जिनको जेल में होना चाहिए था वह पार्लियामेंट में बैठ रहे हैं..

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दलित मतदाता का जहां तक सवाल है अब तो टोटल सोसाइटी जातिवादी वोटर्स में बदल गई है. पार्लियामेंट में लोग जातीय वोट के दम पर जीत कर आ रहे है, चाहे वह कितना बडा माफिया क्यो न हो लेकिन जाति के नाम पर उसे लोग सपोर्ट करते हैं. यह जो ट्रेंड चला है कि जिनकों जेल में होना चाहिए था वह पार्लियामेंट में बैठ रहे हैं.. डॉ. तुलसीराम

डॉ. तुलसीराम से सुभाष कुमार गौतम की बातचीत…

 

वर्तमान राजनीति में आप दलित समाज को किस रूप में देखते है? उसकी भागीदारी किस रूप में देखने को मिल रही है?

डॉ. अम्बेडकर ने जो फ्रेमवर्क राजनीतिक और सामाजिक उत्पीडन के खिलाफ तैयार किया था वह आजादी मिलने के बाद या यंू कहे कि उनके मृत्यु के बाद जो राजनीति शुरू हुई उस समय दलित कांग्रेस के साथ थे. इधर बीस पच्चीस सालों में राजनीति का चरित्र बिल्कुल बदल गया है. जब बी.पी. सिंह का उदय हुआ तो जातिविरोधी आंदोलन जातिवादी आंदोलन में बदल गया जो डॉ. अम्बेडकर के सिद्धांतों के विपरीत था. अब कोई जाति व्यवस्था का विरोध नहीं करता है अब जातिवादी राजनीति करने लगे है. हिन्दुत्ववादी शक्तियों के साथ दलित ने मोर्चा बनाया है. मायावती की शुरूआत में जो सरकार बनी वह बीजेपी या आर.एस.एस. के सहयोग से बनी थी. रामविलास पासवान ने भी बीजेपी से समझौता कर लिया, तथाकथित उदित राज भी बीजेपी ज्वाइन कर नरेन्द्र मोदी का गुणगान कर रहे है. दलित राजनीति में बहुत बडे़ पैमाने पर डेविएसन आया है.Tulsi Ram

भारतीय राजनीति में दलितों की भागीदारी के सवाल पर आपकी क्या राय है?

भागीदारी तो अवश्य होनी चाहिए लेकिन भागीदारी में और सत्ता पर कब्जा करने में जमीन आसमान का अंतर है. अम्बेडकर हमेशा भागीदारी पर जोर देते थे कि सत्ता में भागीदारी होनी चाहिए, और भागीदारी का मतलब यह नही होता कि सत्ता पर पूरा कब्जा कर लिजिए. क्यों कि असली मुक्ति का अभियान भागीदारी से है. इम्पावरमेंट भागीदारी से होगा. शिक्षा और नौकरी से इम्पावरमेंट होता है. मान लीजिए पूना पैक्ट साइन नहीं होता तो आज क्या स्थिति होती जिसका कांशीराम विरोध करते थे. उनका मानना था कि पूना पैक्ट नहीं साइन हुआ होता तो जितना अत्याचार होता उतना ही दलित क्रांति के लिए तैयार होता, कांशीराम की उग्रवादी थिंकिंग थी. यही सिद्धांत नक्सलवादियों का भी है कि मजदूरों का जितना शोषण होगा उतना ही क्रांतिकारी बनेंगे. आज तक शोषण चलता रहा मजदूर कभी भारत में क्रांतिकारी नहीं बन पाए.

वर्तमान राजनीति में जो दलित सक्रिय हैं उनका प्रतिनिधित्व किस रूप में है. क्या वे पूरे दलित समाज को रिप्रेजेंट करते हैं?

दलित नेता सबकों रिप्रेजेंट करते हैं सिवाय दलितों के. जो दलित जिस पार्टी का है उसी पार्टी की बात करता है जो दलित इंट्रेस्ट के बिल्कुल खिलाफ है जैसे-उदित राज अब हिन्दूराष्ट्र की बात कर रहा है. अठावले को देख लिजिए जो अंबेडकरवादी था आज शिवसेना के साथ है. शिवसेना की राजनीति क्या है? हिन्दूत्ववादी जाति व्यवस्था को जस्टीफाइ करना है. वह कहती है कि जाति व्यवस्था से भारत का कल्याण होगा. वर्तमान राजनीति में सक्रिय दलित सांप्रदायिक ताकतों का हाथ मजबूत कर रहे हैं. मायावती की पार्टी अलग जरूर है लेकिन वह भी हिन्दूत्ववादियों को ही बढावा दे रही है.

साहित्य में जब कोई विमर्श खड़ा होता है तो उसका असर राजनीति पर भी पड़ता है, दलित विमर्श और स्त्री विमर्श ने

राजनीति को किस रूप में प्रभावित किया?

साहित्य का राजनीति पर असर नहीं पड़ता है बल्कि राजनीति का असर साहित्य पर पड़ता है. जैसा राजनैतिक, सामाजिक वातावरण होता है साहित्य भी उसके अनूरूप विकसित होता है और इस संदर्भ में खास कर दलित साहित्य को आप देखिए की जैसे-जैसे राजनीति में मायावती का उत्थान हुआ वही ट्रेंड दलित साहित्यकारों के एक हिस्से में आया है. जैसे-जातिवादी ढ़ंग से साहित्य को क्लेम करना कि दलित साहित्य दलित ही लिख सकता है. कोई दूसरा नहीं लिख सकता है. इस उग्रवादी थिंकिंग के चलते दलित विरोधी भावना साहित्य में बड़ी तेजी से विकसित हुई है. जबकि दलित साहित्य मूलरूप से जातीय व्यवस्था विरोधी साहित्य है. जिन लोगों ने जातीय व्यवस्था स्थापित की उन्हीं वर्गों में से सबसे पहले लोगों ने विरोध भी किया. बुद्ध उनमें से सबसे पहले थे. इस देश में दलित राजनीति नाम की कोई चीज नहीं है. दलित राजनीति तभी संभव है जब उसका ओरियंटेशन जातीय, सामाजिक और धार्मिक भेदभाव के खिलाफ लड़ने के लिए हो. आज सब कुछ सत्ता पर केन्द्रित हो गया है.

पिछले दो दशकों से ज्यादा समय से देश में चली अस्मितामूलक राजनीति के खाते में कई उपलब्धियां हैं? लेकिन क्या वाकई अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में कामयाब रही है?

उपलब्धियां केवल रिकार्ड के लिए गिन सकते है. जैसे एक उपलब्धि यही है कि मायावती चार बार मुख्यमंत्री रही, दूसरे दलित नेता भी मंत्री रहें. इस उपलब्धि को मैं कोई उपलब्धि नहीं मानता. मूल चीज यह है कि समाज में परिवर्तन आया कि नहीं. दलित राजनीति का विकास जातिवादी समाज में संभव नहीं है इसलिए आज रिजर्वेशन को खत्म करने तक की मांग उठाई जा रही है और हर पार्टी में उठाई जा रही है जिसको स्पॉइल करने की कोशिश की जा रही है अगर सामाजिक आंदोलन मजबूत होता तो किसी की हिम्मत नहीं थी कि वह रिजर्वेशन का विरोध करता या दलित कल्याण का विरोध करता. दलित जिस पॉलिटिकल पार्टी में काम कर रहे है वो उस पार्टी के उसूलों को मानते है, नहीं मानते तो भी वे चुप रहते है. पार्लियामेंट के रिकार्ड को देखा जाए तो दो चार को छोड कर पांच साल बीत जाता है एक भी दलित एट्रोसिटीज या उत्पीडन के खिलाफ नहीं बोलता है. मससक्रे (कत्लेआम) हो जाता है गांव के गांव जला दिया जाता है. दूसरे लोग ही यह मुद्दा उठाते है दलित लोग कभी नहीं उठाते. अब तो गेरूआ साफा गले में बांध के दलित घूम रहे है. उदित राज पूरा बौद्धमय भारत बनाने चला था उसी नाम पर उसको पॉपूलरटी मिली और वह बदमाश घूम-घूम कर कह रहा है कि मोदी जी देश का कल्याण करेंगे. दलित राजनीति का डिजेनरेशन बडे पैमाने पर हुआ है.

राजनीति में दलित नेता और दलित मतदाता कि भूमिका क्या होती है और वह राजनीति को कैसी दिशा दे रहा है?

दलित मतदाता का जहां तक सवाल है अब तो टोटल सोसाइटी जातिवादी वोटर्स में बदल गई है. पार्लियामेंट में लोग जातीय वोट के दम पर जीत कर आ रहे है, चाहे वह कितना बडा माफिया क्यो न हो लेकिन जाति के नाम पर उसे लोग सपोर्ट करते हैं. यह जो ट्रेंड चला है कि जिनकों जेल में होना चाहिए था वह पार्लियामेंट में बैठ रहे हैं. हर जाति का आदमी अपने जाति के क्रिमिनल, मर्डररस को सपोर्ट कर रहा है. लोग जातिवादी ढंग से वोट कर रहे है, तो दो चीजें हो रही है एक तो जातिवादी राजनीति मजबूत हो रही है. भारत में जातियां हिन्दू धर्म से निकली हैं तो इससे हिन्दू धर्म भी मजबूत हो रहा है. यही कारण है कि बडे पैमाने पर अंधविश्वास भी मजबूत हो रहा है.

(दिनांक 19 अप्रैल के नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हो चुका है)

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