कौन हैं दान सिंह….

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किसी से पूछिये- ”क्या आपने दान सिंह का नाम सुना है?” जवाब आयेगा- ”ज़ी , नहीं.” फिर पूछिये-आपने यह गाना सुना है क्या-”वो तेरे प्यार का गम, इक बहाना था सनम…?” वो तत्काल कहेगा- ”हाँ ज़ी, सुना है.” बस यही दान सिंह की बदनसीबी है. ”माई लव” फिल्म के इस सदाबहार गाने की धुन दान सिंह ने बनाई थी, जिसे लोग आज भी गुनगुना लेते हैं, लेकिन यह क्विज़ प्रतियोगिताओं का कठिन सवाल बन कर रह गया है. इसी फिल्म में एक गाना और था- ”ज़िक्र होता है जब क़यामत का, तेरे ज़ल्वों की बात होती है, तू जो चाहे तो दिन निकलता है, तू जो चाहे तो रात होती है.” शशि कपूर और शर्मीला टैगोर अभिनीत फिल्म ”माई लव” फिल्म में मुकेश के गाये इन गानों में संगीत निर्देशक दान सिंह के सहायक कौन-कौन थे, यह भी जान लीजिये-इन सहायकों में लक्ष्‍मीकांत ने मेंडोलिन बजाई, प्यारे लाल ने वॉयलिन बजाई, हरि प्रसाद चौरसिया ने बांसुरी बजाई और पण्डित शिव कुमार ने संतूर बजाया. बाद में इन चारों ने डंके बजाये. सब जानते हैं कि आगे चल कर लक्ष्‍मीकांत-प्यारेलाल की और शिव- हरि की मशहूर जोड़ियाँ बनीं , लेकिन जब दान सिंह के ये गाने धूम मचा रहे थे, तब वे जयपुर आ गये और गुमनामी के अंधेरे में खो गये.dan singh smriti1

इन्हीं दान सिंह की स्म्रतियों को बनाये रखने के लिये दान सिंह अकादमी ट्रस्ट हर साल आयोजन करता है. उनकी चौथी पुण्यतिथि पर रविवार (१५ जून, २०१४) को जयपुर के पिंक सिटी प्रेस क्लब में एक व्याख्यान कराया गया. व्याख्यान क्या था, पूरा आयोजन ही संगीतमय था. राजस्थान विश्वविद्यालय में संगीत की प्रोफेसर और गायिका सुमन यादव ने व्याख्यान दिया तो बीच-बीच में कई गानों का मधुर कंठ से सस्वर पाठ करके दान सिंह और उनके दौर के फिल्म संगीत की सुरीली समीक्षा पेश की. यहाँ यह जानना दिलचस्प होगा कि दान सिंह ने फिल्म भोभर के जिस अंतिम गीत को अपनी धुनों से सजाया, उसे सुमन यादव ने ही गाया था. ई फिल्म निदेशक गजेंड्रा श्रोत्रिया ने दान सिंह के साथ रिकॉर्डिंग के अनुभव साझा करते हुए इस गाने को पर्दे पर दिखाया. गीतकार रामकुमार सिंह ने भी दान सिंह से जुड़े कई प्रसंग सुनाये.

विख्यात ग़ज़ल गायक अहमद हुसैन और मोहम्मद हूसेन की उपस्तिथि ने कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की. उन्होंने दान सिंह के साथ अपने बचपन के दिन साझा किये. संजय पारीक ने दान सिंह के संगीत से सज़ा मशहूर गाना -”वो तेरे प्यार का गम” सुनाया.

दान सिंह का जादू कुछ ऐसा छाया कि वरिष्‍ठ साहित्यकार नन्द भारद्वाज को अध्यक्षीय भाषण देते समय कॉलेज के वो पुराने दिन याद आ गये जब वे ”वो तेरे प्यार का गम…” गाया करते थे. वे खुद को रोक नहीं पाये और इस गाने का मुखड़ा भी सुनाया.

विख्यात कवि कृष्ण कल्पित ने दान सिंह की यादों का एक नया संसार दिखाया. प्रारंभ में स्वागत भाषण में वरिष्‍ठ पत्रकार ईशमधु तलवार ने बताया कि दान सिंह वो संगीतकार थे जिन्होंने मोहम्मद रफी, आशा भोसले, गीता दत्त, उषा मंगेशकर, सुमन कल्याणपुर, मुकेश, मनना डे जैसे महान लोगों के गाने अपने सुरों से सजाये. जिन गीतकारों के गानों को उन्होने संगीत दिया उनमें हरिराम आचार्य, आनंद बक्शी और गुलज़ार शामिल हैं. कार्यक्रम का जादुई संचालन कवि एवं कथाकार दुष्यंत ने किया.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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