Home देश उत्तराखंड तबाही: गुज़रे साल में सीखे कितने सबक..

उत्तराखंड तबाही: गुज़रे साल में सीखे कितने सबक..

-नितीश के सिंह||

17 जून, 2013 को जब दैवीय आपदा ने प्रदेश के साथ साथ देश के होश उड़ा दिए थे तब केदार घाटी में हजारों लोग जान बचाने के लिए जूझ रहे थे और मुख्यमंत्री दिल्ली में 7 रेस कोर्स के चक्कर काट रहे थे. इस कदम की ये कहते हुए भरपूर आलोचना की गयी थी कि जब मुख्यमंत्री को अपने प्रदेश में होना चाहिए था तब वे अपनी आका सोनिया गाँधी के पास हाजिरी लगाने में व्यस्त थे. राहत कार्यों की भी कड़ी आलोचना हुयी थी.uttrakhand

आपदा गुज़र जाने के बाद सरकार का पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ यात्रा शुरू करने पर रहा और तीर्थ यात्रियों के बचाव के बाद राहत कार्य सिर्फ और सिर्फ सड़कों को किसी तरह चालू करने तक ही सिमट कर रह गया. वर्ल्ड बैंक, अन्य राज्यों और केंद्र सरकार से आपदा में हुए कुल नुकसान से कहीं अधिक रकम पाने के बाद भी उत्तराखंड सरकार घरों और भवनों के निर्माण के लिए एक प्रभावी नीति न बना पाई न उसको अमल में ला पाई. सरकार ने घरों के लिए घोषित मुआवज़े को पाने के लिए न्यूनतम अहर्ता अपनी भूमि की उपलब्धता रखी थी जो की बहुत ही विषम कार्य था. केदार घाटी में सबसे ज्यादा प्रभावित और पूरी तरह बहने से बच गये अगस्त्य मुनि के आस पास के इलाकों में ज़्यादातर भूमि कमज़ोर और भूस्खलन संभावित क्षेत्र में आती है. अपनी भूमि के आभाव में यहाँ बहुत से विस्थापित परिवार आज भी खुले आसमान के नीचे रह रहे हैं. पुनर्वास नीति कोई लेकर कई दौर की मीटिंग हो चुकी हैं लेकिन अभी तक किसी निर्णय का इंतज़ार है.

गढ़वाल, कुमायूं, टिहरी आदि क्षेत्रों को जोड़ कर सरकार के अनुसार लगभग तीन हजार एक सौ के आस पास मकानों को पूर्ण या आंशिक क्षति पहुंची थी. इनमें से कितने मकान बन गए और कितने बाकी हैं इसका कोई हिसाब नहीं है सरकार के पास. जबकि सिर्फ इसी कार्य के लिए, केंद्र सरकार की तरफ से लगभग तीन हज़ार करोड़ रूपए की एक मुश्त सहायता राज्य को मिली थी, यानी हर घर को बनाने के लिए लगभग एक करोड़ रूपए. इसके साथ ही अनियमितताओं की शिकायतें भी सामने आती रही हैं.

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