जीत बहादुर का परिवार: मोदी और आज तक के खोखले दावे..

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को ट्वीट के ज़रिये सोलह साल पहले अपने परिवार से बिछड़े नेपाली युवक को उसके परिवार से मिलवाने का दावा किया था. असल में ये 140804151601_jeet_bahadur_624x351_jeetbahadurfacebookदावा झूठा है और वो नेपाली युवक जीत बहादुर दो साल पहले यानि 2012 में ही अपने परिवार से मिल चुका है. इसका पता तब चला जब लोगों ने जीत के फ़ेसबुक पेज पर 2012 की उनके परिवार के साथ तस्वीरें देखीं.

खुद जीत बहादुर ने मीडिया से बातचीत में से कहा – “मैं अपने परिवार वालों से काफी बार मिल चुका हूँ लेकिन मेरे बड़े भाई (मोदी) पहली बार मेरे परिवार वालों से मिले हैं. वे चाहते थे कि वे खुद मुझे मेरे परिवार वालों को हैंड ओवर करें. नेपाल के एक बड़े बिज़नेसमैन बिनोद चौधरी 2011-12 में मोदी जी से मिलने आए थे. तब उन्होंने उनसे मेरे परिवार को ढूंढने की बात कही. जल्द ही मुझे मेरे परिवार का पता मिल गया.”

जीत का ये बयान मोदी के दावे के विपरीत है. जीत के अनुसार उन्होंने परिवार के साथ तीन महीने गुज़ारे और वापस 140804151845_jeet_bahadur_624x351_jeetbahadurfacebookअहमदाबाद लौट कर सीधे मोदी से मिले. गौरतलब है कि मोदी ने नेपाल जाने से पहले अपने अकाउंट से एक ट्वीट किया था-“नेपाल की इस यात्रा से मेरी कुछ व्यक्तिगत भावनाएं भी जुड़ी हैं. बहुत वर्ष पहले एक छोटा सा बालक जीत बहादुर, असहाय अवस्था में मुझे मिला. उसे कुछ पता नहीं था, कहां जाना है, क्या करना है. और वह किसी को जानता भी नहीं था. भाषा भी ठीक से नहीं समझता था. कुछ समय पहले मैं उसके मां-पिताजी को भी खोजने में सफल हो गया. यह भी रोचक था. यह इसलिए संभव हो पाया क्योंकि उसके पांव में छह उंगलियां हैं. ईश्वर की प्रेरणा से मैंने उसके जीवन के बारे में चिंता शुरू की. धीरे-धीरे उसकी पढ़ाई-खेलने में रुचि बढ़ने लगी. वह गुजराती भाषा जानने लगा.”

मोदी ने एक अन्य ट्वीट में लिखा-“कुछ समय पहले मैं उनके माँ-पिताजी को भी खोजने में सफल हो गया. मुझे 140804152039_jeet_bahadur_624x351_jeetbahadurfacebookख़ुशी है कि कल मैं स्वयं उन्हें उनका बेटा सौंप सकूँगा.”

अहमदाबाद के निकट धोलका यूनिवर्सिटी से एमबीए कर रहे जीत बताते हैं,”मैं 1998 से घर से निकल गया था. इतनेसाल बाद दोबारा उनसे मिलना एक सपने की तरह ही था और यह सब सिर्फ़ बड़े भैया की वजह से हुआ. मैं जैसे ही स्टेशन से उतरा, तो भैया ने मुझे घर बुलवा लिया और अगले दिन कहा कि उन्होंने मेरा दाखिला एक कॉलेज में बीबीए के लिए करवा दिया है. वह दिन मैं आज भी नहीं भूला.”

राजस्थान से गलत ट्रेन पकड़ कर अहमदाबाद पहुंचे जीत को बीजेपी कार्यकर्ता अंजलीबेन आरएसएस से जुडी संस्था लक्ष्मण ज्ञानपीठ ले गईं और वहां छात्रावास संस्कार धाम में दाखिल करा दिया. एमबीए करने की इच्छा रखने वाले जीत कहते हैं, “मुझे बड़े भैया कैसे मिले, यह तो मैं नहीं बताऊंगा. लेकिन वे मेरा इतने समय से ध्यान रख रहे थे. जब मुझे मिलने की इच्छा होती, तो मैं उनके पास चला जाता था.”

दूसरी तरफ देश के बड़े न्यूज़ चैनलों में से एक आज तक ने इस खबर को एक अलग रंग में प्रस्तुत किया है. आज तक के अनुसार 31 जुलाई को चैनल ने  खबर “ब्रेक” की थी.

AAJTAK.JEET.MODIचैनल ने मोदी को दावे को सच्चा मानते हुए अपनी वेबसाइट पर 4 अगस्त को सफाई पेश की है जिसमें उन्होंने अपनी खबर का समर्थन किया है और मोदी के नेपाल में आने के ‘व्यक्तिगत’ कारण की व्याख्या की है. हालाँकि जीत बहादुर की खबर सोशल मीडिया पर 1 अगस्त की देर रात से ही फैलने लगी थी और दो दिनों में वायरल हो चली. इसके बाद चैनल ने अपनी वेबसाइट पर इस कहानी को ‘फिल्म सरीखी लेकिन सत्य करार देते हुए जीत बहादुर के 2011 में ही परिवार से मिलने के दावे कर डाले. इतना ही नहीं आज तक की खबर में तारीख, समय, दावों और खोज बीन की पोल खुलती नज़र आ रही है. 

 

 

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