महान में नहीं होगी पेड़ों की अक्टूबर तक कटाईः मध्यप्रदेश सरकार ने एनजीटी में कहा..

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नई दिल्ली.  मध्यप्रदेश सरकार ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को कहा है कि महान जंगल में अक्टूबर तक कोई पेड़ नहीं काटे जायेंगे. राज्य सरकार का यह फैसला महान संघर्ष समिति के लिए अस्थायी राहत लेकर आया है जिन्होंने महान कोल ब्लॉक को मिले दूसरे चरण की मंजूरी को पिछले हफ्ते एनजीटी में चुनौती दी थी.
महान संघर्ष समिति के सदस्य और इस केस में अर्जीदार हरदयाल सिंह गोंड कहते हैं कि, “यह भले हमारे लिए अस्थायी राहत की बात है. लेकिन हमलोग जंगल में खदान से संबंधित किसी भी तरह के गतिविधि का विरोध जारी रखेंगे”.mahan

इस महीने की शुरुआत में चार वन सत्याग्रहियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था जो जंगल में मार्किंग का शांतिपूर्वक विरोध कर रहे थे.

महान संघर्ष समिति द्वारा दायर अर्जी में महान कोल ब्लॉक को मिली मंजूरी में वन (संरक्षण) अधिनियम 1980, राष्ट्रीय वन नीति 1988, जैव विविधता अधिनियम 2002 और अनुसूचित जनजाति और अन्य वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 के प्रावधानों के साथ सतत विकास के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ बताया गया है. इस कोल ब्लॉक को एस्सार पावर और हिंडाल्को को संयुक्त रुप से आवंटित किया गया था.

गोंड आगे कहते हैं कि, “हमलोग इस कोयला खदान के प्रस्ताव का दो सालों से भी अधिक समय से विरोध कर रहे हैं. लेकिन हमारे विरोध के बावजूद यूपीए सरकार ने इसे दूसरे चरण की मंजूरी दे दी”.

महान जंगल में कोयला खदान आने से पांच लाख पेड़ काटे जायेंगे और हजारों ग्रामीणों की आजीविका खत्म होगी.

राष्ट्रीय वन नीति 1988 के अनुसार जंगली भूमि का गैर जंगली उद्देश्य के लिए उपयोग करने से पहले बेहद सावधानी की जरुरत है लेकिन महान के मामले में इस तरह की सावधानी नहीं बरती गयी. ग्रीनपीस की सीनियर कैंपेनर प्रिया पिल्लई कहती हैं कि, “5 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय और मंत्रियों के समूह द्वारा सबसे आरामदायक तरीके से पेश किया गया है जिसने महान कोल ब्लॉक को पहले चरण की मंजूरी के लिए सिफारिश किया था”.

वे आगे कहती हैं कि, “सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव को बिल्कूल ही नजरअंदाज किया गया है”.

वनाधिकार कानून का उल्लंघन

वनाधिकार कानून 2006 को इस क्षेत्र में लागू ही नहीं किया गया है. जूलाई 2013 में खुद जनजातीय मंत्री केसी देव ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को इस मामले को लेकर पत्र लिखा था. इस क्षेत्र में एक भी सामुदायिक वनाधिकार नहीं दिया जा सका है. इसके अलावा वनाधिकार कानून में ग्राम सभा की मंजूरी को प्रासंगिक बनाया गया लेकिन अमिलिया में वनाधिकार पर आयोजित विशेष ग्राम सभा में पारित प्रस्ताव पर फर्जी और मरे हुए लोगों के हस्ताक्षर कर दिये गए. इसी फर्जी ग्राम सभा प्रस्ताव के आधार पर महान कोल ब्लॉक को दूसरे चरण की पर्यावरण मंजूरी दे दी गयी.

वन संरक्षण अधिनियम की सिफारिश भी नजरअंदाज की गयी

वन संरक्षण अधिनियम 1980 के अनुसार जंगल के किसी भी विषयांतर के लिए वन सलाहकार समिति द्वारा विचार किया जायेगा जो बाद में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को अंतिम निर्णय के लिए सिफारिश कर देगा लेकिन महान के मामले में प्रक्रिया बहुत अलग निकला.
12 जूलाई 2011 को वन सलाहकार समिति ने अपनी रिपोर्ट में महान कोल ब्लॉक को अस्वीकार करने का सुझाव दिया. “ऐसा क्षेत्र के जमीनी हकीकत का वैज्ञानिक अध्ययन के बाद सिफारिश किया गया था लेकिन वन व पर्यावरण मंत्रालय ने इसपर विचार नहीं किया. अंततः महान को मंत्रीमंडल समूह की सिफारिश पर पहले चरण की मंजूरी दे दी गयी”.

ग्रीनपीस के सीनियर कैंपेनर नंदीकेश शिवालिंगम कहते हैं कि यह मंजूरी ही गलत है और आने वाले समय में यह एक गलत संदेश लेकर जायेगा.

वन्यजीव अध्ययन

पहले चरण की मंजूरी में स्पष्ट कहा गया कि वन्यजीव अध्ययन के लिए वन्यजीव संस्थान ऑफ इंडिया और वन्यजीव ट्रस्ट ऑफ इंडिया या इसी तरह के अन्य प्रतिष्ठित संस्थान द्वारा क्षेत्र में कोयला खदान से वन्यजीव के आवास पर प्रभाव का मूल्यांकन होना चाहिए. नन्दी बताते हैं कि, “लेकिन अंतिम रिपोर्ट अवैज्ञानिक और गलत और भ्रामक हैं. यह एक तरह से पिछली रिपोर्ट का ही कट पेस्ट है”.

महान जंगल में 164 प्रजातियों साल, साज, महुआ, तेंदू आदि का निवास स्थान है. इसके अलावा कई तरह के जानवरों का भी निवास है.
संचयी प्रभाव आकलन अभी भी प्रतीक्षित संचयी प्रभाव आकलन जिसमें छोटे से क्षेत्र में कई पावर प्लांट और कोयला खदान होने का अध्ययन किया जाना है अभी भी प्रतीक्षित है. पहले चरण की मंजूरी के समय कहा गया था कि इस अध्ययन को आईसीएफआरई और एनईईआऱआई जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से कराया जाना है.

प्रिया पिल्लई कहती हैं कि, “पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, क्षेत्र में आ रही परियोजनाओं की बड़ी संख्या को देखते हुए संचयी प्रभाव आकलन की आवश्यकता को पहचानता है और अभी तक पूरा हो जाने के अध्ययन के लिए इंतजार किए बिना परियोजना के लिए वन विभाग की मंजूरी दे दी गयी”.

हरदयाल गोंड आगे कहते हैं कि, “हम आशा करते हैं कि एनजीटी इस केस में जंगल बचाने में हमारी मददगार साबित होगी. हमलोग अंत में न्याय लेकर रहेंगे”.
ग्रीनपीस और महान संघर्ष समिति लगातार जंगल में किसी भी तरह के गैर-जंगली काम का विरोध करती रहेगी

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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