वो तेरे प्यार का ग़म- संगीत का खोया सितारा दान सिंह के लेखक ईश मधु तलवार से बातचीत का सीधा प्रसारण कल..

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वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार ईश मधु तलवार जिनकी किताब “वो तेरे प्यार का ग़म- संगीत का खोया सितारा दान सिंह ” का विमोचन कुछ समय पूर्व पुस्तक मेले में हुआ था से वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र बोड़ा की बातचीत का सीधा प्रसारण मीडिया दरबार के इस लिंक www.mediadarbar.com/live-broadcast/ पर 11 जुलाई को दोपहर बारह बजे होगा. श्री तलवार ने गुमनामी के अँधेरे में डूब चुके बेहद कुशल संगीतकार दान सिंह के बारे में लिखी किताब में दान सिंह जी और संगीत में उनके उत्कृष्ट योगदान के बारे विस्तार से बताया है.10329294_803103073041397_8819860482106171705_n

संगीतकार दानसिंह के संगीत और मुकेश की आवाज ने मिल कर हिंदुस्तानी फिल्म संगीत को नायाब गाने दिये हैं.  दान सिंह के बारे में श्री तलवार कहते हैं “किसी से पूछिये- ”क्या आपने दान सिंह का नाम सुना है?” जवाब आयेगा- ”ज़ी , नहीं.” फिर पूछिये-आपने यह गाना सुना है क्या-”वो तेरे प्यार का गम, इक बहाना था सनम…?” वो तत्काल कहेगा- ”हाँ ज़ी, सुना है.” बस यही दान सिंह की बदनसीबी है. ”माई लव” फिल्म के इस सदाबहार गाने की धुन दान सिंह ने बनाई थी, जिसे लोग आज भी गुनगुना लेते हैं, लेकिन यह क्विज़ प्रतियोगिताओं का कठिन सवाल बन कर रह गया है. इसी फिल्म में एक गाना और था- ”ज़िक्र होता है जब क़यामत का, तेरे ज़ल्वों की बात होती है, तू जो चाहे तो दिन निकलता है, तू जो चाहे तो रात होती है.” शशि कपूर और शर्मीला टैगोर अभिनीत फिल्म ”माई लव” फिल्म में मुकेश के गाये इन गानों में संगीत निर्देशक दान सिंह के सहायक कौन-कौन थे, यह भी जान लीजिये-इन सहायकों में लक्ष्‍मीकांत ने मेंडोलिन बजाई, प्यारे लाल ने वॉयलिन बजाई, हरि प्रसाद चौरसिया ने बांसुरी बजाई और पण्डित शिव कुमार ने संतूर बजाया. बाद में इन चारों ने डंके बजाये. सब जानते हैं कि आगे चल कर लक्ष्‍मीकांत-प्यारेलाल की और शिव- हरि की मशहूर जोड़ियाँ बनीं , लेकिन जब दान सिंह के ये गाने धूम मचा रहे थे, तब वे जयपुर आ गये और गुमनामी के अंधेरे में खो गये.” 1970 में “माय लव ” फिल्म से प्रसिद्धि पाने वाले दान सिंह जी का स्वर्गवास जून 2011 में हो गया था. उन्होंने 2000 में आई जगमोहन मूंदड़ा कि फिल्म बवंडर में स्कोर भी दिया था.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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