/* */

कपिल सिब्बल की सीसीई प्रणाली: ” टके सेर भाजी, टके सेर खाजा…”

Page Visited: 153
0 0
Read Time:12 Minute, 53 Second

– शिवनाथ झा।।

आज भले ही स्कूली छात्र-छात्राओं और उनके अभिभावकों द्वारा केंद्र सरकार की नवीनतम शिक्षा प्रणाली Continuous & Comprehesive Evaluation System (सीसीई सिस्टम) का विरोध ना किया गया हो, आने वाले दिनों में यही वर्ग भारत के शिक्षा-प्रणाली के इतिहास में पूर्व-प्रधान मंत्री विश्वनाथ प्रसाद सिंह की तरह वर्तमान मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल का नाम “काले अक्षर” में लिखेंगे जब “विषय के मूल ज्ञान के आभाव में” बेरोजगारों की अनंत-कतार में अपने “भविष्य” को आंकेंगे।

कपिल सिब्बल या उनके चादर के अन्दर ‘संरक्षण’ ले रहे और ‘पल रहे’ समस्त शिक्षाविद (तथाकथित शिक्षाविद सहित), चाहे लाल किला या फिर इंडिया गेट पर चढ़कर डंके की चोट पर इस बात का दावा करें की उनकी सरकार शिक्षा के क्षेत्र में “आमूल परिवर्तन” लाने के लिए वचनबद्ध है, परन्तु, सच्चाई यह है की नई सीसीई शिक्षाप्रणाली एक ओर जहाँ आने वाले वर्षों में “मूर्ख मानव संसाधन” का एक विशाल जमघट खड़ा करने पर आमादा है वही सरकारी से गैर-सरकारी और निजी विद्यालयों में काम करने वाले शिक्षक-शिक्षिकाओं को छात्र-छात्राओं और उनके अभिभावकों के सामने ‘मानसिक तौर पर निवस्त्र’ कर दिया है।

मानव संसाधन मंत्रालय के एक वरिष्ट अधिकारी का मानना है कि “वैसे पिछले वर्षों में (वर्तमान सीसीई प्रणाली लागू होने के बाद) दसवीं परीक्षा परिणाम के पश्च्यात अनुत्तीर्ण हुए या अपेक्षा से कम अंक प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राओं द्वारा किये जाने वाले ख़ुदकुशी को प्रत्यक्ष रूप से कम किया है, लेकिन यह परिणाम सिर्फ तत्कालीन है। इसके दूरगामी परिणाम बहुत ही खतरनाक होंगे जब यह वर्ग अपने हाथ में डिग्री लेकर सड़कों पर नौकरी या रोजगार के अवसर की तलाश में दर-दर भटकेंगे क्योंकि एक विशाल समूह के पास विषय का मूल ज्ञान का पर्याप्त अभाव होगा”।

इस प्रणाली की सबसे बड़ी “खामी” यह है कि इसने छात्र-छात्राओं द्वारा परीक्षा में प्राप्त अंको को गुप्त रखा है और उसे ग्रेड में दर्शाया है ताकि परीक्षा-परिणाम के तुरंत बाद (ऐसे समय में ही छात्र-छात्राएं ख़ुदकुशी को ओर बढ़ते हैं) उन्हें अपने अंको का पता ना चले, साथ ही, कमजोर छात्र-छात्राओं को परीक्षा उत्तीर्ण करने हेतु न्यूनतम अंक (33-40) (ग्रेड) प्राप्त करने के लिए “तीन अवसर” तो दिए गए हैं, परन्तु, स्कूलों को यह भी निर्देश है कि “किसी भी हालत में सम्बद्ध बच्चे को उस वर्ग में अनुत्तीर्ण घोषित नहीं किया जा सकता है।”

‘स्कोलास्टिक एरिया – ए’  में कुल नौ ग्रेड बनाये गए है: ए-1 (91 -100  ग्रेड पॉइंट – 10), ए -2 (81-90 ग्रेड पॉइंट – 9), बी -1  (71 -81 ग्रेड पॉइंट – 8), बी – 2  (61 -70 ग्रेड पॉइंट – 7), सी -1  (51 -60 ग्रेड पॉइंट – 6), सी – 2 (41 -50 ग्रेड पॉइंट – 5), डी(33-40 ग्रेड पॉइंट – 4), ई -1  (21-32) और ई -2  (00-20) जो मूलतः पांच ग्रेड ‘ए+’, ‘ए’, ‘बी+’, ‘बी’, और ‘सी’ ग्रेड के रूप में क्रियान्वित हुए हैं। जबकि, को-स्कोलास्टिक एरिया में तीन एरिया – लाइफ स्किल्स (‘ए+’, ‘ए’, ‘बी’ ग्रेड), अत्तिचुड एंड वैल्यू (ए+, ए, और बी ग्रेड) और अक्तिविटी और क्लब (ए+, ए और बी ग्रेड) क्रियान्वित किये गए हैं।

दुर्भाग्य यह है कि केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) अपनी स्थापना के 48 साल बाद जिस तरह से इस नए प्रणाली को  क्रियान्वित किया है वह देखने या सुनने में भले ही आकर्षित करता हों, लेकिन सत्य यह है की इसके क्रियान्वयन में स्कूल या स्वयं (सीबीएसइ) बच्चो और अभिभावकों को जिस तरह अंधकार में रखा है वह छात्र-छात्राओं के भविष्य के साथ एक “खिलवाड़” है। यह प्रणाली, एक ओर जहाँ शिक्षक/शिक्षिकाओं को “ओवर-बर्डेन” किया है, वही दूसरी ओर छात्र-छात्राओं को को-स्कोलास्टिक एरिया की ओर उन्मुख कर उसे विषय के मूल-ज्ञान से दर-किनार कर दिया है।”

इतना ही नहीं, छात्र-छात्राओं के मन में यह बैठ जाना कि इस नए प्रणाली के अधीन, ‘किसी भी परिस्थिति में शिक्षक उन्हें अनुत्तीर्ण घोषित नहीं कर सकते है’ या उन्हें किसी भी प्रकार से  ‘दण्डित’ भी नहीं कर सकते है (चाहे स्कूल में उनका कैसा भी व्यवहार हों), सिवाय इसके कि वे (शिक्षक/शिक्षिकाएं) उनके डायरी पर उनके अभिभावक के नाम एक नोट लिख दे, स्कूली वातावरण को विषाक्त कर रहा है।

दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग में पदस्थापित एक अधिकारी कहते हैं: “आप अब किस गुरु-शिष्य परंपरा की बात करते है? आज शायद ही कोई ऐसा दिन होता होगा जहाँ देश के विभिन्न स्कूलों में शिक्षक/शिक्षिकाओं को स्कूली छात्र-छात्राओं के अभिभावक मानसिक तौर पर यातनाएं नहीं देते हों। छोटी-छोटी बातों पर अभिभावक धमकी देते हैं, आप उनके बच्चों के साथ शख्ती ना बरतें। इससे शिक्षक/शिक्षिकाओं को क्या होगा? बच्चे आम तौर पर साढ़े-पांच घंटे स्कूल में होते हैं, शेष समय घर पर अपने माता-पिता के साथ। जब उनके माता-पिता इस प्रणाली को ही समझने को तैयार नहीं है तो कल उनके बच्चे उनके ही सर पर बैठ कर तांडव करेंगे ! शिक्षकों का क्या जायेगा? विभाग में शिक्षकों के लाखों ऐसे शिकायत मिले हैं, लेकिन हम उनके शिकायतों को दूर नहीं कर सकते।”

जरा इस प्रणाली के अधीन बच्चों को अगले वर्ग में जाने की बात को देखिये। अगर कोई बच्चा “डी” ग्रेड लाता है, यानि उसका अंक 33-40 प्रतिशत के बीच है तो उसे अगले वर्ग में भेजना ही पड़ेगा। इतना ही नहीं, “ई-1” या “ई-2” ग्रेड पाने वाले, यानि 00 से 32 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राओं को इस प्रणाली के अधीन तीन बार तक अवसर दिए जायेंगे ताकि वह “डी-ग्रेड” प्राप्त कर अगले वर्ग में दाखिला ले सके। परन्तु, किसी भी हालत में स्कूल या शिक्षक उसे ‘अनुत्तीर्ण’ घोषित नहीं कर सकते हैं। ऐसे कार्य को करने के लिए इस प्रणाली के तहत स्कोलास्टिक एरिया या को-स्कोलास्टिक एरिया के तहत प्रत्येक स्कूल और शिक्षकों को 100 प्रतिशत में से 60 प्रतिशत अंक देने का प्रावधान है।

जरा सोचिए, जब बच्चे को गणित में, या विज्ञान में, या अंग्रेजी में 5 से 10 अंक आएंगे और प्रदत अधिकार के अधीन शिक्षक/शिक्षिकाएं उसे उन एरिया में प्राप्त अंक को जोड़ कर और औसत अंकों के आधार पर उसे उत्तीर्ण घोषित कर देंगे तो बच्चा पास तो हो जाएगा लेकिन किस काम का?

लेकिन, दसवीं परीक्षा के बाद, देश के सभी स्कूलों को ‘अकस्मात्’ एक “छुट्टे सांड” की तरह छोड़ दिया गया है और उसे छात्र-छात्राओं का “भाग्य विधाता” भी बना दिया गया है। जब कोई बच्चा दसवीं परीक्षा पास करेगा तब ग्यारहवीं कक्षा में दाखिले के समय स्कूल इस बात का निर्धारण करेगा कि बच्चों को कौन सा “स्ट्रीम” या “विषय” दिया जाए। यहाँ बच्चे ही नहीं, बच्चे के ज्ञानी माता-पिता, जो बच्चों के स्कूली दिनों में उसके “स्कॉलिस्टिक एरिया” (विषय ज्ञान) को तबज्जो ना देकर “को-स्कॉलिस्टिक एरिया” (एक्टिविटी एरिया) में बच्चों की अभिरुचि को देखते हुए, शिक्षकों को अनेकों बार अपमानित किए होते हैं, “बौनों” या “भीगी बिल्ली” की तरह स्कूल-प्रशाशन के सामने नतमस्तक रहते हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ प्रोफ़ेसर का कहना है, “सामान्यतः स्वतंत्रता के बाद देश में अगर किसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा प्रयोग हुआ है तो वह है शिक्षा प्रणाली। गैर-सरकारी या एनजीओ द्वारा किए गए कार्य और प्राप्त आंकड़ों के आधार पर, साथ ही, सरकारी महकमे के चंद चापलूस शिक्षा विदों और अधिकारियों के साथ-गाँठ से हमेशा शिक्षा-नीतियों और पद्धतियों में परिवर्तन किये जाते रहे है। शासन की यह पहल (उसके अनुसार) ‘आम बच्चो’ को नजर में रखकर किया जाता है। लेकिन जब आप अखिल भारतीय स्तर पर रोजगार के लिए चाहे वह सिविल सर्विस की परीक्षा हों या बैंकों का या किसी वैज्ञानिक अनुसन्धान/ डाक्टर या इंजीनियरिंग की परीक्षा, इसमें सिर्फ वही छात्र-छात्राएं अव्वल आते है और दाखिला पाते हैं, जिन्हें स्कॉलिस्टिक एरिया (विषय ज्ञान) है। यहाँ को-स्कॉलिस्टिक एरिया का महत्व नगण्य है।”

दिल्ली की ही एक शिक्षविदुषी श्रीमती रश्मि सिंह, जिनकी बेटी बारहवीं में पढ़ती है, का कहना है कि “इस प्रणाली शिक्षा पद्धति को मूलरूप से नेस्त-नाबूद कर दिया है। इस प्रणाली के लागू होने के बाद से पढ़ने वाले बच्चे काफी टेंशन में जी रहे हैं, जबकि नहीं-पढ़ने वाले खुश।”

बहरहाल, पिछले दिनों, सिब्बल ने कहा था: “हमें उन बच्चो की चिंता नहीं है जिन्हें विषय ज्ञान में अभिरुचि है या जो पढने में अव्वल है या फिर किसी भी अखिल भारतीय स्तर पर संचालित परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते हैं; हमें और हमारी सरकार को देश के विभिन्न भागों, गाँव और कस्बों में रह रहे बच्चो को देखना है और उन्हें शिक्षा के मुख्य धारा से जोड़ना है।” यानि, हरेक माल एक रूपये।

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

12 thoughts on “कपिल सिब्बल की सीसीई प्रणाली: ” टके सेर भाजी, टके सेर खाजा…”

  1. महोदय ,
    अपने सत्य कहा है , सी सी ई प्रदाली के आने वाले वर्षो में अत्यंत ही दुष्परिणाम निकलेंगे , मन लुभावन इस प्रदाली को अभिभावक और विद्यार्थी भले ही ठीक मान रहे हो लेकिन एक अध्यापक ही जानता है कि इसका परिणाम क्या होगा . ये विद्यार्थियों की एक ऐसी फौज खड़ी कर देगा जिसे किसी विषये की पूर्ण जानकारी नहीं होगी . पब्लिक स्कूल में तो फिर भी विद्यार्थी ध्यान देते है पर सरकारी विद्यालयों में बहुत बुरा हाल है . बच्चो में इस सिस्टम के वजहे से नैतिक मूल्यों का स्तर गिरता जा रहा है . शिक्षको पर दबाव बहुत बढ़ गया है की बच्चो को पास करना ही है . मै स्वयम एक अध्यापिका हूँ इसीलिए इस सिस्टम के दुष्परिणाम जानती हूँ . ये अत्यंत दुखदाई है . जो एक बोझ बन गया है . अभी शिक्षको पर है फिर विद्यार्थियों पर फिर अभिभावकों पर फिर एक दिन पुरे समाज व् देश पर बोझ होगा .

  2. शिवनाथ झा जी ने जो कुछ भी लिखा है वह पूरी तरह सत्य है ….. कपिल शिब्बल ने जिस तरह से शिछा का सत्यानाश किया है शायद ही कोई दूसरा कर सकता था ..आज उन्होंने जो नई सी.सी.इ. प्रदाली लागु की है यह पूरी तरह छात्रो को निरंकुश बना रही है…और इसका परिणाम हमें आने वाले समय में देखने को मिलेगा. बिना लिखे -पड़े पास होने की परंपरा ………….आने वालो दस साल के बाद हम बिना पड़े- लिखे डिग्री वाले लोंगो की भीड़ देंखेगे …….देश और देश की जनता के साथ कांग्रेस और सिब्बल का सबसे बड़ा धोखा …………

  3. शिवनाथ जी, आपकी कलम में जादू है. इतने गंभीर विषय को सरलता से समझाया है ! सिब्बल जी का नाम सुधाराकजी रखना ज्यादा उचित होता. भारतीय विद्यार्थियों का भविष्य अंधकारमय हो गया है. इस सुधार की बया को रोकना अति आवश्यक है.

  4. काफी समय बाद सिक्षा पर इतना सशक्त लेख पढ़ा, यह सिर्फ शिवनाथ झा का कलम से ही संभव है ….Shiksha ke maayne badal kar vaivasaya ho gaya hai…schools vidhalaya se brand me tabdil ho gaye hai…bachche ki padhai status symbol ban chuka hai…shiksha aur sakcharta mein jayada fark nahi rah gaya hai…Shiksha ke saath sanskaar bhi jaroori hai…humme samay nikalna chahiye taki poorna siksha aur achche sanskaar apne santaan ko de paye…Apka yeh lekh eye opener hai.

  5. Shiksha ke maayne badal kar vaivasaya ho gaya hai…schools vidhalaya se brand me tabdil ho gaye hai…bachche ki padhai status symbol ban chuka hai…shiksha aur sakcharta mein jayada fark nahi rah gaya hai…Shiksha ke saath sanskaar bhi jaroori hai…humme samay nikalna chahiye taki poorna siksha aur achche sanskaar apne santaan ko de paye…Apka yeh lekh eye opener hai.

  6. सही फ़रमाया आपने। यह उन दिनों की बात है जब मैं गणित का शिक्षक हुआ करता था। कई बार मुझे ऐसे छात्र मिले जिन्हें एक कक्षा से दूसरी कक्षा में उत्तीर्ण होने में कठिनाई पेश आती थी। जब किसी वाक्य को समीकरण में बदलने की ज़रूरत होती थी तो उन्हें मानो “किसी संख्या (x) के दुगने से एक अधिक” का तात्त्पर्य 2x + 1 होगा इतनी सी बात भी समझ में नहीं आती थी। ज़ाहिर है उनके समीकरण भी ग़लत होते थे और समाधान भी। अब ऐसे छात्रों को अगर “पास” करार दिया जाए तो इस देश का भविष्य तो राम भरोसे ही चलेगा, न?

  7. Today in India , the several Chandraguptas waiting to be discovered, encouraged …..unfortunately , so few like Chanakyas.!!! ,and parents are helpless to ,raise a voice against the CCE system, this system ,eliminating the spirit of competitiveness,amongst the student ! the condition of new education policy is worst than the policy which were being formulated by Britishers !!

  8. शिवनाथ भाई …. में जर्नल परमोसन का शिकार रहा हु ….अर्जुन सिंह की देन थी …. इंदिरा गंधी के मरनोप्रान्त वोट की राजनीत का शिकार हम छात्रों को बनाया गया इसका प्रभाव तो मरे जीवन पर अमिट है…कपिल के इस चोके छके को भी सब को भोगना होगा ….

  9. हर माता-पिता को अपना संतान बहुत “दुलारा” होता है चाहे धनाढ्य का हों या गरीब का.
    आचार्य चाणक्य ने कहा था: “बचपन में संतान को जैसी शिक्षा दी जाती है, उनका विकास उसी प्रकार होता है. इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे उन्हें ऐसे मार्ग पर चलाएँ, जिससे उनमें उत्तम चरित्र का विकास हो क्योंकि गुणी व्यक्तियों से ही कुल की शोभा बढ़ती है. वे माता-पिता अपने बच्चों के लिए शत्रु के समान हैं, जिन्होंने बच्चों को ‍अच्छी शिक्षा नहीं दी। क्योंकि अनपढ़ बालक का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार अपमान होता है जैसे हंसों के झुंड में बगुले की स्थिति होती है। शिक्षा विहीन मनुष्य बिना पूँछ के जानवर जैसा होता है, इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों को ऐसी शिक्षा दें जिससे वे समाज को सुशोभित करें.”
    आज के युग में “समय बहुत महत्वपूर्ण” है – विशेषकर कामकाजी माता-पिता और अभिभावक के लिए. लेकिन आपको अपने संतान के “उज्जवल भविष्य ” के लिए समय निकलना होगा. आपके बच्चे को विषय का कितना ज्ञान है, एक बार जरुर उसे “टटोलें” इससे पहले की देर हों.

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Visit Us On TwitterVisit Us On FacebookVisit Us On YoutubeVisit Us On LinkedinCheck Our FeedVisit Us On Instagram