राजेन्द्र माथुर मूलत एक चाटुकारिता पसंन्द इंसान थे..

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-राजीव नयन बहुगुणा||

मेरे सम्पादक – मेरे संतापक

इसी लिए कोई भी उनको ठग लेता था. अपनी ज़रा सी श्लाघा पर खुश हो जाते और विपरीत वाक्य पर क्रोधित. अंग्रेजी के पत्रकार उनसे अतिशय भयभीत रहते थे, क्योकि जब क्रोधित होते तो माथुर बाबा उनकी हज़ार गलतियाँ निकाल लेते थे.Rajendra-Mathur

राजेन्द्र माथुर अजब ढंग के अकडू आदमी थे . उस दौर में हिंदी पत्रकारिता का दबदबा था और नव भारत टाइम्स उसका सिरमौर . सुनते हैं कि एक बारतत्कालीन पी एम राजीव गांधी ने उन्हें डिनर का न्योता भेजा . माथुर ने कहलाया कि भोजन के लायक अनुकूल वेतन मुझे मिलता है . यद्यपि वह राजीव गांधी के हित में निरंतर लेखन करते थे.

राजेन्द्र माथुर स्वयम को अंग्रेज़ी दां सिद्ध करने का अभिक्रम करते थे , लेकिन मूलतः इस उपक्रम में खुद को ही छलते थे . अंग्रेज़ी के पारंगत अवश्य थे पर मन से ठेठ देहाती . एक शाम मुझे दफ्तर के बाहर ढाबे पर मिले . बोले – कहीं छोड़ दूँ क्या ? और फिर मेरे प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा किये बगैर कार का पट खोल मुझे साथ ले चले . मैं पहले ही अन्यत्र उल्लेख कर चुका हूँ कि कार खुद हांकते थे . अम्बेसेडर कार खुद चलाने वाले मैंने सिर्फ दो बड़े लोग देखे . एक मन मोहन सिंह और दूजे माथुर बाबा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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