सीपीएम: नीति और नेतृत्व पर सवाल..

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-प्रदीप सिंह||

देश की राजनीति में लंबे समय तक प्रभावी भूमिका निभाने वाली वाम राजनीति अब हाशिए पर पहंुच गयी है. लोकसभा चुनाव नतीजों के बादे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में यह बहस चल रही है,कि हमारी हार का कारण बदली हुई राजनीति है या अक्षम नेतृत्व. सबसे अधिक बवाल पश्चिम बंगाल सीपीएम ईकाई में हैं.Prakash_Karat

16 वीं लोकसभा चुनाव में वामपंथी दलों को मिली करारी हार के बाद देश की राजनीति में वामपंथी दलों के अस्तित्व पर सवाल उठने लगे हैं. वामपंथी राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले पश्चिम बंगाल में 34 साल के शासन का अंत और 2009 के आम चुनाव में मिली हार को गलत राजनीतिक फैसलों को जिम्मेदार बताया गया था. लेकिन 2014 के आम चुनाव में मिली हार के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में नेतृत्व के प्रति असंतोष के स्वर तीखे हो गए है. अब इसके लिए पार्टी के गलत राजनीतिक फैसलों को कम अक्षम नेतृत्व को ज्यादा जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. सीपीएम में केरल और बंगाल लॉबी के बीच मतभेद की खबरें तो पहले भी आती रही हैं. लेकिन अब पश्चिम बंगाल के पार्टी नेताओं ने केंद्रीय नेतृत्व पर सवाल उठा दिया है. नेतृत्व पर जनभावनाओं को समझने में नाकाम साबित होने और अपरिपक्व राजनीति करने का आरोप लगाते हुए नेतृत्व बदलाव की मांग चलने लगी है. यह मांग कोलकाता में माकपा की राज्य कमेटी की बैठक में हुई. यह सब राज्य कमेटी के बैठक के दौरान सामने आयी. राज्य कमेटी के सदस्यों ने हार की समीक्षा के साथ भावी नीति और नेतृत्व को बदलने की बात कही. इतना ही नहीं माकपा नेताओं ने लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के लिए पार्टी महासचिव प्रकाश करात के गलत राजनीतिक फैसलों को जिम्मेदार ठहराया है. 1960 के दशक से चुनाव मैदान में आई माकपा का प्रदर्शन इस लोकसभा चुनाव में अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन रहा है. जिसके चलते पिछले कुछ दिनों से सीपीएम में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. पश्चिम बंगाल राज्य कमेटी के नेताओं ने पार्टी के बड़े नेताओं प्रकाश करात, प्रदेश सचिव विमान बोस, पोलित ब्यूरो के सदस्य व पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भंट्टाचार्य और प्रदेश में विपक्ष के नेता सूर्यकांत मिश्रा पर चुनाव के दौरान बेहतर नेतृत्व नहीं दे पाने का आरोप लगाया. इस बैठक में करात के साथ साथ त्रिपुरा के मुख्यमंत्री मानिक सरकार और पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी भी मौजूद थे.

सीपीएम को यह हार भले ही अनपेक्षित लग रही हो, लेकिन लंबे समय से वामदलों का नाता जनता से टूट चुका है. पार्टी के वरिष्ठ नेता दिल्ली में बैठकर तथाकथित ‘धर्मनिरपेक्ष दलों’ की सरकार बनवाना ही अपना राजनीतिक उद्देश्य समझते रहे. जमीनी राजनीति से दूर रहने के कारण पार्टी के आम कार्यकर्ता भी अपने को उपेक्षित महसूस करते रहे. इसके साथ ही नेतृत्व कार्यकर्ताओं की मनोदशा, जन हित के वास्तविक मुद्दों और पिछले तीन दशक में राजनीति के केन्द्र बिन्दु में आए मुद्दों का समझने में नाकाम रही है. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी संसदीय राजनीति के माध्यम से देश का कायाकल्प करने का सपना देखती रही है. जन आंदोलनों से दूर रह कर वह मध्यमार्गी राजनीतिक पार्टियों के साथ समीकरण साधने में ही अपना राजनीतिक भविष्य देखती रही है. पिछले तीन दशकों में बड़ी तेजी से राजनीतिक और सामाजिक घटनाक्रम में बदलाव हुए है. देहातों में भी पूंजीवाद के तेजी से हुए प्रसार से सामाजिक परिवर्तन हुए हैं. इस सामाजिक और आर्थिक बदलाव ने नए राजनीतिक समीकरण को जन्म दिए हैं. माकपा जैसे वामपंथी दलों पर इस उभार और बदलाव को नेतृत्व देने की जिम्मेदारी थी. इस अवसर को वामदलों ने गंवा दिया. सीपीएम आज भी पुराने ढर्रे की राजनीति ही कर रही है. हिंदी क्षेत्र में सीपीएम ने कभी गंभीरता से काम नहीं किया. पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा को ही देश समझाती रही. गांव देहात में पहंुचने के लिए आज भी वह भूमि का सवाल उठाती रही है. ग्रामीण क्षेत्रों में आज यह विषय कितना प्रासंगिक रह गया है, इस पर पार्टी का कोई अध्ययन नहीं है. जल, जंगल, जमीन पर कॉरपोरेट के कब्जे- को लेकर गैर सरकारी संगठन आंदोलन चला रहे हैं. वामपंथी दल यहां से भी गायब हैं. सुदूर देहातों और आदिवासी क्षेत्रों में कॉरपोरेट के प्रवेश को लेकर एक माओवादियों ने सशस्त्र संघर्ष छेड़ रखा है. वामपंथी अभी मूलतः ट्रेड यूनियनों के मोर्चे पर ही सबसे अधिक सक्रिय हैं. लेकिन इस क्षेत्र में एक अरसे से शुद्ध अर्थनीतिवाद का बोलबाला है. सरकारी सहूलियतों और अलग-अलग कारणों से ट्रेड यूनियन आंदोलन में भी लंबे अरसे से एक प्रकार का निहित स्वार्थ विकसित हो गया है, जिसके कारण इस क्षेत्र में भी वामपंथियों को दूसरी राजनीतिक पार्टियों की प्रतिद्वंद्विता का सामना करना पड़ रहा है. ग्रामीण क्षेत्रों में क्षेत्रिय पार्टियों ने गरीबों में वामपंथ की जड़ों को जमने नहीं दिया है. इससे साबित होता है कि वामपंथ के काम का सामाजिक क्षेत्र कुछ सालों में संकुचित हुआ है.

माकपा के इस राजनीतिक समझ पर दूसरी कम्युनिस्ट पार्टियां पहले भी सवाल उठाती रही है. लेकिन अब यह सवाल पार्टी के अंदर से उठने शुरू हो गए हैं. बंगाल के लोकसभा चुनाव नतीजों में तृणमूल की भारी जीत पर राजनीतिक पंडित उतनी माथापच्ची नहीं कर रहे, जितना माकपा के महज दो सीटों पर सिमट जाने की अनोखी घटना का. माकपा की सीट संख्या और वोट प्रतिशत में आई गुणात्मक कमी का सीधा प्रमाण यह भी है कि खुद इसके मतदाता रहे लोग अब इस पार्टी की चर्चा होने पर साढ़े तीन दशक लंबी नाकामियां गिनाते, हुए इसे सिरे से खारिज कर देते हैं. आम लोगों की यह भी राय बन गई है कि माकपा के पास नए दौर की सोच नहीं है, कोई विजन नहीं है. उसकी राजनीति तीन-चार दशक पुरानी है. माकपा के नेताओं के पास राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ज्वलंत मुद्दों पर भले ही अच्छे विचार हों, लेकिन युवाओं के लिए कुछ वे खास संदेश देने की स्थिति में नहीं है. सू़त्रों से मिली जानकारी के मुताबिक पार्टी बैठक में नेताओं से पद-त्यागने और पूरी समिति को ही बदल देने जैसी बातें भी की र्गइं. लेकिन सारी बात यहीं पर अटक गई कि अगर नेताओं को हटाया जाना और समितियों को भंग करना ही सारी समस्या का समाधान हो, तो उस ओर बढ़ा जा सकता है. समस्या सिर्फ इतनी-सी नहीं है. सबको हटा कर कुछ नए लोगों को ले आने से ही वामपंथ का आगे का राजनीतिक रास्ता खुलने वाला नहीं है. सीपीएम बैठक में कुछ लोगों ने यह सवाल भी उठाया कि कांग्रेस के प्रति नरम रुख अपनाने का नुकसान माकपा को उठाना पड़ा है. गलत राजनीतिक लाइन पर सफाई पेश करते हुए सीपीएम महासचिव प्रकाश करात ने कहा, कि ‘‘ पार्टी ने तो इस चुनाव में कांग्रेस को पराजित करने और भाजपा को ठुकराने का आह्वान किया था. पराजित करना और ठुकराना दोनों ही समान रूप से कड़े शब्द हैं, इसलिए एक के प्रति नरम और दूसरे के प्रति कड़े रुख की धारणा का कोई सवाल ही नहीं उठता.’’

माकपा में चुनावी हार के बाद नेतृत्व परिवर्तन की जोर पकड़ती मांग के बीच पार्टी महासचिव प्रकाश करात ने कहा किपार्टी के राजनीतिक, सांगठनिक मुद्दों को लेकर उठ रहे सवालों पर केंद्रीय समिति की बैठक में गहन चर्चा होगी. हालांकि जल्दीबाजी में कोई भी निर्णय लेने से पार्टी कार्यकर्ताओं में गलत संदेश जयह पहली बार नहीं है कि सीपीएम महासचिव प्रकाश करात के नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं. उनकी राजनीतिक शैली 2009 लोकसभा चुनाव के बाद भी सवालिया घेरे में थी. परमाणु डील के मुद्दे पर प्रकाश करात ने यूपीए सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था. उस समय लोकसभा अध्यक्ष सीपीएम के वरिष्ठ नेता सोमनाथ चटर्जी थे. समर्थन वापसी के बाद करात सोमनाथ चटर्जी से इस्तीफा देने का दबाव डालने लगे. इस्तीफा देने से इनकार करने पर सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकाल दिया गया. इसके बाद हुए चुनाव में सीपीएम को मिली पार्टी की हार की जिम्मेदारी लेते हुए महासचिव प्रकाश करात को इस्तीफा दे देना चाहिए. मैं करात को तो यह सुझाव नहीं दे सकता हूं, क्योंकि मैं पार्टी में अब नहीं रहा. लेकिन यदि करात की अंतर्रात्मा इजाजत देती है तो उन्हें इस्तीफा देने के बारे में विचार करना चाहिए.’’

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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2 thoughts on “सीपीएम: नीति और नेतृत्व पर सवाल..

  1. पुरे विश्व में ही मार्क्सवाद का दौर लगभग समाप्ति है , अब भारत भी यही हालत हो रही है अब तो मार्क्सवादी अपने अस्तित्व के बचाये बचाये रखने के संकट से झूझ रहे हैं जो अगले आम चुनाव तक खत्म जायेगा

  2. पुरे विश्व में ही मार्क्सवाद का दौर लगभग समाप्ति है , अब भारत भी यही हालत हो रही है अब तो मार्क्सवादी अपने अस्तित्व के बचाये बचाये रखने के संकट से झूझ रहे हैं जो अगले आम चुनाव तक खत्म जायेगा

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