सांप्रदायिक हिंसा से जलता असम..

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असम के बोड़ोलैंड क्षेत्रीय जिले के बक्सा और कोकराझाड़ में बोड़ो और प्रवासी मुस्लिम समुदाय के बीच पिछले 3 दिन से जारी सांप्रदायिक हिंसा में कम-से-कम 40 लोग मारे जा चुके है, जिनमे महिलाएं और बच्चे भी शामिल है. प्रभावित क्षेत्रों से पीड़ित ग्रामीणों का पलायन जारी है और हिंसा की ख़बरें लगातार आ रही है. इन घटनाओ से पूर्व में हुए बोड़ो और मुस्लिम समुदायों के बीच हुई भयानक हिंसा की पुनरावृत्ति की आशंका बढ़ गई है.

Assam_Riots

2010 और 2012 में हुई हिंसा में 150 से अधिक लोगो की जान गई थी और तकरीबन ढाई लाख लोग प्रभावित हुए थे.

1993-94 में पहली बार हुई बोड़ो समझौते के कारन बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे और लाखों लोगो को अपना घर बार छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा था. वैसे हिंसा की शुरुआत हिंदुस्तान की आज़ादी के साथ ही हो गई थी. 1946-47 में कोकराझाड़, बक्सा, चिरांग और उदलगुड़ी जिले में बोड़ो आदिवाशियो और प्रवासी मुस्लिमो के बीच हिंसक झड़प की शुरुआत हो चुकी थी. बोड़ो समुदाय का आरोप है की बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ ने उनके क्षेत्र में असुरक्षा का माहौल बना दिया है.

assam-map2003 में भारत सरकार और बोड़ो समुदाय के साथ हुए समझौते के बाद इन चार जिलो को मिला कर एक स्वयायत क्षेत्र का गठन किया गया था, जिसका प्रशासनिक अधिकार बोड़ोलैंड क्षेत्रीय परिषद् के हाथ में होता है. फ़िलहाल इस परिषद् पर बोड़ो पीपुल्स फ्रंट का कब्ज़ा है, जिसके नेता हग्राम मोहिलारी है. भारत सरकार के साथ हुए समझौते से पूर्व हग्राम मोहिलारी उग्रवादी संगठन बोड़ो लिबरेशन टाइगर्स के मुखिया रह चुके है फ़िलहाल यह फ्रंट असम की सरकार में भी शामिल है. असम सरकार के मंत्री सिद्दीकी अहमद ने आरोप लगाया है की इस हिंसा के लिए बोड़ो पीपुल्स फ्रंट ही जिम्मेदार है, क्योंकि फ्रंट की नेता प्रमिला रानी ने कुछ दिनों पहले ये बयान दिया था की प्रवासी मुस्लिमों ने कोकराझाड़ फ्रंट के प्रत्याशी चंदन को वोट नहीं दिया जिसके लिए प्रवासी मुस्लिमों को गंभीर नतीजे भुगतने होंगे. चंदन असम की सरकार में मंत्री है.

इन चार राज्यों में लगातार होती हिंसा के बाबजूद भविष्य में ऐसे हिंसा को रोकने के लिए समाधन निकलने की बजाय सत्ताधारी दल और विपक्ष मिल कर अपनी राजनैतिक रोटियां सकने में लगी हुई है. नरेंद्र मोदी अपने असम चुनाव प्रचार के दौरान अलग बोड़ो राज्य की मांग को सुलगा चुके है और बंगलादेशी शर्नाथियो/घुसपैठियों को वापस भेजने की बात भी कह चुके है. सत्ताधारी कांग्रेस की सरकार कोई कड़ा कदम उठा नहीं सकती क्योंकि बोड़ो पीपुल्स फ्रंट सरकार को समर्थन दे रही है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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