सुनंदा पुष्कर ही नहीं बल्कि नार्थ ईस्ट के छात्र नीडो तानिया की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट बदलने के लिए भी था दवाब..

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पूर्व केन्द्रीय मंत्री शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट बदलने के लिए ही नहीं बल्कि नार्थ ईस्ट के छात्र नीडो तानिया की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट बदलने के लिए भी एम्स के फारेंसिक विभाग के अध्यक्ष पर दवाब बनाया गया था. हालांकि विभागाध्यक्ष ने दवाबों के बावजूद निष्पक्ष रिपोर्ट देने की बात कही है.sunanda pushkar

पोस्ट मार्टम रिपोर्ट में हेरफेर की यह बात एम्स में पदोन्नति विवाद के चलते सामने आई है. केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन को लिखे पत्र में डॉ. सुधीर गुप्ता ने कहा कि एम्स में मेरी जगह डॉ. ओपी मूर्ति को विभागाध्यक्ष बनाने की कोशिश की जा रही है. इसी क्रम में डॉ. सुधीर ने सुनंदा पुष्कर और नीडो तानिया के पोस्टमार्टम का हवाला देते हुए कहा कि विभागाध्यक्ष के पद को बचाने के लिए मुझसे दोनों मामलों में गलत रिपोर्ट देने के लिए कहा गया था, बावजूद इसके मैने रिपोर्ट में कोई बदलाव नहीं किया.

सुनंदा पुष्कर की मौत आकस्मिक आप्राकृतिक मौत थी, जबकि नीडो तानिया की मौत पिटाई की वजह से हुई थी. स्वास्थ्य मंत्री को लिखे पत्र में कहा गया कि रिपोर्ट न बदलने के एवज में अब मुझे पद से हटकर डॉ. ओपी मूर्ति को विभागाध्यक्ष बनाने की तैयार की जा नही है.

यह निर्णय यूपीए सरकार के जाने से ठीक तीन दिन पहले ही जीबी की बैठक में ले लिया गया था. इस संदर्भ में डॉ. सुधीर ने कैट (सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल) को भी पत्र लिखा है. वहीं इससे पहले डॉ. सुधीर गुप्ता के पत्र के बाद केन्द्रीय मंत्री ने एम्स से दोनों मामले की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट मांगी है. मालूम हो कि पूर्व केन्द्रीय मंत्री की पत्नी सुनंदा पुष्कर का शव चाणक्यपुरी के लीला होटल में 16 जनवरी को पाया गया था. सुनंदा के शरीर चोट के निशान था, जबकि हाथ पर दांत से काटने के निशान भी देखे गए थे.

एम्स प्रशासन ने किया खंडन
एम्स प्रशासन ने देर शाम सुनंदा पुष्कर मामले में प्रेस कांफ्रेंस कर फारेंसिक विभाग के प्रमुख के सभी आरोपों का खंडन किया है. एम्स प्रवक्ता डॉ. सुधीर गुप्ता और नीरजा भाटला ने बताया कि इस बात का कोई सुबूत नहीं है कि डॉ. सुधीर गुप्ता पर सुनंदा पुष्कर और नीडो तानिया की ऑटोप्सी या पोस्ट मार्टम रिपोर्ट बदलने के लिए किसी तरह का दवाब था, डॉ. सुधीर गुप्ता द्वारा लगाए गए आरोप बेबुनियाद हैं. हालांकि पूरे मामले पर डॉ. सुधीर ने बात करने से इंकार कर दिया, उन्होंने कहा कि मैं एक सरकारी कर्मचारी हूं और अपना पक्ष कैट के समक्ष दे चुका हूं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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