बदायूं गैंगरेप की शिकार बहनों की फांसी दिए जाने से हुई थी मौत..

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बदायूं गैंगरेप और हत्याकांड में दरिंदों की हैवानियत भरा सच सामने आया है. नाबालिग बहनों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट क्रूरता की कहानी कह रही है.

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि बच्चियों के अंदरूनी हिस्सों पर गंभीर चोटें थीं. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से यह भी पता चला है कि बलात्कार के बाद जब लड़कियों को फांसी दी गई, उस वक्त वह जीवित थीं और फांसी पर लटकाए जाने से उनकी मौत हुई.badaun-gang-rape

उल्लेखनीय है कि बदायूं के उसैथ इलाके के एक गांव में दो चचेरी बहनों (जिनकी उम्र 14 और 15 साल थी) से सामूहिक बलात्कार किया गया और उनका शव आम के एक पेड़ पर लटका दिया गया था.

पहले खबरें आई थीं कि दोनों बहनों की हत्या कर उनका शव पेड़ से लटकाया गया था, लेकिन पोस्टमार्ट रिपोर्ट से सच्चाई को खुलासा हुआ.

रिपोर्ट के मुताबिक दोनों बहनों के अंदरूनी हिस्सों में गंभीर चोटें थीं. जननांगों से खून के थक्के लोथड़े के रूप में तक बहकर शरीर पर जम गए थे.

बड़ी बहन की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में लिखा है कि उसके जननांग बुरी तरह क्षतिग्रस्त थे. जननांग नीला पड़ चुका था और खून से सना हुआ था और भीतर भी बहुत सी चोटों के निशान थे. कौमार्य की झिल्ली टूट गई थी. वेजाइनल डिस्चार्ज के भी संकेत मिले हैं.

दोनों के शरीर के कई हिस्सों, बांह, कमर और पैर समेत ऊपर से लेकर नीचे तक कई हिस्सों पर खरोंचों के निशान मिले हैं, जो नोचने, खसोटने और घसीटने की ओर संकेत कर रहे हैं. इन चोटों से साफ है कि दोनों बहनों ने वहशियों के चंगुल से निकलने का पूरा प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हो सकीं. दोनों बहनों की जीभ बाहर को निकली हुई मिली थी, जिससे साफ है कि फांसी पर लटकाए जाने से पहले वह जिंदा थीं.

दोनों पीड़िता 27 मई को लापता हो गई थीं और उनके शव अगले दिन बरामद हुए थे. बदायूं उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 300 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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