समाचार-साप्ताहिक सब हो गए परचे..

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-ओम थानवी।।

अज्ञेय को लेकर जितनी झूठी बातें उनसे रश्क करने वाले लोगों ने प्रचारित की हैं, हिंदी में कोई दूसरा लेखक शायद ही ऐसे दुष्प्रचार का शिकार हुआ होगा। इसलिए मुझे हैरानी नहीं हुई जब एक ‘मित्र’ ने अज्ञेय की इमरजेंसी वाली कविता पर मेरी पोस्ट पर लिखा कि “अज्ञेय सबसे पहले इमरजेंसी के समर्थन में बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में थे। बाद में विरोधी हो गए होंगे।” इससे बड़ा झूठ अज्ञेय के बारे में मैंने पहले नहीं सुना। “बयान पर हस्ताक्षर” अब कहां चले गए? किसी विदेशी लाकर में रखे हैं? हम अपने श्रेष्ठ साहित्यकारों के बारे में कितने गिरे हुए ढंग से पेश आते हैं।agyeya

सच्चाई यह है कि साहित्य हो चाहे जीवन — व्यक्ति-स्वातन्त्र्य और स्वातन्त्र्यचेता समाज हमेशा अज्ञेय की मूल चिन्ताओं के केन्द्र में रहे। साहित्य के उदाहरण तो उनके लेखन में जगह-जगह मौजूद हैं, जीवन के प्रसंग “अपने अपने अज्ञेय” में आपको बहुत मिल जाएँगे; संस्मरणों का यह संग्रह दो खंडों में मैंने अज्ञेय जन्मशती पर संपादित किया था (वाणी प्रकाशन से छपा है), उसकी भूमिका में मैंने लिखा था:

व्यक्ति-स्वातन्त्र्य में विश्वास का ही परिणाम था कि अज्ञेय हर तरह के फासीवाद और अधिनायकवादी प्रवृत्तियों के विरुद्ध खड़े हुए। देश में आपातकाल की घोषणा ने उन्हें बहुत उद्वेलित किया था। वे साहित्य में तात्कालिकता के पक्षधर नहीं थे, लेकिन मानवीय तकाजे से जैसे बँटवारे और हिन्दू-मुसलिम द्वेष पर उन्होंने कलम चलाई, आपातकाल के विरोध में भी कविताएँ लिखीं। राय आनन्दकृष्ण लिखते हैं कि “आपातकाल में अज्ञेय बहुत क्षुब्ध थे और अपने स्वभाव के अनुसार आक्रोश व्यक्त करते थे।” आपातकाल के चलते बीकानेर में एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने स्वतंत्रता को परम मूल्य बताते हुए आपातकाल के ‘दमघोंटू माहौल’ की निंदा की।

‘चुप की दहाड़’ नामक एक लेख (जोग लिखी, 1977) में अज्ञेय लिखते हैं — “जिन्होंने आपातकाल का और उस दौरान किए गए अत्याचारों का खुला या गुप्त समर्थन किया, वे अवश्य ही निंदा के पात्र हैं।”

अज्ञेय पर चली एक बातचीत के दौरान विश्वनाथ त्रिपाठी ने मुझे बताया कि आपातकाल में प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े कुछ लेखकों को साथ लेकर वे अज्ञेय के घर गए थे और उनसे आपातकाल के समर्थन में एक अपील पर हस्ताक्षर करने का आग्रह किया था। अज्ञेय ने हस्ताक्षर करने से साफ इनकार कर दिया। त्रिपाठी जी ने यह भी बताया कि लेखक संघ का कार्यक्रम बाद में श्रीमती इंदिरा गांधी के घर जाकर समर्थन व्यक्त करने का था। पता नहीं किस उम्मीद से वे लोग अज्ञेय को भी साथ ले जाना चाहते थे। अज्ञेय ने उन्हें बेतरह निराश किया। बाद में – त्रिपाठी जी के अनुसार – भीष्म साहनी के नेतृत्व में शिवदान सिंह चौहान, रजिया सज्जाद जहीर, त्रिपाठी जी स्वयं और कुछ अन्य लेखकों की टोली श्रीमती गांधी के घर पहुंची।

आपातकाल में प्रगतिशील लेखकों के रवैये से अज्ञेय को शायद हैरानी नहीं हुई होगी। लेकिन रघुवीर सहाय जैसे समाजवादी लेखकों के बर्ताव ने उन्हें इतना बेचैन किया कि ‘दिनमान’ (जिसके संस्थापक-संपादक अज्ञेय स्वयं थे) के लंबलेट हाल पर उन्होंने अपनी डायरी में एक तुक्तक ही रच दिया थाः
“धीरे-से बोले अज्ञेय जीः अगरचे
शुरू मैंने ही किए थे ‘चरखे और चरचे’
आया जो आपात-काल
सूरमा हुए निढाल
समाचार-साप्ताहिक सब हो गए परचे!”

आपातकाल के दौरान प्रसिद्ध मराठी लेखिका दुर्गा भागवत के मुखर विरोध से अज्ञेय हर्षित हुए थे। उस दौर में अज्ञेय पर नजर रखे जाने के बावजूद उनके भाषणों को सरकार ने या तो नजरअंदाज कर दिया, या उनकी भनक सरकार तक नहीं पहुंची; पर मुंबई में दुर्गा भागवत को गिरफ्तार कर लिया गया। फिर कुछ लोगों ने दुर्गा ताई पर निशाना साधा तो ‘चुप की दहाड़’ लेख लिखकर अज्ञेय ने दुर्गा जी का पुरजोर समर्थन किया। बाद में ‘परिवेश और साहित्यकार’ विषय पर हमने माउंट आबू में वत्सल निधि का जो लेखक शिविर आयोजित किया, उसके उद्घाटन के लिए अज्ञेय ने दुर्गा भागवत को ही आमंत्रित किया। वयोवृद्ध दुर्गा जी ने मराठी में बड़ा ओजस्वी भाषण दिया। बाद में शिविर के परचों की पुस्तक (साहित्य का परिवेश, 1985) की भूमिका में दुर्गा जी के भाषण को याद करते हुए अज्ञेय ने लिखाः “मुख्य अतिथि के रूप में श्रीमती दुर्गा भागवत के चुनौतियों-भरे उद्बोधन से प्रेरित विचार-विमर्श की गूंज-अनुगूंज से नक्की झील के किनारों की सड़कें और पगडंडियां सप्ताह-भर थरथराती रहीं।”

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी (अभी साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष) ने उचित ही लिखा है – “वात्स्यायनजी (अज्ञेय) ने कभी सत्ता की चापलूसी नहीं की, न शब्द में न कर्म में। एक स्वतंत्र स्वाभिमानी लेखक के रूप में जो उचित समझा, वही लिखा। आपातकाल में बराबर सत्ता का विरोध करते रहे। आपातकाल के अपने एक भाषण में उन्होंने कहा था, ‘इस समय देश की प्रवृत्ति अनुशासन पर जोर देने की है। जो कह दिया उसे मान लेना अनुशासन है। क्या सोचना अनुशासन नहीं है? जो देश या समाज स्वतंत्र ढंग से सोच नहीं सकता वह स्वतंत्र नहीं हो सकता।’ स्वाधीनता को जीवन का चरम मूल्य स्वीकार करने वाले वात्स्यायनजी अपनी शर्तों पर जिये…।”

(वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता के संपादक ओम थानवी की फेसबुक वाल से)

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