सिर्फ रिक्शा ही इलेक्ट्रिक है साहब, हम नहीं..

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बात साल 2008 की है. भारत की टूटी फूटी से लेकर एक्सप्रेस वे की रेंज रखने वाली सड़कों के लिए एक नयी चीज़ बाज़ार में आई थी. इलेक्ट्रिक रिक्शा. इसके पहले इलेक्ट्रिक स्कूटर सफलता की जवानी को चूम कर पांच सात साल में बुढ़ापे की तरफ मुड़ चुके थे. शक था इस प्रयोग के सफल होने पर. लेकिन दो से तीन यूनिट बिजली ले कर अगर कोई साढ़े तीन सौ किलो तक के वज़न को सौ किमी तक घुमाने की ताकत रखता हो तो ऑटो रिक्शा और मानव चालित रिक्शा से बेहतर विकल्प मानने में देर नहीं लगनी थी. सरकार भी उस वक़्त पर्यावरण बचाओ आन्दोलन टाइप की मुहीम में थी इसलिए मामला बहुत तेज़ी से खूबसूरत मेजों पर से पार पाता गया और देखते देखते सड़कों पर डेढ़ लाख से अधिक प्रदूषण मुक्त इलेक्ट्रिक रिक्शा चलने लगे. बिना पंजीकरण के काम में लाये जाने योग्य सत्तर हज़ार की कुल कीमत पर सड़क चूमने को तैयर ये रिक्शे 650 से 1400 वाट की क्षमता वाले होते हैं. ज़्यादातर इलेक्ट्रिक रिक्शे चाइना से आयात किये जाते थे लेकिन धीरे धीरे भारत में भी इनका निर्माण शुरू हो चुका है.10511201_10152752674793455_2872600649452839084_n

कुछ फायदे होने के साथ इसमें कुछ खामियां भी थीं. अक्सर देखा गया है एक अच्छी मशीन की सबसे बड़ी कमी उसका चालक होता है. अच्छी मशीन के लिए अच्छा चालक होना ज़रूरी होता है. धीरे धीरे दुर्घटनाओं, सुरक्षा, नियम, कानून, व्यव्हारिकता आदि तर्कों के शिकार ये रिक्शे भी हो गए. हाल में दिल्ली के त्रिलोकपुरी में दुर्भाग्यवश और सामाज की सामूहिक मानवीय लापरवाही का नमूना देखने को मिला जब एक ई-रिक्शा के चालक की लापरवाही से अपने तीन साल के बच्चे को गोद में ले कर पैदल जाने वाली महिला को ठोकर लग गयी. बच्चा महिला के हाथ से छूट गया और पास में पड़ी लापरवाही की मीठी मिसाल के रूप में समाज को मुंह चिढाती खौलते चाशनी की कड़ाहे में जा गिरा. बच्चे की मौत हो गयी. आक्रोश फूट पड़ा. लोगों के मन में ई रिक्शा के लिए शिकायत ने जन्म लिया. हालाँकि इसके पहले भी ई रिक्शा को नापसंद करने वाले कुछ लोग थे. एक जनहित याचिका पर ठीक इसी समय सुनवाई हुयी जिसमें ई रिक्शा सम्बन्धी नियम बनाने का ज़िक्र था और ई रिक्शा से जुड़ी कानूनी विसंगतियों को दूर करने का आग्रह. दिल्ली हाई कोर्ट ने पहली बार लोगों के अन्दर व्याप्त भय को लोगों से ज्यादा महसूस किया और दिल्ली की सीमा में चल रहे डेढ़ लाख ई रिक्शों पर 18 अगस्त तक निलंबन का खोल ओढ़ा दिया जिसे सरकारी कार्यकुशलता के चलते आगे बढ़ाये जाने के पूरे आसार नज़र आते हैं. हालाँकि सरकार को भी होमवर्क मिला इन दो हफ्ते से ज्यादा समय में जिससे वो छुट्टियाँ मनाने की जगह आने वाली परीक्षा की तयारी के लिए एक सुझाव रिपोर्ट तैयार करे जिसमें ई रिक्शा और मोटर वाहन अधिनियम के सम्बन्ध स्थापित करने के बारे में ब्यौरा दिया गया हो.

दिल्ली हाई कोर्ट के इस आदेश के नकारात्मक और सकारात्मक, दोनों तरह के प्रभाव देखने को मिल सकते हैं. एक तरफ आम जनता को समस्या का सामना करना पड़ेगा क्योंकि गर्मी के मौसम में कम दूरी के सफ़र के लिए ई-रिक्शा काफी मददगार थे. हालांकि इससे ट्रैफिक में कुछ सुविधा होने की सम्भावना है. लेकिन जिस वर्ग पर सबसे ज्यादा असर होने के आसार हैं वो ई-रिक्शा का चालक वर्ग है. लाजपत नगर के ई-रिक्शा चालक रमेश गुप्ता कहते हैं, “सबसे ज्यादा नुकसान हमारा ही होगा, किसी की सुविधा गयी है और किसी की रोजी. कौन सा नुकसान बड़ा है तय करना मुश्किल नहीं होन चाहिए किसी के लिए. सिर्फ रिक्शा ही इलेक्ट्रिक है साहब, हम नहीं!!” एक अन्य चालक परमेश आहूजा शिकायती लहजे में कहते हैं, “दिल्ली में रोज़ कितने ही बलात्कार हो रहे हैं, लेकिन सड़क पर पुरुषों के चलने को तो बैन नहीं किया गया? डेढ़ लाख रिक्शे नहीं, डेढ़ लाख परिवारों की बात है. आप नियम बनाइए, पालन करवाइए.. समस्या चालकों के मनबढ़ होने से है. उन्हें निरंकुश न होने दीजिये. मैंने किसी तरह क़र्ज़ लेकर रिक्शा खरीदा था. अब घर चलाऊँ या रिक्शा बचाऊँ, दोनों सवाल मुश्किल हैं!!” इस मामले में तिपहिया ऑटो वालों का फायदा ज़रूर दिखता है और जनता का नुकसान. जो दूरी ई-रिक्शा से दस रूपए में तय होती थी वो अब ऑटो में न्यूनतम तीस से पैंतीस रूपए में तय करनी होगी. लेकिन चालक वर्ग के तर्क को नकारना भी मुश्किल है. दिल्ली हाई कोर्ट अगर ई रिक्शा के विरुद्ध फैसले पर विचार करती है तो उसे ये ध्यान में रखना होगा कि इस फैसले से प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या सिर्फ उतनी नहीं है जितने आंकड़े दिखाते हैं. डेढ़ लाख चालकों के परिवार के छः लाख से अधिक सदस्य, रोजाना सफर करने वाली तकरीबन पांच लाख सवारियां, और ई रिक्शा की बिक्री आदि से पेट पालने वाले कुछ एक लाख से अधिक मजदूर और नौकरीपेशा लोग. कुल मिला कर बारह लाख से अधिक लोग यानी इस फैसले से प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या असल में ई रिक्शा की संख्या की लगभग आठ गुनी है.

दिल्ली में इलेक्ट्रिक रिक्शे ठेकेदारी पर भी चलते हैं. कई इलाकों में मानव चालित रिक्शों के जैसे कई लोगों ने ई रिक्शा कंपनियां खोली हैं जहां रिक्शे रोजाना की दर पर किराये पर दिए जाते हैं. चालकों से रोजाना 250 से लेकर 450 तक लिए जाते हैं  और बाकि चालक का हिस्सा होता है. एक बार पूरी तरह चार्ज होने के बाद ये रिक्शे दिन भर में 600-800 रूपए तक की आमादानी करवा देते हैं. इन रिक्शों के लिए सबसे बड़ा खर्च इनमें लगने वाली बैटरी से होता है जो कि हर चार से छः महीने में बदलनी पड़ती है जिसमें लगभग 25 से 30 हज़ार का खर्च आता है. ऐसे में छोटी आमदनी वाले इन रिक्शा चालकों के लिए मुश्किल ज़िन्दगी को और विकट बनाने से रोकना होगा और मानवीय दृष्टिकोण के साथ काम करना होगा न्यायपालिका को.

अगर ऑटो रिक्शा से तुलना करें तो छोटी दूरी के लिए ई रिक्शा बेहद मुफीद हैं. चूंकि इन वाहनों का पंजीकरण नहीं होता है इसलिए इनसे जुड़ी किसी भी घटना में बीमा की कोई भूमिका नहीं होती. इन वाहनों का एक वस्तु के तौर पर बीमा होता है जो कि साधारण बीमा के अंतर्गत आता है और सिर्फ चोरी आदि जैसी घटना को कवर करता है. इस तरह बिना बीमा के ये वाहन जनता और चालक, दोनों के लिए ही खतरनाक हैं और ये देख कर ताज्जुब होता है कि सरकार का रवैया इनके लिए अब तक उदासीन ही रहा है. इन सबके अलावा पंजीयन के नियमों के आभाव में चालकों को लाइसेंस भी नहीं दिया जा पा रहा जिससे चालक की जवाबदेही तय नहीं की जा सकती. हालाँकि दुर्घटना के मामले में इलेक्ट्रिक रिक्शा सुरक्षित हैं और अब तक कुल डेढ़ सौ के आस पास हुयी दुर्घटना में महज़ दो लोगों ने अपनी जान गंवाई है. इसके विपरीत इसी अवधि में ऑटो रिक्शा से होने वाले एक्सीडेंट की संख्या इलेक्ट्रिक रिक्शा के मुकाबले सत्तर गुना छः गुना अधिक रही है जिनमें मरने वालों की कुल संख्या डेढ़ सौ के लगभग पहुँचती है. अतः ज़रूरत असल में नियमावन की है, न कि प्रतिबन्ध या निलंबन की. अगर ध्यान से देखें तो सरकारी लालफीताशाही और उससे भी ज्यादा रक्तिम लाली पा चुके सरकारी तंत्र की लापरवाही का खामियाजा ये गरीब ई रिक्शा चालक भुगत रहे हैं. सरकार ने अगर समय रहते इनके लिए नियम बनाये होते तो आज ये नौबत नहीं दिखती. और बिना पंजीकरण के सडकों पर वाहन चलाने की इजाज़त देना सरकार की गलती है न कि इन रिक्शा चालकों की.

इस मामले पर हमेशा की तरह विशेषज्ञों का नजरिया बिलकुल स्पष्ट है. जानकारों के अनुसार मोटर वाहन अधिनियम १९८८ में कुछ बदलाव आवश्यक हैं और इनमें वैकल्पिक उर्जा से चलने वाले वाहनों को शामिल किया जाना आवश्यक है. नितिन गडकरी ने 100 रूपए की छोटी राशि के ज़रिये चालकों और रिक्शे का पंजीकरण का सुझाव दिया है जिसके बाद चालकों को पहचान पत्र जारी किये जायेंगे. दिल्ली सरकार की अल्पकालिक समीति की ज़ुबैदा बेगम कहती हैं कि एक प्रस्ताव तैयर किया गया है जिसमें सिर्फ 650 वाट या उससे नीचे की कार्यक्षमता वाले मोटर चालित वाहनों को मोटर वाहन अधिनियम से अलग रखने का सुझाव दिया गया है. इसके साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों पर भर क्षमता भी तय की जाएगी. इस सम्बन्ध में दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने भी एक हलफनामा दायर किया था जिसमें इलेक्ट्रिक रिक्शा से होने वाले नुकसान, उनसे हुयी दुर्घटनाओं और मौतों का हवाला दिया गया है. इसलिए जब तक नियम नहीं बन जाते हैं तब तक के लिए इलेक्ट्रिक रिक्शा का परिचालन निलंबित रहेगा.

 

ई रिक्शा चालक, नियम और पीड़ित. तीनो पक्षों के अपने सत्य हैं, लेकिन तीनो ही पक्ष एक बात पर सहमत होते हैं- सरकार का जनता के साथ खिलवाड़ कब बंद होगा. विसंगतियां हर क्षेत्र में होती हैं लेकिन इन्हें दूर करने के लिए ही तो हम सरकार चुनते हैं कि सरकार तमाम विभाग बना कर कानूनों का पालन सुनिश्चित करवाए.

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