वजीरपुर औद्योगिक क्षेत्र में मजदूर संघर्ष की राह पर..

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-प्रदीप सिंह||

लुटियन की दिल्ली जश्न में माहौल है. तो दिल्ली के औद्योगिक क्षेत्र वजीरपुर में तनाव है. हजारों मजदूर अपने हक की मांग करते हुए आंदोलन की राह पर हैं. फैक्ट्री मालिकों के शोषण से तंग होकर वे बीस दिनों से धरना-प्रदर्शन करके अपने हक की मांग कर रहे है. वजीरपुर औद्योगिक क्षेत्र के राजा पार्क में पांच सू़त्रीय मांग को लेकर धरना दे रहे मजदूरों की आंखों में बेहतर भविष्य का सपना है. दिल में समझौता विहीन संघर्ष का हौसला लिए वह इस असहनीय गर्मी में अपने हक की मांग बुलंद कर रहे हैं. एक पखवाड़े से भी अधिक समय बीत गया. लेकिन शासन-प्रशासन से कोई संतोषजनक आश्वासन नहीं मिला है. हड़ताल को खत्म करने के लिए फैक्ट्री मालिक उनकी मांग को मानने की जगह हड़ताल खत्म होने की अफवाह फैला रहे हैं. लेकिन गरम रोला मजदूर अपनी लड़ाई को मंजिल तक पहुँचाने की ठान चुके हैं.photo-2

वजीरपुर औद्योगिक क्षेत्र के 23 गरम रोला (हॉट रोलिंग) कारखानों के करीब 1600 मजदूर ‘‘ गरम रोला मजदूर एकता समिति ’’ के नेतृत्व में 6 जून से हड़ताल पर हैं. वजीरपुर औद्योगिक क्षेत्र में स्टील के बर्तन बनाने की सैकड़ों फैक्ट्रियां है. पूर्वांचल, बिहार, झारखंड और मध्यप्रदेश से आए हजारों मजदूर उन फैक्ट्रियों में काम करते हैं. फैक्ट्री मालिक खुलेआम श्रम कानूनों का उल्लंघन कर रहे हैं. मजदूरों से 12 घंटे काम लेने के बावजूद सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतनमान नहीं दिया जाता है. पी एफ, ईएसआई देने की कौन कहे, मजदूरों को साप्ताहिक अवकाश भी नहीं मिलता है. वजीरपुर स्टील इंडस्ट्री पूरे देश में प्रसिद्ध है. जहां करीब 600 फैक्टरियां हैं. मजदूर बाबूराम कहते हैं कि ‘‘आये दिन मजदूरों के हाथ कटते रहते हैं और कारखानों में बिल्कुल अमानवीय हालत में मजदूर काम करते हैं. मालिक इनके श्रम का वाजिब मूल्य देने के बजाए इन्हें मुनाफा बनाने की मशीन बना दिया है. सबसे बड़ी बात तो यह है कि मालिकों का मुनाफा तो लगातार बढ़ रहा है. लेकिन मजदूर खस्ताहाल हैं. वजीरपुर में ही भविष्य निधि भवन का दफ्तर है लेकिन किसी भी मजदूर को पी.एफ. की सुविधा नहीं मिलती है.’’

मजदूरों की मांग पर सहानुभूति पूर्वक विचार करने की जगह फैक्ट्री मालिक हड़ताल को तोड़ने का षडयंत्र कर रहे हैं. फैक्ट्री मालिक पहले तो मजदूर नेताओं को झूठे मुकदमों में फंसाकर हड़ताल को तोड़ने की कोशिश की. लेकिन इसमें सफलता नहीं मिलने पर अपने पिट्ठू और दलाल टेªड यूनियन नेताओं द्वारा मजदूरों में फूट डालने और अफवाह फैलाकर हड़ताल को समाप्त करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन मजदूरों की आपसी एकता के कारण फूट डालने की हर कोशिश नाकामयाब साबित हो रही है.

कारखानों में बड़ी-बड़ी भट्ठियों में लोहे को पिघलाकर और ढालकर स्टील के वर्तन और अन्य सामान बनाया जाता है. यह काम सुरक्षा की दृष्टि से बहुत ही खतरनाक है. आग से धंधकती भट्ठियों के पास खड़े होकर मजदूरों को लोहा पिघलाने का काम करना पड़ता है. इस खतरनाक काम को करने के लिए मजदूरों को कोई सुरक्षा उपकरण और वस्त्र नहीं दिया जाता है. फैक्ट्रियों में भी अग्निशमन यंत्र नहीं है. पेट के खातिर मजदूर जान को जोखिम में डालकर यह काम करते हैं. इसके बावजूद न तो उनका जीवन सुरक्षित है और न ही उनका भविष्य. फैक्ट्री मालिक मजदूरों को कोई नियुक्ति पत्र,परिचय पत्र और वेतन संबंधी पत्र नहीं देते हैं. जिसके कारण कोई हादसा होने के बाद फैक्ट्री मालिक मजदूर और उनके परिजनों को पहचानने से इंकार कर देते हैं. गरम रोला मजदूरों की हालत और शोषण से सरकार और श्रम विभाग अनजान नहीं है. लेकिन सरकार की मजदूर विरोधी नीति और श्रम विभाग की उदासीनता इस समस्या के हल में रोड़े अटकाती रही है. वजीरपुर में कई सालों से काम कर रहे जितेंद्र प्रसाद गोरखपुर के रहने वाले हैं. वह कहते हैं कि, ‘‘ हमारी मांगे इतनी ज्यादा नहीं है कि उसे पूरा नहीं किया जा सकता है. लेकिन मालिक हमारी मांगों के बजाए राजनेताओं और श्रम विभाग के अधिकारियों की मांग पूरा करते हैं. वह कहते हैं कि दिल्ली सरकार ने मजदूरों के लिए जो सहूलियतें निर्धारित की हैं,हम सब वही मांग रहे हैं.’’photo -1

देश के किसी भी विभाग में 12 घंटे काम लेना कानूनी रूप से दंडनीय है. दिल्ली सरकार के श्रम विभाग ने भी काम को आठ घंटे तय किया है. इसके लिए अकुशल मजदूर को 8,554 और कुशल मजदूर को 10,374 रुपये महीना तय किया है. लेकिन आज तक किसी फैक्ट्री मालिक ने न्यूनतम वेतनमान लागू नहीं किया है. मजदूरों को मुश्किल से सात-आठ हजार रुपये मिलते हैं. मजदूरों की दूसरी मांग है कि नियुक्ति पत्र,परिचय पत्र और वेतन महीने के प्रथम सप्ताह में दिया जाए. तीसरी मांग ई.एस.आई,पी.एफ और चौथी मांग कार्यस्थल पर सुरक्षा के इंतजाम की है. मजदूरों की अंतिम मांग सरकारी छुट्टियों को लागू करने की है.

दिल्ली जैसे शहर में इतने कम वेतन पर गुजारा करना मुश्किल है. गरम रोला मजदूर अम्बिका ने कहा कि ‘‘ महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है. खाद्य पदार्थों की कीमत आसमान छूं रही है. सब्जी से लेकर मकान का किराया लगातार बढ़ रहा है. कहने को तो सरकार कागजों पर न्यूनतम वेतन में वृद्धि कर देती है लेकिन मालिक-ठेकेदार सारे श्रम-कानूनों की धज्जियां उड़ाते हैं. मजदूरों को 12-12 घण्टे काम के सिर्फ 7000-8000 रुपये दिये जाते हैं वही पीएफ व ईएसआई जैसी बुनियादी सुविधाएं किसी फैक्टरी में लागू नहीं होती हैं. श्रम-विभाग भी गूंगा-बहरा बनकर मजदूरों का शोषण देख रहा है इसलिए हम मजदूरों ने तय किया है कि हम चुपचाप शोषण, अन्याय नहीं सहेंगे.’’

गरम रोला मजदूर यूनियन के संयोजक रघुराज का कहना है कि ‘‘ यह पहली बार नहीं है जब गरम रोला मजदूर अपनी मांग को लेकर हड़ताल पर हैं. पिछले साल 2013 में भी हड़ताल हुई थी जिसमें कुछ मांगें हासिल हुई थी. किन्तु हर साल 1500 रुपये मजदूरी बढ़ाने और पी.एफ. , ई.एस.आई. देने से फैक्टरी मालिक मना कर रहे हैं. ऐसे में मजदूरों को फिर से हड़ताल पर उतरना पड़ा है.’’

समिति से जुड़े सनी सिंह कहते हैं कि ‘‘ दिल्ली में देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद और सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट है. फिर भी मजदूरों के हितों की रक्षा नहीं हो पा रही है. वजीरपुर के नीमड़ी कॉलोनी में ही श्रम विभाग का कार्यालय है. श्रम विभाग के नाक के नीचे ही मजदूरों का शोषण बदस्तूर जारी है. ठेकेदारी प्रथा के तहत हजारों मजदूर सालों-साल से काम कर रहे हैं. ऐसे में श्रम विभाग को चाहिए कि वह हस्तक्षेप करे और श्रम कानूनों को सख्ती से लागू कराएं. ’’

मजदूरों को उनकी इस हड़ताल को समर्थन देने मजदूर संगठन,मानवाधिकार संगठन, सांस्कृतिक संगठन और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र एवं प्राध्यापक रोज आ रहे हैं. लेकिन अभी तक सरकार का कोई प्रतिनिधि नहीं आया है. समिति की कानूनी सलाहकार शिवानी कहती हैं कि ‘‘यह केवल दिल्ली के वजीरपुर की ही बात नहीं है. सारे देश में श्रम कानूनों का उल्लंघन हो रहा है. पूंजीपतियों द्वारा मजदूरों का शोषण आम बात होती जा रही है. सरकार बदलने से मजदूरों की स्थिति में सुधार नहीं होता है. कांग्रेस और भाजपा की आर्थिक नीतियां एक हैं.’’ श्रम अधिकारी यू.के. सिन्हा कहते हैं कि, ‘‘हम नियम-कानून के मुताबिक समस्या के समाधान के लिए ठोस कदम उठा रहे हैं.’’

मजदूरों के आंदोलन के दबाव में जिला श्रम आयुक्त ने अपने ऑफिस में सभी मालिकों और गरम रोला मजदूर एकता समिति के प्रतिनिधियों की एक बैठक बुलाई थी. उसमें मालिक नहीं आये. इसके जबाब में डी.एल.सी ने सभी फैक्ट्री मालिकों के खिलाफ कुछ कड़े कदम उठाते हुए लेबर चालान और फैक्ट्री चालान काटे. ये सब मजदूरों द्वारा जारी हड़ताल के कारण ही संभव हुआ. शिवानी कहती हैं कि श्रम विभाग यह सब मजदूरों के दबाव में कर रहा है. श्रम विभाग अदालत में ऐसे किसी भी केस की पैरवी मजबूती से नहीं करता है. जिससे मालिक को सजा हो. जब तक मजदूर हड़ताल कर रहे हैं. तभी तक श्रम विभाग भी सक्रिय है. लेकिन इस बार मजदूर अपनी मांग पूरी होने के बाद ही हड़ताल समाप्त करेंगे. फिरोज कहते हैं कि ‘‘ हड़ताल तोड़ने के लिए कारखाना मालिक अभी भी पूरी कोशिश कर रहे हैं. हर षडयंत्र में मुंह की खाने के बाद अब वे इस हड़ताल को तोड़ने के लिए अपने सबसे बड़े हथियार का सहारा ले रहे हैं-भूख! वे मजदूरों को भूख से तोड़ना चाहते हैं. लेकिन ये इस्पात मजदूर डटे हुए हैं. आधा पेट खाकर भी लड़ रहे हैं, ताकि उनके जायज, कानूनी और संवैधानिक हक उन्हें मिल सकें.’’

कई मजदूरों के घर खाने का संकट पैदा हो चुका है. इस समस्या से मजदूर हड़ताल वापस नहीं लेना चाह रहे हैं. मजदूर एक साथ भूख और व्यवस्था से जंग लड़ रहे हैं. ‘गरम रोला मजदूर एकता समिति’ ने 21 जून से सामूहिक रसोई की शुरुआत की है. जिसमें मजदूरों को खाना खिलाया जा रहा है. मालिकों के षडयंत्र के कारण किसी भी हालत में हड़ताल को टूटने नहीं देंगे.

बिगुल मजदूर दस्ता के कार्यकर्ता नवीन ने कहा कि ‘‘ इस हड़ताल पर ठंडा रोला, स्टील लाइन, रिक्शा के मजदूर भी उम्मीद लगाए बैठे है, इस हड़ताल में जीत पूरे वजीरपुर के मजदूरों की जीत होगी और यह अन्य मजदूरों को भी संघर्ष के रास्ते पर उतरने का रास्ता दिखाएगी.’’ समिति के संयोजक रघुराज कहते हैं कि ‘‘हमारी लड़ाई अपने कानूनी अधिकारों के साथ-साथ हमारे मान और सम्मान की भी है क्योंकि सभी मालिक हमसे अपनी फैक्ट्री में बेगारी कराते है और लताड़ते है. कुछ दिन पहले जब एक मजदूर साथी की पत्नी की मृत्यु हो गयी थी तो उसके मालिक ने शव को घर ले जाने के लिए तनख्वाह का पैसा देने से मना कर दिया था. बाद में सभी मजदूरों के सहयोग से वह अपनी पत्नी के शव को अपने घर ले गया. कुछ दिन पहले ही एक मजदूर की काम के दौरान तबियत खराब हो गयी लेकिन उसका कोई उपचार नहीं कराया गया जिससे उसकी मृत्यु हो गयी. अगर सही समय पर उसका इलाज कराया जाता तो उसकी जान बच जाती. हम लोगो को फैक्ट्री मालिक इंसान नही समझते है. इसलिए ये लड़ाई मानवीय गरिमा की भी है.’’

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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