कभी आतंकवाद के खिलाफ कोई जन-आंदोलन क्यों नहीं करते हम भारतीय?

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-शिवनाथ झा।।

आवश्यकता है एक अदद भीम के तरह सभी पौरुष गुणों से युक्त गृह मंत्री की जो देश के शाशन व्यवस्था में लगे सभी कड़ियों को सूत्र बद्ध कर एक मजबूत, हौसलामंद और भय-मुक्त व्यवस्था की स्थापना कर सके।

आने वाले दिनों में शायद आप विभिन्न समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर इसी तरह का इश्तिहार पढने वाले हैं। उन इश्तिहारों में एक बात और होंगी- उन उम्मीद बारों को प्राथमिकता डी जाएगी जो देश की शाशन व्यवस्था में जुड़े गृह मंत्रालय के अधिकारियों की बातो को धैर्य पूर्वक सुनेंगे, गुप्तचर विभागों द्वारा संकलित सूचनाओं को सबसे अधिक प्राथमिता देंगे, साथ ही, अपनी छवि बचाने के लिए, अपनी बातों को ‘जबरदस्ती नहीं मन माने और थोपने की कोशिश नहीं करेंगे।

वर्तमान गृह मंत्री पी० चिदम्बरम उपरोक्त दायरे में नहीं आते हैं। पिछले 20 वर्षों से जो भी व्यक्ति चिदम्बरम को जानते है वे सभी इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि चिदम्बरम एक जिद्दी किस्म के इन्सान हैं। महिलाओं के बीच खासे लोकप्रिय रहे पीसी लोगों की बात कम सुनते हैं और अपनी बात को मनवाने का अथक प्रयास करते हैं। सरकार के अन्य मंत्रालयों में यह व्यवहार सफल हो सकता है लेकिन गृह मंत्रालय में, ऐसा ‘जिद्दी व्यवहार’ फलीभूत नहीं हो सकता है। कारण यह है कि गृह मंत्री, गृह मंत्रालय और देश की सुरक्षा व्यवस्था में लगे सभी कर्मियों की एक गलती देश की 120 करोड़ की आबादी को तत्क्षण भय और हताशा की स्थिति धकेल सकता है। गृह मंत्रालय का क्रिया-कलाप अन्य सरकारी विभागों जैसा (जहाँ मंत्री से अधिकारियों तक, की मानसिकता ‘एक जूनियर क्लर्क’ से अधिक नहीं है) नहीं हो सकता।

सरकारी महकमों में इस बात की चर्चा काफी तेज हों गयी है कि “प्रधान मंत्री डॉ० मनमोहन सिंह, कांग्रेस या यूपीए सरकार की जो भी मज़बूरी हों, गृह मंत्री को तत्क्षण पद-मुक्त कर देना चाहिए, क्योंकि मॉरल आधार पर अब पद-मुक्त होने की प्रक्रिया लगभग समाप्त हो चुकी है।” वैसे इस बात पर कांग्रेस से लेकर सरकारी महकमे के सभी अधिकारी , यहाँ तक की राजनितिक गुप्तचर विभाग भी, चुप है, लेकिन १०-जनपथ के करीबी कहलाने वाले वरिष्ट नेताओं का मानना है कि सभी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी का भारत लौटने का इंतजार कर रहे हैं।”

हर कोई है आजिज़?

सूत्रों का यह भी मानना है, 10-जनपथ वर्तमान गृह मंत्री के कुछ खास रवैये से भी नाखुश है जिसमे कांग्रेस अध्यक्ष के फैसले और इच्छा की अवहेलना की गई। इतना ही नहीं, राजीव गाँधी के हत्यारे – मुरुगन @ श्रीहरण, संथन और पेरारिवलन @ अरिवु – को फांसी ना लगे, बताया जाता है कि इस मामले में भी चिदम्बरम इसके पक्षधर है। राजीव गाँधी के हत्यारों को 9 सितम्बर को फांसी लगनी थी लेकिन मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में इसे अगले आठ सप्ताह के लिए बढ़ा दिया है। दुर्भाग्य तो यह है कि भारत के राष्ट्रपति ने भी “हाँ” या “ना” कहने में ग्यारह साल से अधिक का समय ले लिया, इसमें अधिक समय गृह मंत्रालय की ढीली नीतियाँ भी एक मुख्य कारण है।

मुंबई में हुए आतंकवादी हमले में तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल को “बलि का बकरा” बनना पड़ा। यह अलग बात अलग है कि पाटिल भी गृह मंत्री लायक नहीं थे तथापि उन्हें गृह मंत्रालय के कमरे से बाहर इसलिए निकल दिया गया क्योकि मुंबई के आतकवादी हमले देश के एक उच्च व्यवसायी रतन टाटा  के होटल में हुआ था जो अपनी हार कभी नहीं मानते। लोगों की जाने गईं , औरतें बेवा हुईं, बच्चे अनाथ हुए, पाटिल गए (बाद में राज्यपाल बने) होटल का कारोबार पुनः चालू हुआ, लेकिन अपराधी को क्या मिला? हमारी राजनीतिक और न्यायिक व्यवस्था सबसे बड़ा विरोधक है इन आतंकवादी गतिविधियों को जड़ से समाप्त करने में। किसी को सजा मिले या नहीं इसका निर्णय लेने में इतना वक़्त? और धिक्कार है भारत के उन लोगों को जो इन मामलों को लेकर कभी सड़कों पर नहीं आते-हाँ सज-धज कर “गेटवे ऑफ़ इंडिया” या “इंडिया गेट” पर मोमबत्ती जलाने जरुर पहुच जाते ताकि उस दिन विभिन्न टीवी चेन्नलों और समाचार पत्रों में अपनी तस्वीर देख सकें।

मंत्री अपना पद नहीं छोड़ें, इसकी शुरुआत लाल कृष्ण आडवाणी ने कर दी थी, जब वे उप-प्रधान मंत्री के अलावे भारत सरकार के गृह मंत्री भी थे और स्वतंत्र भारत में पहली बार संसद पर आतंकवादी हमले हुए, दर्जनों की जाने गयी। परिणाम क्या हुआ? शून्य। जिनके अपने मारे गए उनका क्या हुआ? आज तक सरकारी बाबुओं और सरकारी गलियारों के चक्कर लगा रहे हैं। इतना ही नहीं, फिर हमारी राजनीतिक और न्यायिक व्यवस्था की ढुलमुल नीतियों के कारण सभी दोषी सरकारी दामाद बने बैठे हैं और जेल की चारदीवारी के अंतर खा-खा कर अपना वजन बढ़ा रहे है।

वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि ‘लोहा ही लोहे को काटता है’ लेकिन जब लोहे में जंग लग जाये तो कोई भी उसे तोड़ कर फायदा उठा सकता है। आज देश में आतंकवाद का भी एही हाल है। सन अस्सी के दशक में जिन राजनितिक परिस्थितिओं का लाभ उठाने के लिए देश में आतंकवाद को पाल-पोश कर बड़ा किया गया, आज सरकार और शाशन व्यवस्था की बाग़ डोर चलाने वाले लोगों की “गिरती नैतिक स्तर” और “धूमिल होती इच्छा शक्ति” के कारण आतंकवाद का फायदा देश के आम  जनता के लाशों के ढेर पर  कोई और उठा रहा  है, साथ  ही, देश की आतंरिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए बहुत बड़ी  चुनौती खड़ा कर रहा है।

स्वतंत्र भारत  के पहले  गृह मंत्री सरदार  बल्लभ  भाई  पटेल  से लेकर  पिछले  पैसठ  साल  में देश अब  तक 17 गृह मंत्रियों को देखा  है, लेकिन दुर्भाग्य वश कोई “दूसरा  पटेल” नहीं बन  पाया। यह  अलग  बात है कि आज ‘स्वयंभु  पटेल’ का  दावा  करने  वालों  की कमी  नहीं है।
देश की आतंरिक  सुरक्षा  व्यवस्था से जुड़े  लोगों का मानना  है कि वर्तमान  गृह मंत्री ‘सबसे  कमजोर’ और ‘जिद्दी  किशम ‘ के गृह मंत्री हैं । सूत्रों  का यह  भी मानना  है कि गृह मंत्रालय  में गृह मंत्री और मंत्रालय  के वरिष्ट और जिम्मेदार  अधिकारियों  के बीच  जो  ताल-मेल  होनी  चाहिए, उसका  पूरा  आभाव   है जिसका  सीधा  प्रभाव देश की शासन व्यवस्था पर  पड़ता  है। “दूसरों  की बातों  को ना  सुनना  और अपनी  बातों  को थोपना वर्तमान गृह मंत्री पी० चिदम्बरम का सबसे बड़ा लक्षण है।”

सरकारी  दस्तावेज  के अनुसार, पिछले  दस  सालों  में देश में 36  से ज्यादा  आतंकवादी  हमले  हुए  हैं  (औसतन  3.6 हमला   प्रति  वर्ष ) जिनमे  1535 लोगों (सुरक्षा  कर्मी  सहित ) की जानें  गई  हैं और उनका  लहू  देश की सड़कों  पर  पानी  की तरह  प्रवाहित  हुए। इस आंकड़े  के अनुसार , देश में प्रत्येक  वर्ष  153  से अधिक  लोगों की जान  विभिन्न  आतंकवादी  हमलो  में जाते  रहे  है।

यहाँ यह बात लिखते मुझे हिचक नहीं हों रही है कि आतंकवाद मिटने के लिए या फिर उससे निपटने के लिए सरकार या शाशन को जो लोगों का समर्थन मिलना चाहिए वह नहीं मिला और ना ही मिल रहा है। पंजाब से आतंकवाद समाप्त होने के पीछे आम लोगों का समर्थन बहुत बड़ा मुद्दा था। हाँ, यह अलग बात है कि पंजाब के आतंकवाद को वर्तमान समय के आतंवाद के साथ तुलना नहीं किया जा सकता है – परिस्थितियां अलग हों गई हैं।
लेकिन इस बात से भी कोई इंकार नहीं कर सकता है कि भारत में हों रहे आतंकवादी हमलों में सिर्फ पाकिस्तान का हाथ है। विश्व के अन्य देशों में भी आतंकवादी गतिविधियां हैं और खास-कर उन देशों में जहाँ से भारत अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए आर्थिक मदद लेता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वह देश भारत को सुरक्षा व्यवस्था के लिए आर्थिक मदद/ कर्ज दे सकता है तो आतंकवादी गतिविधियों को भी निर्यात कर सकता है  और इसे किसी भी परिस्थिति में इंकार नहीं किया जा सकता।

भारत को विश्व के सामने इस बात का जबरदस्त प्रोपैगंडा करना होगा कि वह किसी भी राष्ट्र से किसी भी तरह का आर्थिक मदद लिए बिना वह अपने आप आतंकवादी घटनाओं से निपटने/ रोकने में सक्षम है और इसमें लोगों की सम्पूर्ण भागीदारी सर्वोपरि है। दुर्भाग्य यह है कि अपने लोग भी कम ‘निठल्ले’ नहीं हैं।

भ्रष्टाचार के मसले पर पूरा देश सड़क पर आ सकता है – चाहे इससे कोई भी लाभान्वित हो लेकिन इस बात को नहीं समझ पा रहे है कि आखिर लोग रहेंगे तब ना भ्रष्टाचार की बात करेंगे। आतंकवाद से निपटने या उसे रोकने  के मामले में आज तक कोई भी जन आन्दोलन नहीं हुआ है। क्यों?

दिल्ली उच्च न्यायालय में हुए आतंकवादी हमले और लोगों की लाशों की कहानी इससे अलग नहीं है और परिणाम भी इससे अलग नहीं होगा और यह प्रक्रिया तब तक जारी रहेगी जब तक इस देश का एक-एक नागरिक आतंकवादी घटनाओं या आतंकवाद से लड़ने के लिए बिना किसी सरकारी फरमान के सड़कों पर नहीं उतरेगी।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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12 thoughts on “कभी आतंकवाद के खिलाफ कोई जन-आंदोलन क्यों नहीं करते हम भारतीय?

  1. पहले स्वयं को बदलो,फिर अपने घर को,फिर अपने मोहल्ले को,फिर अपने शहर को,फिर अपने समाज को, फिर अपने प्रदेश को,फिर अपने देश को और समस्त भू- लोक के जन मानस को….सब बदल जाएगा ….””बूरा जो देखण मै चला बुरा न मिल्या कोई,जब मन देखा आपना मुझ से बुरा मिला न कोई””पहले शुरू करो स्वयं से…..

    जय हो !!!

  2. आवश्यकता है एक अदद भीम के तरह सभी पौरुष गुणों से युक्त गृह मंत्री की जो देश के शाशन व्यवस्था में लगे सभी कड़ियों को सूत्र बद्ध कर एक मजबूत, हौसलामंद और भय-मुक्त व्यवस्था की स्थापना कर सके।

  3. देश में आतंकवादी धमाके तब तक संभव नहीं है जब तक कुछ ऑफिसर, नेता (देशद्रोही) की मिलीभगत न हो और लोग पैसे लेकर देश की सुरक्षा दाव पर लगा देते है ये सब भ्रष्टाचार का ही परिणाम है, आतंकवाद के खिलाफ कड़ोर निर्णय ले और उसका सख्ती से पालन भी हो पर वोट बैंक की राजनिति और दोहरे चरित्र वाले नेता ऐसा होने देंगे इसमें शक है!

  4. सबसे पहले बात हम पी.चिदंबरम की करते हैं जो दुर्भाग्य से इस देश के गृहमंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर विराजमान हैं। इस पद पर विराजमान होने के लिए उनकी योग्यता नहीं बल्कि कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षा, सोनिया गांधी की इच्छा है जो पार्टी को अपने जेब में रखना चाहती हैं। उनके लिए देश के हित से बड़ा गांधी परिवार का हित है और राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की राह में कोई बाधा ना बने इसके लिए लुंज-पुंज व्यवस्था की गई है। इसी व्यवस्था के तहत, ईमानदार सिंह को प्रधानमंत्री पद पर बिठाया गया है और उनकी ईमानदारी पर कोई शक नहीं इस देश को। ऐसे चौकीदार हैं ईमानदार सिंह की उनकी आंखों के सामने सारे घोटाले होते रहे लेकिन ईमानदार सिंह को कुछ नजर नहीं आया। ईमानदार सिंह ने प्रधानमंत्री की कुर्सी के लोभ में धृतराष्ट्र को भी मात दे दिया है। देश पर आतंकवादी हमला होते रहे तो इनकी बला से। इनका क्या। 24 घंटे सुरक्षा व्यवस्था में रहते हैं। इन पर कोई हमला तो नहीं हुआ। जिस देश में एक चपरासी की नौकरी के लिए कितने तरह की योग्यता की जरूरत होती है उस देश में प्रधानमंत्री पद के लिए गांधी परिवार के प्रति आंख मूंदकर समर्थन करते रहना भी योग्यता में ही आता है। मूंदहू आंख कतहूं कुछ नाहीं की तर्ज पर ईमानदार सिंह को कुछ दिखता ही नहीं बजाए सोनिया की भक्ति के। वैसे भी इस देश की आबादी इतनी है कि दो-चार धमाके होते रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। उल्टे नेताओं के लिए ये मौसम मीडिया माध्यमों में प्रचार पाने का सुनहरा मौका लेकर आता है जैसे कि देश के कुछ हिस्से में बाढ़ या सुखाड़ नेताओं के लिए सरकारी पैसे को लूटने के लिए बेहतरीन मौका लेकर आता है और सरकारी कर्मचारी एवं नेता लोग इसकी प्रतीक्षा में अपने पलक-पांवड़ें बिछाते रहते हैं उनके लिए तो यबे सब भगवान का दिया हुआ है। गरीब की जोरू सबकी भौजाई, ये सब मरने के लिए ही पौदा होते हैं। रही बात लोकसभा के पूर्व सभापति और देश के पूर्व गृहमंत्री और लातूर से पूर्व सांसद, शिवराज पाटिल का तो देश जब सबसे बड़े आतंकवादी हमले का शिकार हुआ था तो ये साहब कम से कम 7 बार कपड़े बदल कर प्रेस को संबोधन करने के लिए आए। इनकी आत्मा तो पहले ही मर चुकी थी। शायद नेताओं में यह होता ही नहीं है। देश को ऐसे नेता की जरूरत है जो सभी धर्म, संप्रदाय, जाति के लोगों को साथ लेकर चले ना कि अपने लाभ के लिए देश के हित को दांव पर लगाये। आज ऐसे ही नेता भरे-पड़े हैं जिनके रवैये से आम-आदमी तंग आ चुका है और वह हर उस अन्ना हजारे का साथ देने को तौयार है जो उसे इन नेताओं से छुटाका दिलाए। संविधान की आत्मा इन नेताओं के कारनामों से दु:खी हो चुकी है और अगर समय रहते ये ना बदलें तो देश के लोग इनको बदल देगा। दीवार पर लिखी साफ इबारत को हमारे देश के नेता लोग ठीक से पढ़ नहीं पा रहे हैं ये देश का दुर्भाग्य है।

  5. धन्यवाद् सर , लेकिन पता नहीं कब शुरू होगा आतंकवाद के खिलाफ जन आन्दोलन ……….. जो लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन चला रहे है ….उन्हें आतंकवाद के खिलाफ भी आन्दोलन चलाना चाहिए ….. ये महत्वपूर्ण है….धन्यवाद् ….

  6. समाचार ऐसा नहीं की ‘सच की तरह दिखे’, हमने तो ‘सिर्फ सत्य लिखना सिखा है’ चाहे वह दिखे कैसे भी. आप सबों को यह लेख पसंद आया, आप सबो को सुक्रिया.

  7. देश में आतंकवादी धमाके तब तक संभव नहीं है जब तक कुछ ऑफिसर, नेता (देशद्रोही) की मिलीभगत न हो और लोग पैसे लेकर देश की सुरक्षा दाव पर लगा देते है ये सब भ्रष्टाचार का ही परिणाम है, आतंकवाद के खिलाफ कड़ोर निर्णय ले और उसका सख्ती से पालन भी हो पर वोट बैंक की राजनिति और दोहरे चरित्र वाले नेता ऐसा होने देंगे इसमें शक है!

  8. शिवनाथ जी,

    इस लेख से हमें ये तो पता चल रहा है की इस देश के वर्तमान राजनितिक गतिविधिओं से आतंकवाद को बढ़ावा तो मिल सकता है , मगर आतंकवाद पे लगाम लगाना असंभव है . या तो कांग्रेस्सिओं की तथाकथित मुस्लिम तुष्टिकरण हो या भाजपा वालों का प्रचलित हिन्दुवाद, दोनों आतंकवाद को सिर्फ बढ़ावा ही नही अपितु प्रलोभन भी देते हैं. आज देश की इस हालत के लिए सिर्फ ५४३ सांसद जिम्मेवार नही हैं.
    जहाँ तक मौत की सज़ा देने की बात है , यह किसी भी इंसान को आतंकवादी से क्रन्तिकारी बनाने के लिए काफी है. अगर हम अफज़ल और कसाब को फांसी पे चढाते हैं तो देश में आतंकवाद को और बढ़ावा देंगे.

    देश की जरूरत ऐसे संगठन की है , जिसमे हम प्रण लें की आतंकवादिओं का संहार करना है , संचय नही.

  9. हमें समय आ गया हे अब आतंकबाद के खिलाफ मुकाबला करेने हेतु उड़ खड़े होने का एसे लोग किसी समय भी निर्दोष लोगो की जान से खेलते हे बह ना तो किसी धर्म के अनुयायी हे ना किसी संस्क्रती के दुनिया का कोई भी धर्म इस प्रकार की हिंसा फेलाने का सन्देश नहीं देता ह

  10. बसिकाल्ली pc को होम मिनिस्टरी में आनंद नहीं आ रहा ओह चाह रहा किसी तरह फिर वित् मंत्रालय मिल जय ताकि उनके कुनबे की दुकानदारी चलती रहे

  11. आदरणीय सर

    अत्यंत ही सराहनीय लेखन . हरेक पंक्ति यथार्थ और सत्यता से परिपूर्ण है .

  12. वाकई एक बेहतरीन खबर बनाई है आपने…
    काफी गहराई तक पहुंचे है आप.
    चिदंबरम की सच्चाई यहाँ लिखी गई है…

    सराहनीय ……

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