्वी के देश में उन्हीं को सबसे पहले भुलाने-बिसारने का यह षड़यंत्र भारतीय लोकतंत्र के भविष्य को आखिर कौन-सा दिशा देगा? हमें यह भी सोचना होगा कि सरकार इस वक्त सच बोलने वालों का कत्ल करने पर तूली है। हमारे संत-महर्षि और सज्जन पुरुषों को अपना लोकतांत्रिक अधिकार खोने की फिक्र क्यों सताए? जब दृष्टिहीन और अविवेकी सरकार स्वयं ही भारतीयों के लोकतांत्रिक अधिकारों को छीनने पर आमादा हो?

——————————————————————————————–
(प्रेषक: राजीव रंजन प्रसाद, शोध-छात्र, प्रयोजनमूलक हिन्दी(पत्रकारिता) हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी Blog : www.issbaar.blogspot.com मो0: 9473630410)

0 0

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleppy
Sleppy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments
No tags for this post.

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

रामदेव ने संतों की मौजूदगी में त्यागा अनशन

बाबा रामदेव ने आज अपना नौ दिन से चल रहा अनशन तोड़ दिया है। आज उन्हें मनाने के लिए श्री श्री रविशंकर, कृपालु महाराज और मुरारी बापू अस्पताल गए। वहां उन्होंने बाबा से बात की, जिसके बाद से अनशन तोड़ने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने श्री श्री के हाथ […]
Facebook
%d bloggers like this: