जानिए क्या बला है ये इबोला..

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आज कल ख़बरों में इबोला छाया हुआ है. हालाँकि चालीस के आस पास की उम्र का इबोला वायरस  चिकित्सा जगत के लिए नया नाम नहीं है लेकिन फिर भी इसका इलाज अब तक नहीं खोजा जा सका है. इबोला असल में एक वायरस है और  लगभग  40 साल पहले साल 1976 में अफ्रीका में पहली बार इबोला संक्रमण का पता चलने के बाद से अब तक दुनिया यही मानती आयी है कि इबोला वायरस के संक्रमण का कोई इलाज नहीं है. अब तक इबोला से बचने का कोई टीका या वैक्सीन भी हमारे पास मौजूद नहीं था. इसी वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इबोला वायरस को बेकाबू करार दे दिया है. ebola-has-killed-69-guinea-january_zps99721cfa

हालाँकि इस वायरस के बढ़ते असर को देखते हुए विश्व स्वस्थ्य संगठन ने इस वायरस के लिए दवाओं के निर्माण के लिए सार्थक कदम उठाने का आश्वासन दिया है.

विश्व के स्वास्थ्य संगठनों ने कई बिमारियों पर जीत पाई है। पोलियो, हैपिटाइटिस, स्वाइन फ्लू, सार्स जैसी बिमारियों को रोकने के कई सक्रिय कदम उठाए गए हैं। लेकिन ‘इबोला’ नामक इस खतरनाक वायरस संक्रमण का अभी कोई तोड़ नहीं निकाला गया है। इबोला एक जानलेवा वायरस है जो कि शरीरिक तरल पदार्थ या जानवरों से संपर्क में आने से भी फैल सकती है। लिहाजा, यह एड्स से भी खतरनाक है। यह वायरस महज छींकने या खांसी के द्वारा भी आप तक पहुंच सकती है। वहीं, इस बिमारी से जुड़े शुरुआती लक्षण डाइरिया, उल्टी होना, खून का बहना, सिर दर्द और फीवर है। अभी तक इस बीमारी का कोई इलाज, कोई वैक्सिन नहीं है, वहीं यह संक्रमण से प्रभावित लोगों में से लगभग 90 प्रतिशत लोगों की मौत हो जाती है। इंसानों के अलावा जानवरों के जरिए भी इबोला का संक्रमण होता है. चमगादड़ों को इबोला की सबसे बड़ी वजहों में से एक माना गया है. इसलिए, किसी भी अनजान और बाहरी जानवर से बचिए और मरे हुए जानवरों के शरीर के पास जाने की कोशिश न करें. बेहतर है ऐसी किसी स्थिति में स्थानीय स्वास्थ्य सेवाओं की मदद लें.

इसका संक्रमण, केवल संक्रमित व्यक्ति के खून से या उस व्यक्ति को छूने से ही नहीं फैलता है बल्कि संक्रमित मरीज के पसीने से भी यह वायरस फैल सकता है और तो और मरीज की मौत के बाद भी वायरस सक्रिय रहता है. सबसे अहम बात ये है कि फ्लू के इन्फेक्शन की तरह यह सांस के जरिए नहीं फैलता बल्कि इसका संक्रमण तभी होता है जब कोई व्यक्ति मरीज या मरीज के मृत शरीर से सीधे संपर्क में आता है.

अस्पतालों आदि में इसके फैलने की एक बड़ी वजह है इसका छूने से फैलना. मृत्यु के बाद स्वाभाविक तौर पर लोग मृत व्यक्ति को छूते हैं और वायरस उनमें भी पहुँच जाता है. इलाज के लिए दवा बनाने वाली कंपनी के तौर पर सबसे पहला नाम आता है एक बहुराष्ट्रीय कंपनी मैप बायोफार्मास्यूटिकल का जिसने तकरीबन एक दशक पहले ही इबोला के टीके पर काम शुरू कर दिया था. इसकी बनायी ये अनूठी दवा दवा मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का मिक्स है. इसके अलावा एक और कंपनी प्रोफेक्टस बायोसाइंसेस ने भी इबोला की वैक्सीन का बंदरों पर टेस्ट किया जिसका नतीजा काफी अच्छा आया है.

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