उत्तराखण्ड त्रासदी को एक साल बीता, झुंझुनू के आठ तीर्थयात्रियों का नही लगा सूराग..

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एक साल से गुम परिजनों का आज भी इंतजार..अब तक नही मिला मुआवजा..

-रमेश सर्राफ धमोरा||
झुंझुनू, उन्हें जुदा हुए एक साल हो गया…. वो खुशी-खुशी गए थे…मगर लौटे नहीं…. अंतिम बार बात हुई तो घबराए हुए थे…. वहां कुदरत का कहर बरप रहा था…, जो उन्हें लील गया. कुछ ऐसी ही यादें उन परिवारों के पास हैं, जिन्होंने पिछले साल उत्तराखण्ड त्रासदी में अपनों को खो दिया. त्रासदी की बरसी पर कइयों की आंखे आज भी नम है. उत्तराखण्ड त्रासदी के बाद राजस्थान व उत्तराखण्ड सरकार ने मृतकों के आश्रितो को पांच-पांच लाख की आर्थिक सहायता व राजस्थान सरकार ने एक आश्रित को नौकरी देने का वादा किया था. मगर उत्तराखण्ड सरकार ने कोई मुआवजा दिया और नही राजस्थान सरकार की और नौकरी. परिजनो को दर्द है तो इस बात का कि प्रदेश सरकार आज तक उनके परिजनो की तलाश को लेकर संवेदशील नही रही.17-06-14 singhana -3

ऐसे ही एक परिवार से उनका दर्द जाना. अपनो के खोने वाले झुंझुनू जिले के सिंघाना कस्बे के इलेक्ट्रोनिक व्यवसायी के परिजनो को आज भी अपनो का इंतजार है. पिछले एक साल से बिछड़े परिवार के मुख्या को लेकर उम्मीद की किरण कमी ही नजर आती है. पिछले साल 16 जून की घटना में लापता हुऐ परिवार की यादे आज भी ताजा बनी हुई. उत्तराखंड में मची तबाही में अनेक परिवार लापता हुऐ उन्ही में सिंघाना के 56 वर्षीय सतीश चौधरी और 52 वर्षीय उनकी धर्म पत्नि उषा चौधरी थी. वैसे जिले से चार धाम की यात्रा पर कई लोग गये मगर 8 लोगो का आज भी पता नही चला. और जो लौट कर आये उनके द्वारा त्रासदी की दास्तां सुनने वालों की तो रूह कांप उठती है.

17-06-14 singhana -2झुंझुनू जिले के सिंघाना से पति,पत्नि 9 जून को घर से खुशी खुशी विदा होकर केदारनाथ धाम के लिये घर से निकले थे. मगर लौट कर घर कभी नही आये. घटना के अगले दिन 16 जून को सिंघाना की दंपत्ति ने फोन के माध्यम से एक बार बात जरूर की. फोन बताया कि भीषण तबाही के बीच फसे हुऐ है. चारो और सिर्फ पानी ही पानी बहता नजर आ रहा है. सैकड़ो लोग मलबे में दबे पड़े है. इसी बीच फोन कट गया और आवाजे आनी बंद हो गई. इस घटना को बीते एक साल हो गया लेकिन आज तक उनका पता नही चला. परिजनो ने दर्द बया करते हुऐ कहा कि उत्तराखंड सरकार की लापरवाही के कारण उनका सूराग नही लगा. लापता चौधरी दम्पत्ति की पोती नन्ही बच्ची खुशी आज भी दादा,दादी को याद करती है. दंपत्ति के बड़े बेटे अमित को यह भी मलाल है कि या तो सरकार कोई घोषणा नहीं करे और करे तो उसे पूरी करनी चाहिए. उत्तराखंड में हुई त्रासदी के बाद गहलोत सरकार ने मारे गये लोगो के परिजनो को नौकरी देने की घोषणा की थी जो भाजपा सरकार आने के बाद पुरी नही हो पाई है.

इस संबध में झुंझुनू सांसद से मुलाकात कर लापता लोगो के बारे में सरकार की मंशा पर पुछा गया तो उन्होने ने कहा कि उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार जिसकी निती से पुरा देश परेशान है. आये दिन मिल रहे शवो को लेकर भी सवाल उठाये और कहा कि जब सरकार ने सभी मृत लोगो के अंतिम संस्कार किये जाने का ऐलान किया तो आज फिर एक एक कर शव क्यो मिल रहे है. उन्होने ने कहा कि सरकार के पास कोई ठोस योजना नही है और नही गंभीरता से वहा कार्य हो रहा है. इस संबध में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की और से भी कहा गया है कि एक बार फिर सर्च अभियान शुरू किया जाएगा. उन्होने ने कहा कि क्षेत्र से लापता लोगो का मुद्दा लोकसभा में उठाऊगी ताकि अभियान में तेजी आऐ. राजस्थान सरकार के द्वारा मुआवजा नही मिलने पर कहा कि मुआवजा तय करना मुख्य मंत्री का काम है. एक साल से लापता लोगो के बारे में कोई सूचना नही मिलना परिवार के लिये परेशानी और दर्द का सबब बना हुआ है. राज्य सरकार को चाहिऐ कि ऐसे लापता लोगो को सहानुभति कम से कम प्रदान करे ताकि पीडि़तो के दर्द को कम किया जा सके.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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2 thoughts on “उत्तराखण्ड त्रासदी को एक साल बीता, झुंझुनू के आठ तीर्थयात्रियों का नही लगा सूराग..

  1. हादसे के समय सरकारे घोषणाएं तो कर देती है फिर उन्हें याद नहीं रहता चाहे उनके कानों पर कितना भी चीखा जाये

  2. हादसे के समय सरकारे घोषणाएं तो कर देती है फिर उन्हें याद नहीं रहता चाहे उनके कानों पर कितना भी चीखा जाये

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