​ कुटिल से जटिल होते हमारे राजनेता..

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-तारकेश कुमार ओझा||
कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की पहचान तब फारुक अब्दुल्ला के बेटे के तौर पर ही थी। पिता के करिश्मे से बेटे को वाजपेयी मंत्रीमंडल में जगह मिल गई। इस दौरान संसद में उन्होंने कुछ अच्छी बातें भी कही। लेकिन सत्ता से हटने औऱ कांग्रेस के सहय़ोग से कश्मीर का मुख्य़मंत्री बनते ही उन्हीं उमर अब्दुल्ला के तेवर बदल गये। इसी तरह लालू यादव संप्रग सरकार में रेल मंत्री बने तो रेलवे को जर्सी गाय बताते हुए इसके समुचित दोहन की बातें करने लगे। लेकिन मंत्री पद जाते ही फिर सामाजिक न्याय और मंडल – कमंडल में उलझ गए।new

नीतिश कुमार भी अपने रेल मंत्रीत्वकाल में रेलवे सेफ्टी की खूब बातें किया करते थे। लेकिन बिहार में सत्ता संभालते ही अपने प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने और सांप्रदायिकता – धर्मनिरपेक्षता की भूल – भुलैया में एेसे उलझे कि फिर उलझते ही चले गए। बात सिर्फ यही तक सीमित होती तो गनीमत थी। बिहार के ही रामविलास पासवान जब रेल मंत्री थे, तो उन्होंने सरकार से लड़ – झगड़ कर अपने कर्मचारियों को मोटा बोनस दिलवाया।
यही पासवान जब वाजपेयी सरकार में संचार मंत्री बने तो सरकार की अनिच्छा के बावजूद अपने विभागीय कर्मचारियों को मुफ्त टेलीफोन की सुविधा दिला दी। जो उस जमाने में बड़ी बात थी। अपने रवैये से पासवान केंद्रीय मंत्री कम और अपने विभाग के कर्मचारियों के यूनियन नेता ज्यादा नजर आते थे। गनीमत है कि नई सरकार में मंत्री पद संभालने के बावजूद अभी तक उन्होंने अपने विभाग के कर्मचारियों के लिए किसी विशेष पैकेज की मांग नहीं की है। क्या पता कल को वे मांग कर बैठे कि जन वितरण प्रणाली विभाग से जु़ड़े सभी कर्मचारियों के लिए ऱाशन – पानी फ्री कर दिया जाए।

बंगाल की शेरनी कही जाने वाली ममता बनर्जी भी जब केंद्र में रेल मंत्री थी, तब देश का श्रेष्ठ रेल मंत्री बनने की उन्होंने भरसक कोशिश की। कम से कम उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के समर्थक औऱ कार्यकर्ता तो एेसा ही मानते हैं। लेकिन बंगाल का मुख्यमंत्री बनने के बाद से उन्होंने फिर अपने धुर विरोधी कम्युनिस्टों की लाइन पकड़ ली है। जिसके तहत केंद्र पर कथित सौतेला व्यवहार और उपेक्षा का अारोप आजकल वे अपनी हर जनसभा में लगा रही है। किसी जमाने में कम्युनिस्टों का भी यही हाल था। 60-70 के दशक में कम्युनिस्टों ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार के खिलाफ जम कर संघर्ष किया, और सत्ता हासिल की। तब छोटे से बड़ा हर कम्युनिस्ट नेता अपने भाषण में दुनिया के मजदूर एक हो का नारा बुंलद किया करता था। गली – ज्वार के बजाय बात – बात पर अमेरिका – रशिया और क्यूबा – कोरिया का उदाहरण देता था। लेकिन सत्ता मिलते ही कम्युनिस्ट नेता क्षेत्रीयता के खोल में कैद होने लगे औऱ राज्य के पिछड़ेपन का ठीकरा हमेशा केंद्र के सिर फोड़ने लगे। आलम यह कि राज्य की किसी समस्या पर पड़ोसी राज्यों की दुहाई देते हुए कम्युनिस्ट नेता कहते… अरे यहां तो गनीमत है , जरा पड़ोसी राज्यों का हाल देखो। एेसी दलीलें देकर कम्युनिस्ट नेता आत्मसंतुष्टि हासिल करते रहे।

26-11 प्रकरण के बाद विकट प्रतिकूल परिस्थितयों में हुए चुनाव में लगातार तीसरी बार जीत हासिल करने वाली दिल्ली की मुख्यमंंत्री शीला दीक्षित कुछ साल पहले तक अपनी पार्टी में प्रधानमंत्री पद की दावेदार के तौर पर देखी जाने लगी। लेकिन आम आदमी पार्टी से मात खाने के बाद से अब वे काफी दयनीय हालत में नजर आने लगी है। असम में लगातार तीसरी बार कांग्रेस की सरकार बनवा कर तरुण गगोई हीरो बन कर उभरे थे, लेकिन केंद्र में कांग्रेस की मिट्टी पलीद होते ही तरुण अब अपनी ही पार्टी के विधायकों की आंख की किरकरी बन कर रह गए हैं। सचमुच हमारे राजनेता कुटिल तो थे ही, अब जटिल भी होते जा रहे हैं।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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