देहरादून के रणबीर सिंह का एनकाउंटर फर्ज़ी निकला..

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दिल्ली की एक अदालत ने 2009 में उत्तराखंड में एक फर्जी मुठभेड़ मामले में एक एमबीए छात्र रणबीर सिंह की गोली मारकर हत्या करने के सिलसिले में शुक्रवार को राज्य पुलिस के 18 कर्मियों को दोषी ठहराया. इनमें से सात को हत्या तथा अन्य को आपराधिक साजिश एवं अपहरण सहित विभिन्न अपराधों में दोषी ठहराया गया है.Tribune photo by Anil P. Rawat

विशेष सीबीआई न्यायाधीश जे पी एस मलिक ने छह उपनिरीक्षकों एवं एक कांस्टेबल को 22 वर्षीय रणबीर सिंह की मुठभेड़ में जान लेने का दोषी ठहराया. हत्या के लिए दोषी ठहराये गये लोगों में उप निरीक्षक संतोष कुमार, गोपाल दत्त भटट (थाना प्रभारी), राजेश बिष्ट, नीरज कुमार, नितिन चौहान, चंद्रमोहन सिंह रावत एवं कांस्टेबल अजीत सिंह शामिल हैं.

जसपाल सिंह गोसाईं के अलावा अन्य सभी 17 पुलिसकर्मियों को छात्र के अपहरण एवं हत्या की साजिश रचने का दोषी ठहराया गया है. इस मामले में दोषी ठहराये गये 10 अन्य पुलिसकर्मियों में कांस्टेबल सतबीर सिंह, सुनील सैनी, चंद्रपाल, सौरभ नौटियाल, नगेन्द्र राठी, विकास चन्द्र बलूनी, संजय रावत एवं मनोज कुमार तथा चालक मोहन सिंह राणा एवं इंद्रभान सिंह शामिल हैं.

न्यायाधीश ने गोसाईं को किसी व्यक्ति को सजा से बचाने के लिए गलत रिकार्ड भरने के आरोप में दोषी ठहराया. लेकिन उसे अन्य सभी आरोपों से बरी कर दिय गया. अदालत ने सजा की मात्रा के बारे में सुनवाई के लिए कल की तारीख निर्धारित की है.

सीबीआई ने रणबीर सिंह मुठभेड़ मामले में इन आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था. यह मुठभेड़ 2009 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा सिंह पाटिल की उत्तराखंड यात्रा के दौरान हुई थी.

इन पुलिसकर्मियों को इस बात के सबूतों के चलते गिरफ्तार किया गया था कि गाजियाबाद के एमबीए छात्र रणबीर की 3 जुलाई 2009 मोहिनी रोड़ से पकड़े जाने के बाद गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी. छात्र को इस आरोप में पकड़ा गया था कि वह और उसके सहयोगी कोई अपराध करने का प्रयास करने वाले थे.

अदालत द्वारा आज फैसला सुनाये जाने के बाद रणबीर के पिता अदालत कक्ष से बाहर आते समय अपने पुत्र को याद करते हुए रोने लगे. उन्होंने दोषियों को अधिकतम सजा देने की मांग करते हुए कहा, मैं हर तरफ से पराजित हुआ हूं और मुझे तभी संतोष मिलेगा जब सभी को फांसी होगी.

यह मामला रणबीर के पिता रविन्द्र सिंह के अनुरोध पर उच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्देश पर 2011 में दिल्ली में स्थानांतरित किया गया था.

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