जियत न दीन्हें कौरा, मरत उठावत चौरा..

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-शम्भुनाथ शुक्ला||
अभी कुल एक हफ्ता पहले मीडिया वाले और विपक्षी दल भाजपा नेताओं के सौजन्य से यह बताने में मशगूल थे कि गोपीनाथ मुंडे एक असंवेदनशील प्रशासक और झूठ बोलने में माहिर राजनेता थे. टीवी और सोशल मीडिया में यह प्रचारित हो रहा था कि गोपीनाथ मुंडे ने अपनी शिक्षा के बारे में एक झूठा हलफनामा दिया था. शिक्षा के लिहाज से वे मंत्री बनाने के लायक नहीं थे. पर एक सड़क दुर्घटना में उनकी मृत्यु के बाद ऐसा स्यापा डाले हैं जैसे इस सदी में गोपीनाथ मुंडे जैसा नेता नहीं हुआ. टीवी, अखबार और फेसबुक व ट्विटर यह भी बताने लगे कि गोपीनाथ मुंडे युधिष्ठिर से भी बड़े सत्यवादी और लोकप्रियता में गांधी से भी बढ़कर थे और युवावस्था में उनकी आसामयिक मृत्यु हो गई. मगर नई सत्तारूढ़ पार्टी के नियामकों के चलते तो राजनेता की उम्र अब घटा दी गई है और साठ के ऊपर का राजनेता बूढ़ा माने जाने लगा है.Modi_tribute

गोपीनाथ मुंडे 65 साल पार कर चुके थे और उनको एक बूढ़ा और निशक्त नेता ही कहा जाना चाहिए. टीवी और अखबार वाले बता रहे हैं कि किस तरह तीन का अंक मुंडे और महाजन के परिवार में काल बन गया. इसकी पुष्टि के लिए वे बताते हैं कि तीन मई 2006 को प्रमोद महाजन को उनके भाई प्रवीण महाजन ने मारा और तीन मई 2010 को प्रवीण महाजन की मृत्यु हुई और तीन ही मई को गोपीनाथ मुंडे परलोक सिधारे. यह कौन सी जानकारी है? प्रमोद महाजन के भाई प्रवीण महाजन ने उनको मारा तो उनका शत्रु हुआ. यह बताना चाहिए कि आखिर प्रमोद को उनके छोटे भाई ने क्यों मारा? दूसरा मुंडे और महाजन में करीबी संबंध थे. पर संबंध कैसे थे यह नहीं बताया. यह कैसी पत्रकारिता है जो अंधविश्वास तो बढ़ा रही है पर सत्य नहीं बता रही कि गोपीनाथ मुंडे अति पिछड़ी जाति के एक लोकप्रिय नेता थे और प्रमोद महाजन महाराष्ट्र की अत्यंत प्रभावशाली जाति ब्राह्मण समुदाय से थे. पर प्रमोद महाजन ने अपनी बहन की शादी गोपीनाथ मुंडे से करवाई थी.

मीडिया को यह भी बताना चाहिए कि प्रमोद महाजन कोई लोकप्रिय नेता नहीं बल्कि वे दो बड़े राजनेताओं के बीच पुल जरूर बन जाते थे. साथ ही इस समय पत्रकार शिवानी भटनागर को भी याद करना चाहिए जिनकी असामयिक मृत्यु के पीछे प्रमोद महाजन को बताया गया था तथा कैसे एक प्रभावशाली आईपीएस उस पत्रकार शिवानी भटनागर हत्याकांड के सबूत मिटाने के प्रयास में जेल जा चुके हैं. बहुत कुछ मीडिया को बताना चाहिए लेकिन सत्य को छिपा लेना ही मीडिया का मकसद होता है. कुछ सवाल भी खड़े होते हैं तो यह भी कि अगर गोपीनाथ मुंडे, जैसा कि एक अति प्रसारित दैनिक ने छापा था कि उन्होंने अपनी शिक्षा के बारे में गलत हलफनामा दाखिल किया था तो क्या मुंडे की मौत के बाद यह जांच नहीं होनी चाहिए और अगर झूठ छापा था तो यह भी कि क्या उस अखबार को दंडित नहीं किया जाना चाहिए? और उन नामी-गिरामी लोगों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं होनी चाहिए जिन्होंने इसे रस ले-लेकर फेसबुक पर प्रसारित किया था?

यह तो कुछ वैसा ही हुआ कि ‘जियत न दीन्हें कौरा, मरत उठावत चौरा’. यानी जीते आदमी का तो ताने मार-मार कर जीना मुहाल कर दिया और अब चले हैं उसके कसीदे काढऩे. ऐसी वैचारिक विचलन वाली शख्सियतों को थू है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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One thought on “जियत न दीन्हें कौरा, मरत उठावत चौरा..

  1. और जिस मीडिया को आप पानी पी पी कर कोस रहें हैं , उसी के माध्यम से अपनी बात भी कह रहें हैं धन्य हैं आप और आप जैसे लोग

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