चौहान, मनोहर, वसुंधरा और रमण सिंह भाजपा में हाशिये पर..

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मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जिन्हें लाल कृष्ण अडवाणी की आँख का तारा और संघ के बेहद करीब माना जाता था, आज कल अलग थलग पड़ते नज़र आ रहे हैं. शिवराज सिंह चौहान जिन्हें एक समय में प्रधानमंत्री पद की दौड़ में देखा जा रहा था अब व्यापम घोटाले के सामने आने बाद से पार्टी में हाशिये पर भेज दिए गए से लगने लगे हैं. उन्हें भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से उपेक्षा ही मिलती दिखाई दे रही है. गौरतलब है पिछले साल के अंत में सामने आये इस घोटाले में संघ और मध्य प्रदेश सरकार के कई बड़े नाम सामने आये हैं, लेकिन भाजपा की तरफ से बचाव की कोई बड़ी कोशिश नहीं की जा रही है.vasundhara_raman_shivraj

हालांकि चौहान हाशिये पर भेजे जाने वालो में अकेले नहीं हैं. राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह और गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर भी भाजपा के कद्दावर नेताओं में शुमार किये जाते हैं लेकिन केंद्र में सरकार बनने के बाद से लगातार उपेक्षा की दृष्टि से देखे जा रहे हैं. भाजपा नेताओं का ये भी मानना है कि वसुंधरा राजे केंद्रीय मंत्री निहालचंद मेघवाल के लिए अन्दर ही अन्दर मुसीबतें खड़ी करने में व्यस्त हैं. मेघवाल पर बलात्कार का आरोप लगा है जबकि उस पद के लिए राजे के पुत्र दुष्यंत के नाम पर विचार किये जाने के बाद इंकार कर दिया गया था. इसी तरह भाजपा का एक हिस्सा रमण सिंह को दुर्ग में हार का दोषी मानता है जहाँ भाजपा ने ग्यारह में से अकेले एक दुर्ग की सीट गंवाई थी.

इन सब घटनाओं के बीच जो सबसे चौंकाने वाली बात सामने आ रही है वो है केंद्रीय सत्ता पाने के बाद मोदी के अंदरूनी विरोधियों के साथ असहयोग और करीबियों का उत्थान. प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी के प्रतिद्वंदी रहे सभी नेताओं के साथ लगभग पराया व्यव्हार जगज़ाहिर है. एक तरफ अडवाणी के करीबी चौहान इस समय संकट में नज़र आ रहे हैं, वसुंधरा की सरकार के बारे में भी अटकलों का दौर जारी है और संघ पर भी साख बचाने का भारी दबाव है, वहीँ मोदी के करीबी अमित शाह को भाजपा में सर्वोच्च पद दिए जाने की पुष्टि हो चुकी है.

जिस तरह से नरेंद्र मोदी के आने के बाद से भाजपा में बड़े नेता हाशिये पर भेजे जा रहे हैं उसे देख कर यही लगता है कि मोदी अपनी निरंकुश छवि के साथ जा रहे हैं और अपनी जड़ें मज़बूत करने के लिए दूसरों की जड़ें काटने का काम करवा रहे हैं क्यों कि मोदी जानते हैं लम्बे समय तक पॉवर में बने रहने के लिए अंदरूनी प्रतिद्वंद्विता ही सबसे बड़ा रोड़ा साबित हो सकती है. 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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