तंगहाल बंगाल में ममता का जश्न..

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-प्रकाश चण्डालिया||

पश्चिम बंगाल बेशक भारत गणराज्य का हिस्सा है, लेकिन ममता बनर्जी की चौधराहट के अंदाज देखें तो उनके भ्रम का अंदाजा हो जाएगा. ममता की दुनिया शाय़द बंगाल से शुरू होती है और बंगाल में ही खत्म हो जाती है. उनके पैंतरे देखकर सहज ही समझा जा सकता है कि राजनैतिक व्यवहारिकता के धरातल पर वे किस स्गथान पर हैं. उन्हें सौहार्द्र और समरसता जैसे शब्दों से कोई सरोकार नहीं है.mamta-shahrukh at eden

हाल के वाकए पर नज़र डालें तो ममता बनर्जी के राजनैतिक दम्भ का पता स्वतः चल जाएगा. 3 जून को केंद्रीय मंत्री गोपीनाथ मुण्डे का सड़क हादसे में असामयिक निधन हो गया. महाराष्ट्र ही नहीं, पूरा देश शोक में डूबा. मीडिया में मुण्डे से जुड़ी खबरें दिखाई -पढ़ाई जाती रहीं. राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित देश भर से विभिन्न पार्टियों के नेता उन्हें दिनभर श्रद्धांजलि देते रहे. केंद्र सरकार ने राजकीय शोक की घोषणा की. परन्तु देश की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि देना मुनासिब नहीं समझा. ममता बनर्जी के लिए यह शायद कोई महत्वपूर्ण घटना नहीं थी.

उनके लिए महत्वपूर्ण था तो फिक्सिंग के लिए कुख्यात आईपीएल की ट्राफी जीतने वाली केकेआऱ टीम का नाच-गाने के साथ रंगारंग अभिनन्दन. पाठको को बताते चलें कि सोमवार को ममता बनर्जी उत्तर बंगाल के दौरे पर थीं और उन्हें वहां 4 दिन रहना था, पर अपने चहेते अभिनेता शाहरूख खान के मालिकाने वाली टीम का अभिनन्दन करने वह विशेष विमान से सफर बीच में छोड़ कोलकाता लौट आईं. बयान दिया कि शाहरूख ने उन्हें जोर देकर न्यौता था. 3 जून को, जब केंद्र सरकार ने राजकीय शोक घोषित कर रखा था और राष्ट्र ध्वज झुकाया गया था, ममता इडेन गार्डेन में शाहरूख खान के साथ जश्न में डूबी नजर आईं. हां, वही जश्न, जिसमें हजारों क्रिकेट-भक्तों को ममता सरकार की पुलिस ने लाठियां बरसाकर जख्मी कर दिया था.lathi charge

चौंकाने वाली बात यह है कि जिस केकेआर की जीत का जश्न मनाने के लिए ममता ने राजनैतिक व्यावहारिकता को ताक पर रख दिया, उस केकेआर टीम में बंगाल से एक भी खिलाड़ी नहीं है. बंगाल का बुद्धिजीवी वर्ग ममता पर तरह-तरह से तर्जनी उठा रहा है. अव्वल तो यह कि जिस टीम में बंगाल का कोई खिलाड़ी ही नहीं था, उस टीम की जीत का जश्न सरकारी स्तर पर करने की क्या जरूरत पड़ गयी. दूसरा यह कि जिस बंगाल की कड़की को चुनावी दौर में भुनाने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी, उस बंगाल के पैसे सरकारी खजाने से अनावश्यक क्यों लुटाए गए. पाठक जानते हैं कि सैंकड़ों करोड़ के सारदा चिटफण्ड घोटाले में 18 लाख से अधिक लोगों के परिवार फंसे हैं. कई लोगों ने तंगी के कारण खुदकुशी की है. प्राकृतिक आपदा के शिकार हुए इलाकों में अब तक राहत-धन नहीं भेजा जा सका. ऐसी स्थिति में सरकारी खजाने का दुरुपयोग किस स्वार्थ में..cheers at eden

चौंतीस वर्षों के वामपंथी शासन को धराशायी कर पश्चिम बंगाल की बागडोर संभालने वाली ममता बनर्जी ने तथाकथित परिवर्तन के तीन साल पूरे कर लिए हैं. इस कालखण्ड के अधकतर महीने यूपीए वाली केंद्र सरकार के थे, अब हालिया चुनाव में एनडीए का राज आ गया. ममता का पंगा यूपीए से भी था, अब एनडीए से भी है. राजनैतिक अव्यवहारिकता का आलम यह कि तब उन्हें सोनिया और मनमोहन सिंह को नहीं बख्शा, अब नरेंद्र मोदी को बख्शने के मूड में नहीं हैं. लोकसभा चुनाव में इस बार पहले से अधिक सांसदों को जिताकर लाने के बाद ममता के पैर शायद जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं. उनके चुनावी भाषणों को तो सभ्य लोग याद तक नहीं रखना चाहते. जिन नरेंद्र मोदी ने अपनी प्रतिद्वंद्वी ममता के लिए बहन जैसे शब्द का प्रयोग किया, उन ममता बनर्जी ने नरेंद्र मोदी को कमर में रस्सी बांधकर जेल भेजने की बात कहती नजर आई थीं.

बहरहाल, केंद्र में इस बार भाजपा बहुमत में है और एनडीए का शासन पूरजोर ताकत के साथ है. राजकीय व्यवस्था में केंद्र-राज्य सम्बन्धों में मधुरता अपेक्षित है और इस अवधारणा को मोदी के विरोधी नवीन पटनायक और जयललिता जैसे मुख्यमंत्रियों ने चतुराई से ही सही, सौजन्यतामूलक भेंट करके पुष्ट तो किया है. पटनायक और जयललिता-दोनों प्रधानमंत्री से नयी दिल्ली में औपचारिक भेंट कर चुके हैं. दोनों को प्रधानमंत्री के साथ परस्पर सहयोग का आश्वासन भी मिला है, परन्तु दुर्भाग्य बंगाल का कि ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री के खिलाफ मोरचा खोल रखा है. उन्होंने औपचारिक तौर पर प्रधानमंत्री से अब तक सम्पर्क साधना मुनासिब नहीं समझा. बेरोजगारी और आर्थिक तंगी से जूझ रहे पश्चिम बंगाल के लिए ममता बनर्जी की यह राजनैतिक अकड़ सही नहीं कही जा सकती. परिवर्तन के नारे के साथ सत्ता में आईं ममता बनर्जी के लिए स्वयं में परिवर्तन लाना बेहद जरूरी है. वरना आने वाले दिनों में देश के अन्य राज्यों में तरक्की की किरणें भले दिखाईं दें, बंगाल में तो विनाश के बादल ही मंडराते दिखेंगे.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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2 thoughts on “तंगहाल बंगाल में ममता का जश्न..

  1. कुछ नहीं थोड़े दिन में यह ममता दिल्ली में भटकती नज़राएगी अभी अपने आप से शर्मिंदा है झेंप मिटा रही हैं

  2. कुछ नहीं थोड़े दिन में यह ममता दिल्ली में भटकती नज़राएगी अभी अपने आप से शर्मिंदा है झेंप मिटा रही हैं

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