लुभावने नारों का तिलस्म…

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जै श्री राम, फील गुड, इंडिया शाइनिंग और अच्छे दिन आने वाले हैं..

-हरीश जोशी||

विश्व विख्यात दार्शनिक और विचारक जार्ज बर्नाड शॉ ने दुनिया भर में लोकतंत्र प्रणाली का नजारा देखते हुए कहा था कि, ‘लोकतंत्र वह प्रणाली है जहां पर मूर्खों का, मूर्खों द्वारा मूर्खों के लिये शासन होता है.’’ संयोग से लोकतंत्र के उपर इतनी बड़ी बात कहने वाले इस दार्शनिक ने भारतीय लोकतंत्र का प्रवेश भी नहीं देखा. चूंकि जब वर्ष 1950 में भारतीय लोकतंत्र अपना रूप ले रहा था उसी दौर में यह विचारक दुनिया को अलविदा कह चुका था. अन्यथा भारतीय लोकतंत्र पर इस दार्शनिक की क्या टिप्पणी होती इसका अंदाजा करना मुश्किल नहीं है.good days

सही मायने में देखा जाए तो अपने जीवन के छह दशक से भी अधिक का कालखंड देख चुके भारतीय लोकतंत्र ने भीड़तंत्र को पोषण और क्रियान्वयन की नजीर ही पेश की है. यहां तक कि प्रबुद्व कहे जाने वाले यहां के मतदाता भी अलग-अलग समय में विभिन्न राजनैतिक दलों के तिलिस्मी व लोक लुभावन नारों के मोहपाश में बंधते दिखाई दिये हैं. और भावनाओं में बहने का पहले से ही तैयार बैठे मतदाताओं को भावनात्मक नारे देकर अपनी ओर बरगलाने में भाजपा को महारत हासिल है. और यही वजह है कि कदाचित इसी महारत के दम पर यह पार्टी इस बार देश की महारथी बन बैठी है.

चुनावों की दृष्टि से वर्ष 1991 से वर्तमान 2014 तक का 24 वर्षीय कालखंड देखें तो पता चलता है कि भारतीय जनता पार्टी ने इस देश के मतदाताओं की भावनाओं और उनके भावनात्मक संवेगों से देश व्यापी और क्षत्रवार अलग-अलग तरह से खेला है. यही नहीं मतदाता भी इनके इस भावनात्मक राजनैतिक खेल का बड़ा हिस्सा बनकर उभरे हैं. वर्ष 1991 के आम चुनावों में हिन्दू धर्मावलम्बी मतदाताओं के बड़े वर्ग को अपनी ओर लुभाने के लिये अयोध्या राम मंदिर निर्माण और जै श्री राम का लोक लुभावना नारा दिया. परिणाम स्वरूप अंध धर्मावलंबी जनता ने बड़ी संख्या में मतदान कर भाजपा को खासे सांसद और विधायक जिताकर दिये, परन्तु आज के दौर में भाजपा के कद्दावर नेता भी इस नारे और मुद्दे से गुरेज करते हैं.

चुनावों के अगले दौर में भाजपा ने फीलगुड का नारा बुलन्द किया. जनता को तो फीलगुड कभी हो न सका परन्तु भाजपा के चुनाव जीते सांसद और विधायक जमकर फीलगुड कर चुके.

अब एक बार इंडिया शाइनिंग का नारा देकर भाजपा ने अपना राजनैतिक मार्ग प्रशस्त किया. इंडिया तो कभी शाइन नहीं कर सका परन्तु इंडिया के वाशिन्दों और उनके हक-हकूकों को गिरवी रखकर इस देश के राजनैतिक खेवनहारों ने इंडिया के नाम से लाखों-अरबों के कर्ज-करार और मसौदे अवश्य साइन किये.
अबकी बार इसी भारतीय जनता पार्टी ने ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ का लोक लुभावन नारा दिया जैसा कि मनुष्य स्वभावतः जन्म से ही मृत्यु पर्यन्त अच्छे दिन, अच्छे समय और अच्छी स्थिति की उम्मीद में ही रहता है. लिहाजा मतदाताओं के बड़े वर्ग ने इसी भावना के चलते इस नारे को हाथों हाथ लिया और देश के मतदाताओं ने सत्ता की चाबी भाजपा के हाथों सौंप दी है. उम्मीद की जानी चाहिए कि अच्छे दिन आ जायें. परन्तु भाजपा के लिये इस नारे को गढ़ने वाले की भाषा समझ भी इतनी गहरी और पैनी रही है कि व्याकरण की दृष्टि से देखें तो अच्छे दिनों की कपोल कल्पित कल्पना दिखाकर जनता को निरूत्तर सा छोड़ दिया है.
इन दिनों बड़ा मजा हो रहा है जब कोई किसी से पूछ रहा है कि अच्छे दिन आ गये? सामान्य सा उत्तर होता है कि…….. आने वाले हैं. सायद यही उत्तर लगातार मिलता रहेगा.

इस देश में चुनाव और चुनाव जीतने वालों का 65 साल का इतिहास रहा है कि जनता की पूछ किसे है इनके तो अच्छे दिन होते ही हैं, रही बात मतदाताओं और जनता की उनके लिये तो बस……. अच्छे दिन आने वाले हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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One thought on “लुभावने नारों का तिलस्म…

  1. जीत हजम नहीं हो रही , शायद लेखक महोदय वोट दे जिताने वाली जनता को बेवकूफ मानते हैं और केवल खुद को ही ज्यादा समझदार वैसे यह उनका हक़ भी है पर यह भूल जाते हैं की मुफ्त अनाज साम्प्रदायिक आरक्षण जातिगत विभाजन के आधार को क्या किसी लोकतंत्र की नींव मन जा सकता है जिसके आधार पर कांग्रेस वोट मांगती रही बेहतर होता कि कांग्रेस अपने घोटालों का भी जिक्र कर जनता से माफ़ी मांगती महंगाई, महिला सुरक्षा आतंकवाद से सम्बंधित ठोस नीति बेरोजगारी विकास के मुद्दे उठा वोट मांगती तो जनता फिर उन पर भी विश्वास करती अब भ ज पा के नारों पर उन्हें ऐतराज हो रहा है पर श्रीमान लेखक महोदय यह भूल रहे हैं की जनता ने पिछले साथ साल में कांग्रेस को कितना भुगता है , गत दस सैलून में तो इसकी पराकाष्टा ही हो गयी और ऊपर से पप्पू ब्रांड नेता को देश का प्रधान मंत्री बनाने का संकेत भी दे दिया जो शायद फिर देश पर एक बड़ा बोझ होता भ ज पा को कोसने के बजाय कांग्रेस की नीतियों व कार्यों का मूल्यांकन करते तो कुछ आत्मावलोकन का भी अवसर मिलता व मन को शांति भी होती

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