इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की दबंगई या इंसाफ की उपेक्षा..

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इंडिया टीवी की एंकर तनु शर्मा की आत्महत्या के प्रयास के मामले में मीडिया का उदासीन रवैया सबकी नज़रों में खटक रहा है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरफ से अब तक इस खबर को प्रसारित भी नहीं किया गया है. प्रिंट मीडिया के एक दो अख़बारों ने खबर ज़रूर प्रकाशित की लेकिन उनके स्वर भी भोथरे ही थे. सोशल मीडिया के माध्यम से कुछ पूर्व मीडियाकर्मियों ने एक प्रदर्शन का आह्वाहन किया और नॉएडा स्थित फिल्मसिटी में इंडिया टीवी और रजत शर्मा के विरुद्ध प्रदर्शन किया.tanu_sharma_anchor_india_tv

अब तक घटनाक्रम में राजनैतिक संरक्षण, पुलिस की लापरवाही, लीपा पोती और कानूनी कार्यवाही का डर दिखा कर मामले को पूरी तरह से जनता की पहुँच से दूर रखा गया है जिससे कि ये संवेदनशील मुद्दा जनाक्रोश से दूर रहे. दामिनी काण्ड और उसके बाद हुए अनेक महिला उत्पीड़न के मामलों में खुद इंडिया टीवी ने सक्रिय भूमिका निभाई थी, ऐसे में अपने चैनल की घटना को दबाने के पीछे उनकी मंशा स्पष्ट दिख रही है.

हाल की घटनाओं को मद्देनज़र रखते हुए वरिष्ठ मीडियाकर्मियों ने तनु शर्मा को न्याय दिलाने की मुहिम छेड़ दी जिसमें समाज सेवी, छात्र, मजदूर यूनियन से जुड़े कार्यकर्ता और अनेक लोग शामिल हो रहे हैं. इस मुद्दे की इस तरह से प्रगति देखते हुए अब तक मौन रहे इंडिया टीवी के चेयरमैन और प्रधान संपादक रजत शर्मा ने एक ट्वीट के माध्यम से तनु शर्मा के लिए लड़ रहे लोगों की कोशिश को प्रोपगंडा करार दिया और धमकी देते हुए लिखा कि सभी प्रोपगंडा फ़ैलाने वालों को कानूनी नोटिस भेज दिए गए हैं. या तो माफ़ी मांग कर शांत हो जायें या दस करोड़ का हर्जाना भरने को तैयार रहे.rajat sharma

जिस तरह से रजत शर्मा पहले दस दिन तक चुप रहे और तनु शर्मा के विरुद्ध कार्यवाही होती रही उसे देख कर यही कहा जा सकता है कि रजत शर्मा और इंडिया टीवी को अपने कर्मचारियों की परवाह नहीं है. साथ ही साथ इससे तनु शर्मा के उत्पीडन के बयान को बल मिलता है. ऐसे में जब रजत शर्मा सामने न आते हुए ट्वीट का सहारा धमकी देने के लिए लेते हैं तो उनकी नीयत पर सवाल उठाना लाज़मी हो जाता है.

इस मामले में सबसे संदेहास्पद भूमिका पुलिस की रही है और किसी भी तरह की मिलीभगत से इंकार नहीं किया जा सकता है. तनु शर्मा के स्वहस्ताक्षरित मुहर लगे बयान की कॉपी में स्पष्ट दिख जाता है कि उसने किन किन लोगों के नाम लिए हैं और किन पर आरोप लगाया है. तीन लोगों को उसने अपनी मौत का ज़िम्मेदार बताते हुए आत्महत्या का प्रयास करने के पूर्व लिखे गए सुसाइड नोट में लिखा है कि रितु धवन, अनीता शर्मा बिष्ट और एमएन प्रसाद के उत्पीड़न और असहयोग से क्षुब्ध हो कर वो आत्महत्या कर रही है.

बाद में पुलिस को दिए गए बयान में भी उसने इन्ही तीनो पर असहयोग, प्रताड़ित करने और कार्यस्थल पर गरिमापूर्ण व्यव्हार न करने करने का आरोप लगाया है. कानूनन ये किसी के खिलाफ ऍफ़आईआर करने के लिए काफी होता है. लेकिन पुलिस के लिए शायद ये पर्याप्त नहीं था इसलिए उसने रितु धवन को ऊंची पहुँच और रसूख का लाभ देते हुए ऍफ़आईआर की जद से बाहर रखा. इतना ही नहीं, इसके बाद पीडिता यानि तनु शर्मा पर ही धाराएं लगा कर उन्हें जेल भेजे जाने की साजिश होने लगी है.

इस मामले में हाल के घटनाक्रम इसे और पेचीदा बनाने की तरफ इशारा करते हैं. रसूखदार लोगों की एक आम कर्मचारी से हक़, इज्ज़त और इंसाफ की लड़ाई में पीड़िता को समर्थन मिलता दिखाई दे रहा है. सोशल मीडिया और न्यूज़ पोर्टल के माध्यम से इस मसले से जुड़ी खबरें लगातार आ रही हैं. लेकिन जिस तरह से इस मामले में कई हाई प्रोफाइल और राजनीतिक रूप से सुदृढ़ लोगों के नाम शामिल हैं ऐसे में मामला लम्बा खिंचता दिख रहा है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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