मेरे सम्पादक – मेरे संतापक..

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-राजीव नयन बह्गुणा||

राजेन्द्र माथुर अपनी धुन में रहते थे . अपने अंग्रेजी ज्ञान पर उन्हें दर्प था . हो भी क्यों नहीं , अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर जो रह चुके थे . लेकिन अपने बारे में उन्हें ग़लत फहमी थी . बेसिकली वह एक ठेठ देसी , बल्कि देहाती आदमी थे . अपने शहर इंदौर से बे पनाह मोहब्बत करते थे , और इन्दौरियों को प्रश्रय भी देते थे . अपने समकालीन और वाग्मी प्रभाष जोशी से एकदम उलट अंतर मुखी थे .rajendra mathur
राजेन्द्र माथुर मूलतः एक संत लेकिन आत्म विमुग्ध व्यक्ति थे । इतने आत्म विमुग्ध कि खुद की ही सुध – बुध भूल जाते थे । इसी लिए जल्दी निपट लिए । अपनी बिमारी के प्रति लापरवाह रहे । एक दिन जब सीने में दर्द उठा तो पडोस के लघु चिकित्सक से चेक अप कराने चल दिए । उसने व्यवसाय पुछा तो बोले कि नव भारत टाइम्स में नौकरी करता हु । डॉक्टर बोला – तुम्हारे सम्पादक राजेन्द्र माथुर को खूब पढ़ता हूँ । इस पर बोले कि मैं ही राजेन्द्र माथुर हूँ । सुनते हैं कि इस पर डॉक्टर हडबडा गया और उसके हाथ से आला छुट गया । मित्रो ,मैं चरण स्पर्श संस्कृति के प्रतिकूल हूँ , लेकिन जिन गिने चुने पुरुषों के चरणों में मैं अवनत हुआ उनमें एक माथुर भी थे.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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