अब महुआ बीनने पर भी आदिवासियों का नामांकन और बंटवारा..

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महुआ पेड़ों की नंबरिग और बंटवारे के विरोध में 550 से अधिक ग्रामीणों ने दर्ज करायी आपत्ति.. वन विभाग के द्वारा किए गए महुआ पेड़ों की नंबरिग के खिलाफ 550 से अधिक ग्रामीणों ने दाखिल किया आपत्ति पत्र..

सिंगरौली, वन विभाग व राजस्व विभाग के द्वारा महान वन क्षेत्र में किये गए महुआ पेड़ों के सर्वे और बंटवारे के विरोध में आज अमिलिया के ग्रामीणों ने तहसीलदार के नाम अपनी आपत्ति दर्ज करवायी. अमिलिया गांव में लगे एक शिविर में ग्रामीणों ने पटवारी और कानूनगो को अपना आपत्ति पत्र सौंपा.notice for Mahuaa by tehsildaar

करीब 550 से ज्यादा संख्या में लोगों ने तहसीलदार के यहां जाकर अपना-अपना आपत्ति पत्र जमा करवाया. कुछ दिन पहले ही जंगल विभाग और राजस्व विभाग ने महान कोल लिमिटेड को प्रस्तावित जंगल क्षेत्र में महुए के पेड़ों की नंबरिंग और बंटवारा कराकर ग्रामीणों को नोटिस जारी किया था, जिसका ग्रामीणों ने विरोध किया है.

ग्रामीणों के अनुसार जंगल में महुआ के पेड़ों का बंटवारा पुरुखों के जमाने से होता आया है और इसे गांव के लोग ही करते आए हैं. वन अधिकार समिति अमिलिया के अध्यक्ष हरदयाल सिंह गोंड ने कहा कि, ‘वनाधिकार कानून 2006 के तहत जंगल में किसी तरह की योजना, प्रबंधन और हंस्तातरण करने का फैसला उस वन क्षेत्र के ग्राम सभा को दिया गया है. ऐसे में वन विभाग और राजस्व विभाग का कंपनी के साथ मिलकर महुए के पेड़ का नामांकन और बंटवारा वनाधिकार कानून 2006 के तहत अवैद्य है. जंगल में किसी तरह के कार्य का निर्णय बिना ग्राम सभा की अनुमति के नहीं हो सकता है’.
अमिलिया गांव के ही निवासी हीरामणी सिंह गोंड ने भी अपनी आपत्ति दर्ज करवायी है. उनके अनुसार, ‘जंगल में महुए के पेड़ का बंटवारा पंरपरागत रुप से होता आया है और इसके बारे में कोई भी निर्णय गांव के लोग ही लेते आये हैं. इसलिए हमलोग इस नामांकन के खिलाफ अपना आपत्ति दर्ज करवा रहे हैं’.

अपने आपत्ति पत्र में ग्रामीणों ने वनाधिकार कानून 2006 के तहत सामुदायिक वनाधिकार की मांग की. हरदयाल ने सवाल उठाया कि, ‘जब प्रशासन जंगल के आवंटन के लिए और वनाधिकार कानून पर नयी ग्राम सभा का आयोजन करवा रहा है तो ग्राम सभा के परिणाम आने से पहले जंगल में पेड़ों की नंबरिग और उनका बंटवारा क्यों करवाया जा रहा है’.
दूसरी तरफ शासन की तरफ से महान वन क्षेत्र में आने वाले दूसरे गांवों जैसे सुहिरा, बंधौरा, बुधेर, बरवाटोला, बंधा आदि गांवों में किसी भी तरह का वनाधिकार कानून के तहत प्रक्रिया नहीं शुरू की जा सकी है, जिससे इन गांवों के ग्रामीण चिंतित हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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