भाषा के लिए लड़ना सीखो, नौकरी के लिए लड़ने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी..

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-अभिरंजन कुमार||

यूपीएससी परीक्षा में “सी-सैट” पूरी तरह से ग़लत है और इसका विरोध पूरी तरह से सही है। अगर मोदी-सरकार का हिन्दी-प्रेम छलावा नहीं है, तो “सी-सैट” तत्काल वापस लिया जाए और छात्रों की पिटाई करने वाले पुलिस वालों को तत्काल बर्खास्त किया जाए और उनपर सरेआम गुंडागर्दी करने, निरपराध लोगों की पिटाई करने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने और लोगों को लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करने से रोकने के अपराधों से जुड़ी धाराओं के तहत मुकदमा चलाया जाए।hindi_upsc20140627

दूसरी बात कि दिल्ली में एक छात्र के आत्मदाह की कोशिश वाली ख़बर से मेरा दुख और बढ़ गया है। अपने सभी भाइयों-बहनों से मैं इतना ही कहूंगा कि आपकी ज़िंदगी बेहद कीमती है और कम से कम मैकाले के मानसपुत्रों के लिए तो अपनी जान को बिल्कुल दांव पर न लगाएं, वरना अंग्रेज़ों की ये औलादें और भी ख़ुश होंगी। आपकी ज़िंदगी उन्हें ख़ुश करने के लिए नहीं, बल्कि उनकी नींद हराम करने के काम आनी चाहिए।

तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात कि आज यह समस्या इसलिए खड़ी हुई है क्योंकि भाषा का मसला हम सिर्फ़ तभी उठाते हैं, जब हमारा कोई तात्कालिक स्वार्थ प्रभावित होता है। हमें अपनी भाषाओं के अधिकार और सम्मान को लेकर अत्यंत जागरूक होना पड़ेगा और छोटी-छोटी बातों पर भी नज़र रखनी होगी और ज़रूरत पड़े तो लोकतांत्रिक हंगामा भी खड़ा करना होगा। तभी अंग्रेज़ों को इस बात का अहसास होगा कि भारतीय भाषाओं को बोलने वाले लोग ग़ुलाम नहीं हैं।

संविधान-निर्माताओं ने हिन्दी को राजभाषा का दर्जा तो दिया, लेकिन रास्ते में 15 साल वाला पत्थर भी रख दिया। कायदे से जब 15 साल पूरे हुए थे, तभी हिन्दी वालों को अन्य भारतीय भाषा-भाषियों को साथ लेकर, उनका भरोसा हासिल कर बड़ा आंदोलन करना था। वो नहीं किया। और तब से आज तक लगातार यही हो रहा है कि हम भाषा से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों की भी अनदेखी कर देते हैं और अंग्रेज़ों और अंग्रेज़ी के सामने दिन-प्रतिदिन घुटने टेकते जा रहे हैं।

आज हम अपनी भाषा में नौकरी पाने के लिए तो लड़ रहे हैं, लेकिन अपनी भाषा में पढ़ने और बच्चों को पढ़ाने के लिए क्यों नहीं लड़ते? भारत में शिक्षा का अंग्रेज़ीकरण जिस तेज़ी से बढ़ा है, उसमें हम भारतीय भाषा-भाषियों का पूरा सहयोग है। आख़िर जब बात पढ़ाई की आती है, तब हमारा स्वाभिमान क्यों नहीं जागता, बुनियाद तो वही है? जब बात स्कूलों की आती है, तब हम क्यों नहीं लड़ाई लड़ते? आख़िर फैक्टरी तो वही है।

कड़वा है, पर सच यह है कि हम कुंठित ग़ुलाम लोग स्वेच्छा से अंग्रेज़ बनना चाहते हैं। जो न अंग्रेज़ बन पाए, न हिन्दी वाले रहे, यानी “मध्य” में रह गए, उन “मध्यवर्गीय” लोगों को अंग्रेज़ी से समस्या सिर्फ़ तभी होती है, जब उन्हें नौकरी मिलने में दिक्कत होने लगती है। बाक़ी समय उनका पूरा प्रयास अपना भाषाई-धर्मांतरण कर लेने का ही रहता है।

मुझे पूरा यकीन है कि आज जो लोग हिन्दी के नाम पर आंदोलनरत् हैं, वे भी कल अपने बच्चों को अंग्रेज़ बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। ये सारे अंग्रेज़ जो आज हमें लाठियों से पीट रहे थे, डीएनए से किन्हीं अंग्रेज़ मां-बापों की औलादें नहीं हैं। ये हमारे ही रक्त से पैदा हुए अंग्रेज़ हैं, जो अब रक्तबीज का रूप धारण कर हमारा ही रक्त पी रहे हैं।

मैंने तो यह पाया है कि जब भी हमने भाषा का मसला उठाया, ख़ुद कई हिन्दी वालों ने ही हमें दकियानूसी और नासमझ साबित करने की कोशिश की। मेरा सिर्फ़ इतना कहना है कि आज नौकरी के लिए लड़ रहे हैं, तो लड़िए। पूरा समर्थन है। लेकिन किसी दिन भाषा के लिए भी लड़ना सीखिए। अगर यह लड़ाई लड़ना आप सीख लेंगे, तो नौकरी के लिए लड़ने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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