तहं तहं भ्रष्टाचार..

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-ओम थानवी||

एक पुस्तक चर्चा में शिरकत का मौका मिला. सतीश अग्निहोत्री का व्यंग्य संग्रह है, ‘तहं तहं भ्रष्टाचार’ (राजकमल प्रकाशन). अग्निहोत्रीजी ने कई शासन-प्रशासन देखे हैं. पुस्तक में यों तो कई दिलचस्प रूपक हैं, पर ‘पुनर्मूषको भव’ पढ़ते हुए मुझे बरबस रंजन भट्टाचार्य और राबर्ट वाड्रा की याद आई. हालांकि आलेख पुराना है और लेखक के पात्र भी नितांत काल्पनिक रहे होंगे.om thanvi

व्यंग्य यों है कि एक कायाकल्प यज्ञ में मतदाता महर्षि एक चूहे पर खुश हुए और उसे कृपापूर्वक बिल्ली बना दिया. “मूषकों की जमात ने आंखें फाड़-फाड़कर महर्षि का कारनामा देखा. खुशी से कइयों की बांछें खिल गई. अपना मूषक बिल्ली बन गया. वाह, अब अच्छे दिन आएंगे!” …
“पर बिल्ली बनते ही मूषक ने उत्साह से इधर-उधर दौड़ लगाई. फिर उसने अपने ही दो-चार यार-दोस्तों पर हाथ साफ कर दिया और हुंकार लेता हुआ अपनी उपलब्धि की खुशियां मनाने लगा.”

कथा यों आगे बढ़ती है कि चूहे की खुशी अस्थाई साबित हुई. “कुत्तों का रोब-दाब देखकर उसकी ललक बढ़ी.”

चूहा फिर महर्षि के चरणों में गया. उन्होंने उसे कुत्ता बनाया. मूषक की लालसा और बढ़ी. उसने “सत्ता के समीकरणों” का “अध्ययन” किया और भेड़िया बनने की ख्वाहिश जाहिर की. भेड़िया भी बन गया. मगर चूहों, बिल्लियों, कुत्तों और अन्य जानवरों पर रोब और आतंक झाड़ने वाला भेड़िया शेर से मात खा गया. तो फिर पहुंचा महर्षि मतदाता के आश्रम में. शेर बनकर भी आ गया. मगर अब जल्द महर्षि के ही हिरण पर गुर्राने लगा.

तब महर्षि को कहना पड़ा — “अपना अतीत भी भूल गए?… तुमने तो बिल्लियों के, कुत्तों के और भेड़ियों के आतंक का, अत्याचार का, बुरे शासन का अंत करने के वायदों से अपना कायाकल्प करवाया था; और आज तुम खुद अत्याचार की प्रतिमूर्ति बन बैठे हो? अब भी वक्त है, होश में आओ.”

“मुझे उपदेश नहीं हिरण चाहिए.” मूषक दहाड़ा.

“अगर नहीं दिया तो?” महर्षि ने पूछा.

“तो समझो तुम अपने अंत को बुलावा दे रहे हो.” मूषक ने पैर सिकोड़े और महर्षि पर छलांग लगाते हुए दहाड़ना चाहा.
गुस्से से लाल महर्षि का हाथ उससे पहले ही हवा में उठ चुका था. उनके मुंह से शाप निकलाः “पुनर्रमूषको भव.”
तो चूहा फिर चूहा बन गया. तभी एक बिल्ली ने उस पर झपट्टा मारा. चूहे को उलटा-पलटा, सूंघा और बाहर फेंक दिया. चूहा बच गया. अपने बिल में घुस गया.
अब व्यंग्य के अंत का पूरा उद्धरण पढ़ें:

कहानी सुनाने के बाद वेताल ने आम आदमी से पूछा, “हे आम आदमी, मुझे आश्चर्य है कि मूषक की जान बच कैसे गई! भूरी बिल्ली ने उसे पकड़ में लेने के बाद भी छोड़ कैसे दिया? अगर जान-बूझकर तुमने इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया तो तुम्हारे सर के टुकड़े-टुकड़े होकर मतदान कक्ष में फैल जाएंगे?”

आम आदमी ने फिर एक ठंडी सांस भरी और कहा, “वेताल, मुझे पता था कि तुम ऐसा सीधा सवाल ही पूछोगे. भूरी बिल्ली दरअसल मूषकों की जमात का ही एक हिस्सा थी. मूषक की सफलता से प्रभावित होकर मतदाता महर्षि के पास जाने वाले मूषकों में वह भी एक थी. पिछले कायाकल्प यज्ञ में महर्षि ने उसे बिल्ली बना डाला था. मूषक को उसने पकड़ा तो था, पर पकड़ने के पहले उसने देख लिया था कि कैसे वह शेर से मूषक बना है. और उसे याद आया कि यह तो मूषक से शेर बना था. इसलिए उसे पकड़ने के बाद बिल्ली का विचार बदल गया. उसे एहसास हुआ कि एक दिन उसकी हालत भी शायद ऐसी ही हो. फिर हो सकता है, वह भी किसी बिल्ली की पकड़ में आ जाए. सो उसने मूषक को छोड़ देना ही उचित समझा. सहानुभूति और स्वार्थ के इस मिश्रण ने ही हारे हुए मूषक की जान बचाई. … भविष्य में भी हारे हुए अनाचारी शेरों की जानें इसी तरह बचती रहेंगी. उनकी जगह लेने वाले ही उनकी जान बचाएंगे.”

“बहुत अच्छे! हे आम आदमी, तुम्हें गणतंत्र की अच्छी समझ है.” वेताल ने कहा. पर चूंकि आम आदमी का मौन भंग हो चुका था, वह वापस उड़कर मतदान केंद्र की छत पर जा बैठा. आम आदमी ने एक हसरत भरी नजर उस पर डाली और अपना वोट डालने के लिए लाइन में आ लगा.

(वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी जनसत्ता के संपादक हैं तथा उनका यह लेख उनकी फेसबुक वाल से लिया गया है)

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