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भाजपा का भ्रष्टाचार उन्मूलन अभियान: बदलेंगे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री

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रमेश पोखरियाल निशंक

कर्नाटक के बाद अब भाजपा-शासित उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन की बारी है। लगातार भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रहे मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के विकल्प की तलाश शुरू हो गई है। गुरुवार देर शाम भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक में यह महसूस किया गया कि चुनाव से पहले प्रदेश में मुख्यमंत्री बदलना पार्टी की जरूरत हो गई है।

फिलहाल नए नेता की दौर में पूर्व मुख्यमंत्री बी.सी. खंडूरी सबसे आगे बताए जा रहे हैं। ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्री भगतसिंह कोश्यारी को प्रदेश संगठन की कमान की कमान सौंपी जा सकती है। आला सूत्रों के मुताबिक संसदीय बोर्ड में उत्तराखंड के हालात पर विस्तार से चर्चा हुई।

ज्यादातर नेता मुख्यमंत्री को हटाने के पक्ष में बताए जा रहे हैं, लेकिन एक पूर्व अध्यक्ष समेत कुछ लोगों ने मुख्यमंत्री को हटाने से होने वाली मुसीबतों का भी मामला उठाया। लंबी चर्चा के बाद पार्टी ने फिलहाल कोई भी औपचारिक ऐलान से परहेज किया है। मगर विशिष्ट सूत्रों के मुताबिक निशंक से इस्तीफा लेने पर गंभीरता से विचार हुआ है, मुमकिन है पार्टी जल्द देहरादून में विधायक दल की बैठक करके नए नेता के चुनाव की प्रक्रिया शुरू करेगी।

बी.सी. खंडूरी

सूत्रों का कहना था कि विधायक दल की बैठक 11 सितंबर को संभव है हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। हालांकि यह पहला मौका नहीं जब आलाकमान को सीएम के खिलाफ असंतोष से दो-चार होना पड़ा हो।

जून के महीने में भी प्रदेश कोर ग्रुप की केंद्रीय नेताओं से मैराथन बैठक हुई थी जिसमें प्रदेश के दोनों दिग्गज, बीसी खंडूरी और भगत सिंह कोश्यारी ने निशंक के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। इन नेताओं की नाराजगी को देखते हुए अध्यक्ष नितिन गडकरी ने मुख्यमंत्री के पर कतरते हुए एलान किया था कि आगामी विधानसभा चुनाव तीनों नेताओं के सामूहिक नेतृत्व में लड़ा जाएगा। संकेत साफ था कि निशंक चुनावों में पार्टी का चेहरा नहीं होंगे।

निशंक के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों के अलावा मनमानी की शिकायतें भी मिली हैं। इसके साथ ही विधायकों ने आलाकमान से अलग-अलग मुलाकातों में यह भी आशंका जताई है कि निशंक के नेतृत्व में चुनाव जीतना मुमकिन नहीं है। पिछली कोर ग्रुप बैठक के जरिए आलाकमान ने सभी को साथ लेने का संदेश देकर प्रदेश इकाई में बढ़ते असंतोष को काबू करने की कोशिश की थी मगर मामला उल्टा पड़ गया.

(भास्कर की खबर पर आधारित)

 

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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