भारतीय महिला की अमेरिकी जीत..

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अमेरिकी शहर सीटल में सोमवार को पारित किये गए कानून के तहत वहाँ कामगार मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी बढ़ा कर 15 डॉलर प्रति घंटा कर दी गयी है. यह अमेरिकी इतिहास में भुगतान मूल्य की अब तक की सबसे ज्यादा निर्धारित राशि है. शहर के कामगारों की इस सफलता के पीछे एक लम्बा अभियान है और इस अभियान और इस कामयाबी के पीछे एक भारतीय का हाथ है. एक भारतीय महिला का. इनका नाम है क्षमा सावंत.kshamastrikepoverty

पिछले साल नवम्बर में सीटल सिटी काउंसिल में सोशलिस्ट अल्टरनेटिव कैंडिडेट के तौर पर चुनी गयी 41 वर्षीया क्षमा सावंत के शब्दों में वो एक सोशलिस्ट हैं. उनकी जीत के पीछे मिनिमम वेजेज बढाने और अमीरों पर टैक्स लगाने जैसे वायदे थे. अमेरिका जैसे देश में जहां सोशलिज्म और सोशलिस्ट को गहरे संदेह से देखा जाता रहा है, वहाँ एक सोशलिस्ट की इस तरह की जीत उम्मीद की किरण जैसी लगती है. उनकी इलेक्शन कैंपेन को शहर के 4 लाख वोटरों के एक बड़े हिस्से वर्किंग क्लास लोगों का समर्थन मिला.

पुणे में जन्मी क्षमा सावंत ने अपनी पढाई मुंबई से की जहां उन्होंने इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल की. उन्होंने इसके बाद अमेरिका में बतौर सॉफ्टवेर इंजिनियर नौकरी भी की, लेकिन ज्यादा दिन तक चल नहीं पाई. इसके बाद उन्होंने नार्थ कैरोलिना नामक अमेरिकी प्रान्त में इकोनॉमिक्स में पी एच डी पूरी की . सावंत के अनुसार उनका इकोनॉमिक्स पढने का फैसला दरअसल उन राजनीतिक और सामाजिक सवालों के उत्तर तलाशने की मुहिम था जिनसे उनका सामना भारत में भी हो चुका था.पिछले नवंबर एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि वह दिल से हमेशा एक सोशलिस्ट रही हैं.

सावंत का कहना है कि अमेरिका का एजुकेशन सिस्टम आपको इन सवालों के जवाब नहीं देता बल्कि सिर्फ कैपिटिलिस्ट सिस्टम के लिए एक इंटेलेक्चुअल जस्टिफिकेशन ही देता है. यह बस बताता है कि यूनियन्स कैसे बुरे हैं और गरीब लोग इसलिए गरीब हैं क्योंकि वे सुस्त हैं।

सावंत आगे बताती हैं कि अमेरिका की शिक्षण पद्धति में आपको इन सवालों के जवाब नहीं मिलेंगे बल्कि सिर्फ पूंजीवादी व्यवस्था के लिए एक बौद्धिक प्रमाण सामने रखता है. ये सिर्फ यही बताता है कि युनिसंस किस तरह से बुरे हैं और गरीब सिर्फ सुस्ती की वजह से अब तक गरीब हैं. ये सिर्फ कारण बताता है, वो भी कभी कभी.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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