खेत-खलिहानों के कूड़े में जाया हो रही हजारों मेगावाट बिजली..

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कृषि कचरा, बायोगैस और गोबर गैस आधारित बिजली उत्पादन को देना होगा अत्यधिक प्रोत्साहन.. निजी प्रतिष्ठानों और एनजीओ की व्यापक भागीदारी से हो सकता है सही इलाज..

-अनिल गुप्ता||

आधुनिक युग में तरक्की और अब जीवनयापन के लिए भी पानी के बाद दूसरी सबसे बड़ी जरूरत बिजली ही है. बिहार समेत कई दूसरे राज्य इस मामले में बुरी तरह पिछड़े हैं. इनका इलाज ढूंढने के लिए हमेशा विदेशी कर्ज और अंबानी, टाटा, बिड़ला जैसे उद्योग समूह की ओर देखना पड़ता है क्योंकि हमारी समझ में बड़े बिजलीघरों के बिना बिजली की जरूरत पूरी ही नहीं की जा सकती. हम सबों को आंखें खोलने की जरूरत है. बिजली की समस्या का समाधान, जिसमें कोयला और दूसरे संसाधनों की तरह इंधन के समाप्त हो जाने का खतरा भी नहीं है, हमारे गांवों और शहरों में है, खेत-खलिहानों और कचरों-नालों में है. मजेदार बात तो यह है कि ऐसी परियोजनाओं के लिए आपको विदेशी कर्ज और अंबानी, टाटा, बिड़ला जैसे उद्योग समूह की ओर भी देखने की जरूरत नहीं है. मगर हमारा ध्यान इनकी ओर नहीं जाता.cenn222307-05-2014-02-02-99N

इनमें से कुछ प्रोजेक्ट जैसे गोबर गैस प्लांट, बायोगैस प्लांट, पनबिजली परियोजनाएं पिछले समय में इक्का-दुक्का अस्तित्व में आती रहीं. मगर सही ढंग से इन योजनाओं पर काम नहीं होने और सरकार से वित्त पोषित योजनाओं सेे जेब भरने की संस्कृति के हावी रहने के कारण कोई भी परियोजना या तो पूरी नहीं हुई, या फिर पूरी होने के बावजूद चली नहीं. बिहार में आज आम मानसिकता है कि इस प्रकार की परियोजनाएं केवल इससे जुड़े हुए कुछ लोगों की जायज-नाजायज आर्थिक कमाई का जरिया होती हैं. लेकिन यदि हम गंभीर होने को तैयार हैं, यदि हमारी इच्छा शक्ति जागृत हो रही है, तो कम से कम बिजली की समस्या का हल खुद हमारे पास है. गुंजाइशों को क्रमवार समझने की कोशिश करें.

शहरी कचरे से बिजली
चूंकि बिहार में मैं सबसे ज्यादा मुजफ्फरपुर शहर को जानता हूं, इसलिए उसी का उदाहरण लें. पूरे शहर में जल निकासी बड़ी समस्या है. इस क्षेत्र में काम करने वाली किसी भी एजेंसी को कुछ करोड़ रुपए देकर पूरे शहर की जल निकासी की योजना बनवाई जा सकती है. चढ़ाई और ढलान के हिसाब से पूरा शहर छह या सात सेक्टर में बंटेगा. प्रत्येक सेक्टर के निकास विन्दु पर होगा नाली जल का शुद्धिकरण और वहीं स्थापित होंगे नाली के कचरे से चलने वाले छोटे-छोटे बिजलीघर. यहां बायो खाद भी बनेगी जो किसानों को बेची जा सकती है. ये बिजलीघर कम से कम नगर निगम की कार्यालयीय और स्ट्रीट लाइट संबंधी बिजली की जरूरत जरूर पूरी कर देंगे. प्रत्येक सेक्टर के नाली प्रबंधन, नाली जल शुद्धिकरण, कचरा प्रबंधन और कचरा आधारित बिजलीघर का संचालन यह पूरा काम किसी एक एजेंसी को ठेके पर दिया जा सकता है. अलग-अलग छह-सात सेक्टर में बंटे होने से हर सेक्टर का काम इतना छोटा हो जाएगा कि ठेका लेने वाली कंपनियों को कुछ शर्तों के तहत पूरे प्रोजेक्ट का पैसा भी लगाने को कहा जा सकता है. अपने देश में ऐसी ढेर सारी एजेंसियां हैं जो इस प्रकार के कार्य में निपुण हैं. मैं खुद इनमें से कुछ एजेंसी का जानता हूं.

गोबर गैस/ बायोगैस प्लांट
यह भारत की ऐसी खोज है जो बिजली और इंधन के मामले में देश को असीमित ऊंचाई तक ले जा सकती थी, मगर दृष्टिहीनता और इच्छाशक्ति के अभाव में हम इसका कोई फायदा नहीं ले सके. गाय-भैंस और दूसरे पशु पालने वालों को उनकी पशु क्षमता के अनुरूप ऐसा प्लांट लगाने का प्रोत्साहन देने के अलावा हम गांवों और पंचायतों में लोगों को कम्यूनिटी पशु केंद्र का आफर देकर बड़े गोबर गैस प्लांट भी लगा सकते हैं. इसके अलावा प्रत्येक आवासीय सरकारी केंद्रों (पुलिस व सेना केंद्र, होस्टल, अस्पताल, सरकारी कालोनी आदि) के परिसरों में दुग्ध उत्पादन के लिए पशु पालकों को आमंत्रित कर बड़ी क्षमता के गोबर गैस प्लांट लगा सकते हैं. इन प्लांटों से उत्पादित गैस सीधे रसोई के इंधन के तौर पर अथवा पावर प्लांट के लिए इस्तेमाल की जा सकती है. ऐसे प्लांट का संचालन (ऑपरेशन एंड मेंटेनेंस) निजी ठेकेदारों को दिया जा सकता है. गोबर गैस प्लांट की तरह ही काम करने वाले बायोगैस प्लांट बड़े आवासी इलाकों और सार्वजनिक शौचालयों में मल प्रबंधन कर लगाए जा सकते हैं. रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, अस्पतालों, इंदिरा आवास संकुलों और दूसरे आवासीय इलाकों में यह सहज ही संभव है.

ठहरे हुए पानी से बिजली
बिहार में जल जमाव बड़ी समस्या है. वर्षों पहले एक अध्ययन के दौरान मेरी जानकारी में आया था कि तब (1995) बिहार में लगभग 468000 हेक्टेयर भूमि पर जल जमाव था. ठहरे हुए पानी में जलकुंभी होना आम है. ऐसा ही पानी कालाजार के मच्छरों को भी जीवन देता है. भू माफियाओं की कृपा से तेजी से खत्म होते जा रहे सिकंदरपुर मन समेत बिहार के ऐसे सभी मन, चौर और झील का बिजली के हिसाब से प्रबंधन हो सकता है. मेरी जानकारी के अनुसार जलकुंभी में 35 प्रतिशत मिथेन गैस होती है. इन स्थानों पर बिजलीघरों के साथ-साथ इंटीग्रेटेड फिश फार्मिंग और खाद उत्पादन का भी काम होगा.

खेती के कचरे से बिजली
खेती का कचरा यानी बायोमास. यह ऊर्जा का प्राचीनतम साधन है. घरेलू और औद्योगिक दोनों. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बिजली या स्टीम उत्पादन के प्रचलित इंधनों कोयला, फर्नेश आयल, परमाणु इंधन आदि के मुकाबले यह ज्यादा सुरक्षित और कम प्रदूषण पैदा करने वाला ग्रीन फ्यूल कहलाता है. चंपारण में धान के छिलके और खगडिय़ा आदि क्षेत्रों में दूसरे कृषि कचरे से बिजली उत्पादन का काम जारी है. हमारे खेतों से मिलने वाले इन कृषि कचरों में सैकड़ों मेगावाट, बल्कि हजारों मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता है. इनमें केवल एक परेशानी है, हल्के होने के कारण इनका ज्यादा दूर तक ट्रांसपोर्टेशन नहीं किया जा सकता, अन्यथा ये अनुपयोगी हद तक महंगे हो जाएंगे. ऐसे में सौ किलोमीटर तक के दायरे में इनका इस्तेमाल कर लेना चाहिए. व्यक्तिगत अध्ययन के आधार पर मुझे लगता है कि औसतन पांच मेगावाट की यूनिट लगाने पर उसके सालो भर 80 फीसदी से ज्यादा की क्षमता में चलने की गुंजाइश बनी रहती है. ऐसे प्लांट की लागत भी कम होती है. मेरी जानकारी के अनुसार जमीन के अलावा ऐसे प्लांट पर प्रति मेगावाट सात से आठ करोड़ रुपए का ही स्थापना खर्च आता है. महज 35 से 50 करोड़ रुपए में खड़ी हो जाने वाली पावर यूनिट के लिए बिहार के हर जिले में उद्योगपति मिल सकते हैं. किसी विदेशी कर्ज और अंबानी, टाटा, बिड़ला जैसे उद्योग समूह की ओर देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी. पूरे बिहार में इस तरह के सौ से ज्यादा पावर प्लांट लगाने की गुंजाइश है.

गुंजाइशें बहुत हैं. मगर माहौल नहीं है. यह माहौल बनाना होगा. आइए शुरुआत करें आपसी चर्चा से और देखें कि यह चर्चा कहां तक जाती है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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