क्या बनना चाहते हैं आप, एक सच्चा डॉक्टर या डॉक्टर ड्रैक्युला..

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यह पर्चा दिल से बूढ़े डॉक्टरों के लिए नहीं है! नहीं, यह दुनियादारों के लिए भी नहीं है. यह उन डॉक्टरों के लिए है जिनका दिल अभी युवा है, जो संवेदनशील हैं और सिर्फ अपने बारे में नहीं सोचते, जिन्होंने सपने देखना बन्द नहीं किया है. यह उन डॉक्टरों और भावी डॉक्टरों को सम्बोधित है जिन्होंने बेहतर दुनिया की उम्मीद नहीं छोड़ी है और जिन्हें ख़ुद पर भरोसा है.you want to become an honest doctor or doctor dracula

डॉक्टर का पेशा दुनिया के सबसे उदात्त पेशों में से है. आप लोगों को नयी ज़िन्दगी देते हैं. यह एक ऐसा पेशा है जिसमें सघन मानवतावादी सरोकारों की अपेक्षा की जाती हैै. क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे समाज और मेडिकल की मौजूदा शिक्षा प्रणाली में इन सरोकारों की क्या जगह है?

ज़रा सोचिये, आप एक ऐसे सामाजिक ढाँचे में लोगों को स्वस्थ करने और उनका दवा-इलाज करने का संकल्प करके जाते हैं जहाँ 70 प्रतिशत आबादी 20 रुपये रोज़ से कम पर गुज़ारा करती है, जहाँ 40 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, 5 वर्ष से कम उम्र में होने वाली मौतों में से 50 प्रतिशत से अधिक मौतें कुपोषण सम्बन्धी कारणों से होती हैं, 5 वर्ष से कम उम्र के 70 प्रतिशत बच्चे ख़ून की कमी के शिकार हैं, 30 प्रतिशत वयस्क पोषण की दीर्घकालीन कमी से पीड़ित हैं और 55 प्रतिशत महिलाएँ ख़ून की कमी से पीड़ित हैं. हालात ये हैं कि आज आम लोग जिन बीमारियों से मरते हैं उनकी दवाएँ आधी सदी पहले खोज ली गयी थीं. इसके बावजूद, लोग केवल इसलिए मौत के मुँह में समा जाते हैं क्योंकि उन्हें चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होतीं, वे डाक्टरों की फीस नहीं दे पाते और अपनी लागत से 10-20 गुना महँगी तक बिकने वाली दवाएँ ख़रीदने की उनकी क्षमता नहीं होती. कुछ ग़रीब लोग जुगाड़ करके ख़ुद अपने या अपने बच्चों का रोग दूर करने के लिए दवाएँ खरीद भी लेते हैं, लेकिन आपको भी यह पता ही है कि उनकी मुख्य बीमारी भूख-कुपोषण होता है. आपको यह भी पता होगा कि चिकित्सा सुविधाओं पर भारत सरकार कई पिछड़े और ग़रीब देशों से भी कम खर्च करती है. और जो थोड़ी-बहुत सुविधाएँ सरकारी अस्पतालों के ज़रिए उपलब्ध होनी चाहिए, उनमें भी लगभग 70 प्रतिशत भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं. सरकारी अस्पतालों की दवाएँ काला बा़जार में पहुँच जाती हैं. बहुत से डॉक्टर ड्यूटी से ज़्यादा प्राइवेट प्रैक्टिस पर ज़ोर देते हैं. गाँवों के स्वास्थ्य केन्द्रों पर जाने से वे बचते हैं.

सार्वजनिक स्वास्थ्य का ढाँचा आज ध्वस्त हो चुका है. बड़ी संख्या में डॉक्टरों का लक्ष्य जल्दी-से-जल्दी अपना नर्सिंग होम खोलना या किसी प्रतिष्ठित प्राइवेट अस्पताल में जाकर ज़्यादा से ज़्यादा पैसा पीटना रह गया है. अगर वे ऐसा न करें तो समाज में और अपनी ही बिरादरी में अलग-थलग पड़ जायेंगे. प्राइवेट प्रैक्टिशनर्स और अस्पतालों की डायग्नॉस्टिक सेण्टर और पैथोलॉजी लैब से मिलीभगत रहती है. इसके चलते मरीजों के कई ग़ैर-ज़रूरी टेस्ट तक करा दिये जाते हैं, ताकि पैथ लैब्स का धन्धा भी चलता रहे. आप यह भी अच्छी तरह जानते ही होंगे कि फार्मास्युटिकल कम्पनियाँ भी अपनी ब्रांडेड दवाओं की बिक्री के लिए डॉक्टरों को तरह-तरह से रिश्वत देती हैं. भारत जैसे ग़रीब देशों के आम लोगों को ये कम्पनियाँ नयी दवाओं के परीक्षण के लिए गिनीपिग के रूप में इस्तेमाल करती हैं. हालाँकि जब ये दवाएँ बाज़ार में उतारी जाती हैं तो वे इन ग़रीब लोगों की पहुँच से बाहर हो चुकी होती हैं. दुनिया में हथियारों के बाद सबसे मुनाफ़े का धन्धा दवाओं का व्यापार बन चुका है.

यही नहीं, निजीकरण के साथ-साथ मेडिकल शिक्षा का स्तर भी गिरा है. प्राइवेट संस्थानों से थोक के भाव निकलने वाले कथित डॉक्टरों की स्थिति भी आप जानते हैं. भारत में झोलाछाप डॉक्टरों की भी कमी नहीं है. सरकारी मेडिकल शिक्षा संस्थानों में पढ़ाई तो अच्छी है लेकिन वहाँ पढ़ने वाले छात्रों के अभिभावकों को लगता है कि हम बच्चे की पढ़ाई में पूँजी निवेश कर रहे हैं, तो वह पढ़ाई पूरी करने के बाद जल्द से जल्द धन का अम्बार लगा देगा और पढ़ाई का खर्चा भी निकल आयेगा. इसका एक तरीक़ा ‘डॉक्टर बाबू’ के लिए भारी दहेज़ वसूलना भी है.

कुल-मिलाकर लोभ-लालच के इस दुष्चक्र में ‘हिपोक्रेटिक ओथ’ का कोई मतलब नहीं रह गया है. क्या आपने कभी सोचा है कि रुपया कमाने की मशीन होने से अलग आप एक युवा संवेदनशील इंसान भी हैं जो एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ समृद्धि और विलासिता की कुछ मीनारें खड़ी हैं जिनके तलघर के अँधेरे में बहुसंख्यक आबादी नारकीय जीवन जी रही है? क्या आपने कभी सोचा कि महँगी मेडिकल शिक्षा, नकली दवाओं के कारोबार, स्वास्थ्य क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और दवा कम्पनियों की भयंकर मुनाफ़ाख़ोरी के विरुद्ध एकजुट होकर आवाज़ उठाना आपका एक बुनियादी इंसानी दायित्व भी है, और डॉक्टर के नाते भी आप इनसे आँखें नहीं मूँद सकते. डॉक्टरों की बड़ी आबादी धन का अम्बार खड़ा करने की बीमार चाहत से मुक्त होकर इन तमाम अँधेरगर्दियों के ख़ि‍लाफ़ आवाज़ उठाने के लिए कमर कस ले तभी वे सही अर्थों में अपना दायित्व निभा सकते हैं. मेक्सिको के डेविड वर्नर, कनाडा के नॉर्मन बैथ्यून, क्यूबा के चे ग्वेवारा, भारत के डॉक्टर कोटनिस, छत्तीसगढ़ के शहीद अस्पताल के डॉक्टरों सहित ऐसे अनेक डॉक्टर रहे हैं जो अपने पेशे को सामाजिक दायित्व से जोड़कर देखते रहे हैं. समाज की मूल बीमारी अगर शोषण और अन्याय है तो एक डॉक्टर को इस सामाजिक बीमारी के इलाज के बारे में भी सोचना ही होगा. स्वास्थ्य सेवा एक जनतांत्रिक समाज में जनता का मूलभूत अधिकार है. इस अधिकार को हासिल करने की लड़ाई में जनता का साथ देने के बजाय जो डॉक्टर केवल अपने परिवार के लिए ज़्यादा से ज़्यादा साधन जुटाने और धन का अम्बार लगाने के बारे में सोचता है वह चाहे या अनचाहे जनता का ख़ून चूसने वालों की जमातों में शामिल हो जाता है.

आपको सोचना ही होगा कि आपको किसी ग़रीब के हड़ीले हाथों की नब्ज़ टटोलते हुए उसकी नसों से ख़ून निचोड़ लेने वाला डॉक्टर ड्रैक्युला बनना है या जनता की सेवा करने वाला एक सच्चा डॉक्टर बनना है! फ़ैसला आपको करना होगा, और जल्दी करना होगा!! वरना आप ड्रैक्युला में तब्दील हो जायेंगे और आपको पता भी नहीं चलेगा!!!

हमारी यह अपील उन युवा दिलों से है जो अभी घाघ और दुनियादार नहीं बने हैं. जो बेरहम-धनलोलुपों की जमात में दिल से शामिल नहीं हुए हैं. जिनके अन्दर मनुष्यता बची है और जो अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए तैयार हैं. यदि आप सोचते हैं कि इस दिशा में सार्थक सामूहिक कोशिश की जानी चाहिए तो हमसे ज़रूर सम्पर्क कीजिये.

(सौजन्य: नौजवान भारत सभा)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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