इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट ने दिया राज्य सरकारों को नोटिस

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उच्चतम न्यायलय ने परोक्ष इच्छा मृत्यु को कानूनी मान्यता दिए जाने के सम्बन्ध में आई एक याचिका पर कदम महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों को नोटिस भेज कर जवाब माँगा है कि युथेनेशिया यानी इच्छा मृत्यु को क्यों न कानूनन मान्यता दे दी जाये.Euth

मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा की अगुवाई में हुयी बैठक में पांच सदस्यीय पीठ ने गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज की याचिका पर सुनवाई करते हुए सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों को नोटिस जारी करते हुए आठ सप्ताह के भीतर जवाब माँगा है. संविधान पीठ के अन्य सदस्य न्यायाधीश जे एस केहर, न्यायाधीश जस्ती चेलमेश्वर, न्यायाधीश ए के सिकरी और न्यायाधीश रोहिंगटन एफ नरीमन हैं.

हालांकि केंद्र सरकार ने इच्छा मृत्यु को कानूनी मान्यता दिए जाने का यह कहते हुए विरोध किया कि यह आत्महत्या के समान है और इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती. लेकिन इच्छा मृत्यु की पैरवी करने वालों ने ये कह कर इस कदम का स्वागत किया है कि अगर जीने की आजादी और अधिकार है तो मरने का क्यों न हो? कुछ विशेष परिस्थितियों में जीवन मृत्यु से भी बदतर हो जाता है. ऐसा अरुणा शानबाग और दिल्ली की दो बहनों के मामले में देख चुके हैं जिन्होंने अपना आधा से ज्यादा जीवन कृत्रिम उपकरणों के भरोसे बिस्तर पर बिताया था. ऐसे बहुत से चिकित्सकीय मामले हैं जिनमें इच्छामृत्यु की मांग की जाती रही है.

न्यायालय ने पूर्व सॉलिसिटर जनरल टी आर अंध्यार्जुन को मामले में न्याय मित्र बनाया है. कॉमन कॉज ने कुछ पश्चिमी देशों की तरह यहां भी जीवन संबंधी वसीयत एवं प्रतिनिधि के अधिकार (लिविंग विल एंड ऑथराइजेशन राइट) दिए जाने की वकालत की है. हालांकि उसकी दलील है कि इसे इच्छा मृत्यु की संज्ञा नहीं दी जानी चाहिए. इसलिए आज सुप्रीम कोर्ट ने इच्छा मृत्यु और अपनी मृत्यु के सम्बन्ध में वसीयत लिखे जाने में नोटिस जारी किया है.

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