व्हेन सांग की यात्रा से मेरे गाँव का नाम हटवाने में राहुल गांधी और चंचल बी एच यू ने की साज़िश…

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-शेष नारायण सिंह||
चीनी यात्री व्हेन सांग ने मध्य एशिया और दक्षिण एशिया के बहुत सारे देशों की यात्रा की थी . यह भारत भी आये थे और यहाँ पर बौद्ध धर्म के बहुत सारे केन्द्रों पर जाकर समय बिताया था . जिन दिन नरेंद्र मोदी जी ने वाराणसी में पर्चा दाखिल किया, उस दिन पता चला कि व्हेन सांग कुछ दिनों के लिए नरेंद्र मोदी के गाँव वडनगर भी गए थे और वहीं विश्राम किया था . दक्षिण एशिया में व्हेन सांग की यात्राओं का विस्तृत वर्णन उपलब्ध है क्योंकि वे जहां भी गए वहां का इतिहास भूगोल उन्होंने अच्छी तरह से लिखा है . उनके यात्रा मार्ग का नक्शा किसी भी जिज्ञासु के पास मिल जायेगा.Vadnagar smriti toran 426

मध्य एशिया से चलने के बाद व्हेन सांग सिंधु नदी के किनारे आये थे . उसके बाद वे तक्षशिला गए . जहां कुछ समय बिता कर वे कश्मीर गए .वहां दो साल रहे और सन 633 ईसवी में व्हेन सांग दक्षिण की ओर चले और आज के फ़िरोज़ पुर जिले में एक बौद्ध ठिकाने पर एक साल रहे .उसके बाद वे जालंधर गए . जालंधर के बाद व्हेन सांग कुल्लू की घाटियों में बहुत समय तक रहे . कुल्लू के बाद बैरत होते हुए मेरठ पंहुचे . मेरठ से यमुना के किनारे किनारे मथुरा तक की यात्रा की . बाद गंगा जमुना के दोआब में बहुत समय तक भ्रमण करते रहे , तीर्थ यात्रा करते रहे . कन्नौज गए ,जहां सम्राट हर्षवर्धन की बौद्ध धर्म के प्रति भावना से बहुत प्रभावित हुए . कन्नौज के बाद व्हेन सांग अयोध्या गए इस इलाके का उन्होंने विषद वर्णन किया है . अयोध्या के बाद वे दक्षिण की तरफ चल पड़े और इलाहाबाद के पास कौशाम्बी पंहुचे . जहां से वे श्रावस्ती होते हुए कपिलवस्तु गए . व्हेन सांग की लुम्बिनी यात्रा में यह अंतिम पड़ाव है जहाँ व्हेन सांग ने रुक कर काफी कुछ लिखा .उसके बाद उनके श्रावस्ती जाने का उल्लेख है . बाद में लुम्बिनी जाकर उन्होंने महात्मा बुद्ध के जन्मस्थान की तीर्थयात्रा की .सन 637 ईसवी में व्हेन सांग लुम्बिनी से कुशीनगर के लिए रवाना हुए . यहीं कुशीनगर में महात्मा बुद्ध ने निर्वाण प्राप्त किया था। यहाँ से वे दक्षिण की तरफ चले और सारनाथ पंहुचे . सारनाथ में ही महात्मा बुद्ध ने अपना पहला प्रवचन किया था. . सारनाथ के पास वे वाराणसी में भी रहे और फिर वैशाली के रास्ते पटना पंहुचे थे पटना से बोध गया और नालंदा की यात्रा की और इस क्षेत्र में दो साल बिताया . यहाँ उन्होंने संस्कृत भाषा और साहित्य ,तर्कशास्त्र, व्याकरण और बौद्ध योगशास्त्र सीखा। यहां से वह दक्षिण की ओर चले गए . बाद में अमरावती और नागार्जुनकोंडा में प्रवास किया . व्हेन सांग ने पल्लव राजाओं की राजधानी कांची की यात्रा भी की . यह उन दिनों बौद्ध शक्ति का केंद्र माना जाता था .इसके बाद व्हेन सांग ने भारत से विदाई ले ली . इस तरह से हम देखते हैं कि व्हेन सांग के यात्रा के मार्ग की विस्तृत जानकारी उपलब्ध है .

व्हेन सांग के यात्रा विवरण को देख कर साफ़ लगता है कि उसमें दो ऐसे स्थानों का नाम नहीं है जहां उनके जाने के पक्के प्रमाण हैं .एक तो उनकी यात्राओं में वडनगर का ज़िक्र नहीं मिलता है जबकि मोदी जी के गाँव वालों ने उनको बता दिया था कि उनके गाँव में व्हेन सांग आये थे और कुछ समय रहे भी थे. ज़ाहिर है कि मोदी जी के इतिहासबोध को किसी तरह की चुनौती नहीं दी जा सकती . दूसरी बड़ी गलती व्हेन सांग से यह हुई है की वे मेरे गाँव की अपनी यात्रा का भी वर्णन करना भूल गए हैं . मेरे बालसखा ठाकुर बद्दू सिंह ने मुझे अभी कुछ दिन पहले बताया था कि व्हेन सांग मेरे गाँव में भी आये थे . दरअसल जब वे अयोध्या से इलाहाबाद की तरफ जा रहे थे तो उन्होंने मेरे गाँव में रात बिताने का फैसला किया था . लेकिन मेरा गाँव उन्हें इतना पसंद आ गया था कि वे यहाँ महीनों रुक गए थे . हमारे गाँव के देवका तारा में बच्चों के साथ नहाते थे , भुसुनू से दाढी बनवाते थे, कन्हई भाय के साथ नरेंदापुर तक खरहा दौडाते थे और उसका शिकार करने जाते थे , मेरे गाँव के पश्चिम तरफ जो सूखा नाला है ,वहीं दिशा फराकत के लिए जाते थे , बाबा की बाग़ में गुल्ली डंडा खेलते थे और हुनमान सिंह से कई बार पराजित भी हुए थे . जब कातिक महीने में खेत एकदम सपाट रहते हैं , रबी की फसल की बुवाई के लिए चमक रहे होते हैं तो उन खेतों में मेरे बचपन में झाबर खेली जाती थी . वहीं हमारे गाँव वालों के साथ व्हेन सांग झाबर खेला करते थे . व्हेन सांग को झाबर के खेल में महारत थी . मैंने अपनी आँखों से देखा है .जब हम लोग नागपंचमी के दिन गुडुई पीटने जाते थे तो व्हेन सांग हमारा सामान लेकर तालाब के किनारे खड़े रहते थे . मेरे गाँव के मेरे मित्रों को पक्का भरोसा है कि मेरे गाँव और वडनगर का ज़िक्र व्हेन सांग ने अपने यात्रा वृत्तान्त में ज़रूर किया होगा लेकिन राहुल गांधी और उनके लोगों ने बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी छात्र यूनियन के पूर्व अध्यक्ष चंचल के साथ साज़िश करके व्हेन सांग के यात्रा वृत्तान्त मेरे गाँव का नाम हटवा दिया होगा . यही साज़िश वडनगर के साथ भी हुयी दिखती है ..

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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