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इस गुजरात विकास माडल का हासिल क्या है..

-अशोक कुमार पाण्डेय||
आखिर इस माडल के परिणाम भी बाक़ी जगहों पर लागू नव उदारवादी नीतियों के परिणामों से अलग कैसे हो सकते थे? मेनस्ट्रीम के 16 अप्रैल 2014 को छपे एक लेख “गुजरात : अ माडल आफ डेवलपमेंट” में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कमल नयन काबरा न केवल विकास और संवृद्धि (Growth) के अंतर को साफ़ करते हुए इस कथित माडल पर सवाल खड़े करते हुए सूद के निष्कर्षों तक ही पहुँचते हैं बल्कि सीधा सवाल भी करते हैं कि “सामान तरह की नीतियों, सामान ब्यूरोक्रेसी, सामान कारपोरेट संस्कृति, नियामक संस्थाओं, निर्णयकारी संस्थाओं और समान राजनीतिक संस्कृति जिसमें कारपोरेट मानसिकता वाला व्यापारी जैसा राजनीतिक वर्ग है, एक ऐसा अलग परिणाम कैसे हासिल किया जा सकता है जिसमें आम जनता के लम्बे समय से नज़रअंदाज किये गए अधिकार, आवश्यकताएं और उम्मीदें पूरी हो सकें? गुजरात सरकार की नीतियाँ पूरी तरह से सरकार की सरपरस्ती में नव उदारवादी, बाजारोंमुख नीतियाँ ही हैं.” और इसके उदाहरण सामाजिक क्षेत्रों में बिखरे पड़े हैं. सरकारी आंकडें ही विकास के इन दुष्परिणामों को साफ़ साफ़ दिखा देते हैं. काउंटर करेंट डाट ओआरजी में 19 मार्च 2014 को छपे एक लेख “द गुजरात माडल आफ डेवेलपमेंट : व्हाट वुड इट डू टू द इन्डियन इकानामी” में रोहिणी हेंसन बताती हैं कि “गुजरात के आम लोगों ने इस आर्थिक संवृद्धि की भारी क़ीमत चुकाई है.Gujarat_Development

गुजरात ग़रीबी के उच्चतम स्तरों वाले भारतीय राज्यों में से एक है.कारपोरेटों को दिए गए ज़मीन के विशाल पट्टों से लाखों की संख्या में किसान, दलित, खेत मज़दूर, मछुआरे, चरवाहे और आदिवासी स्थापित हुए हैं. 2011 तक मोदी के शासन काल में 16000 किसानों, कामगारों और खेत मज़दूरों ने आर्थिक बदहाली के कारण ख़ुदकुशी की. अपने स्तर की प्रति व्यक्ति आय वाले राज्यों में गुजरात का मानव विकास सूचकांक सबसे निचले स्तर का है. बड़े राज्यों में नरेगा लागू करने के मामले में यह राज्य सबसे पीछे है. मुसलामानों के हालात ग़रीबी, भूखमरी, शिक्षा तथा सुरक्षा के मामलों में बहुत ख़राब हैं. कुपोषण बहुत ज्यादा है और इस बारे में शाकाहारी प्रवृत्तियों को जिम्मेदार ठहराने के मोदी के बयान को खारिज करते हुए एक प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री इसकी वजूहात अत्यंत निचले स्तर की मज़दूरी, पोषण योजनाओं का ठीक तरह से काम न करना, पेय जल वितरण की अव्यवस्था और सैनिटेशन की कमी बताते हैं (गुजरात शौचालयों के उपयोग के मामले में देश के सभी राज्यों में दसवें पायदान पर है और यहाँ की पैंसठ प्रतिशत से अधिक जनता खुले में शौच करती है जिसकी वज़ह से पीलिया, डायरिया, मलेरिया तथा अन्य ऐसे रोगों के रोगियों की संख्या बहुत ज्यादा है. अनियंत्रित प्रदूषण ने किसानों और मछुआरों की आजीविका नष्ट कर दी है और स्थानीय नागरिकों को चर्मरोग, अस्थमा, टी बी, कैंसर जैसी बीमारियाँ बड़े पैमाने पर हुई हैं.”
कुपोषण को लेकर तो ख़ुद गुजरात सरकार द्वारा दिए गए आंकड़े भयावह हैं. 5 अक्टूबर 2013 के डा हिन्दू में छपी एक खबर के अनुसार वहाँ की महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती वसुबेन त्रिवेदी ने विधानसभा में एक लिखित उत्तर में बताया प्रदेश के 14 ज़िलों में कम से कम 6.13 लाख बच्चे कुपोषित या अत्यंत कुपोषित थे जबकि 12 ज़िलों के लिए यह आंकड़ा उपलब्ध नहीं था. आश्चर्यजनक रूप से प्रदेश के वाणिज्यिक केंद्र अहमदाबाद में 54,975 बच्चे कुपोषित तथा 3,8600 बच्चे अत्यन कुपोषित थे. इस तरह कुल कुपोषित बच्चों की संख्या (लगभग 85,000) वहां प्रदेश में सर्वाधिक थी. बनासकांठा और साबरकांठा जैसे आदिवासी इलाकों में भी यह संख्या क्रमशः 78,421 और 73,384 थी. सी ए जी की रपट के अनुसार “2007 और 2012 के बीच लक्षित बच्चों को सप्लीमेंट्री पोषण देने के सरकारी दावों के बावजूद मार्च 2012 की मासिक प्रगति रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश का हर तीसरा बच्चा सामान्य से कम वज़न का था.” इसी रिपोर्ट के अनुसार “राज्य में आवश्यक 75,480 आंगनवाड़ी केन्द्रों की जगह केवल 52,137 आंगनवाड़ी केंद्र संस्तुत किये गए और उनमें से भी केवल 50,225 काम कर रहे हैं. परिणामस्वरूप एकीकृत बाल विकास योजना के लाभों से 1.87 करोड़ बच्चे वंचित हो गए हैं.” जबकि 2012 की राज्यवार रिपोर्ट में यूनिसेफ ने बताया कि “पाँच साल से कम उम्र का गुजरात का लगभग हर दूसरा बच्चा सामान्य से कम वज़न का है और हर चार में से तीन को खून की कमी है. पिछले दशक में नवजात मृत्यु दर तथा प्रजनन के समय की मृत्यु दरों में कमी की दर बहुत धीमी है. गुजरात में हर तीसरी माँ भयावह कुपोषण की समस्या से जूझ रही है…बच्चों के स्वास्थ्य की समस्या बाल विवाहों की बड़ी संख्या से और विकट हो गयी है. गुजरात बाल विवाहों की संख्या के ज्ञात आंकड़ों के मद्देनज़र देश का चौथा राज्य है. 2001 और 2011 के बीच गुजरात के सेक्स रेशियो में भी कमी आई है. सेव द चिल्ड्रेन की रिपोर्ट में भी इन बातों की पुष्टि होती है. इसके अनुसार गुजरात का कैलोरी उपभोग राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है. ग्रामीण इलाकों में तो यह उड़ीसा, जम्मू कश्मीर, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मिजोरम से भी नीचे 18वें स्थान पर है. यह रिपोर्ट एक और महत्त्वपूर्ण तथ्य सामने लाती है कि आर्थिक गैरबराबरी के मामले में गुजरात देश में अन्य राज्यों से काफ़ी आगे है. यहाँ अमीर और ग़रीब के बीच की खाई पिछले दस वर्षों में सबसे तेज़ी से बढ़ी है.
शिक्षा के मामले में भी हालात बदतर हुए हैं. यू एन डी पी की एक रपट के अनुसार बच्चों को स्कूल में रोकने के मामले में गुजरात का नम्बर देश के सभी राज्यों में 18 वाँ है. साक्षरता दर के मामले में बड़े राज्यों में यह सातवें नंबर पर है और 1997-98 से 2012-13 के बीच इसकी स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में बदतर हुई है. रिपोर्ट में वहां के शिक्षा के स्तर पर चिंता प्रकट करते हुए उसे बेहतर बनाने की अनुशंषा भी की गयी है. (देखें, मिराज़ आफ डेवलपमेंट, फ्रंटलाइन, 20 फरवरी, 2013) गुजरात सड़कों तथा सिंचाई पर प्रति व्यक्ति खर्च के मामले में तो सबसे ऊपर है लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्च के मामले में इसका नम्बर छठां है. 6-14 साल के आयुवर्ग के बच्चों के बीच शिक्षा में दलित, आदिवासी, महिलाओं तथा आदिवासियों की भागीदारी राष्ट्रीय औसत से कम है और अपने स्तर के आय वाले राज्यों से यह काफी पीछे है. लेकिन सरकार इस मद में अपना खर्च बढाकर शिक्षा का स्तर सुधारने और इन संस्थाओं को बेहतर बनाने की जगह निजी शिक्षा संस्थानों को बढ़ावा देने में लगी है. जनवरी 2013 की वाइब्रेंट गुजरात समिट में यह स्पष्ट था जब नरेंद्र मोदी ने दुनिया भर के निजी विश्वविद्यालयों के बीच भागीदारी के लिए एक फोरम बनाने का प्रस्ताव दिया. हालांकि मोदी के शासनकाल में राष्ट्रीय औसत की तुलना में गुजरात में शिक्षा में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ी है लेकिन खासतौर पर ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में सरकारी अनुदान प्राप्त तथा सरकारी और स्थानीय निकायों द्वारा संचालित विद्यालयों पर लोगों की निर्भरता कम होने की जगह बढ़ी है, जो इस बात का सूचक है कि मंहगे निजी स्कूल लोगों की पहुँच से बाहर हैं और शिक्षा के स्तर को बढ़ा पाने में इनकी भूमिका प्रभावी नहीं हो पा रही.
इन सामाजिक सूचकों से इतर अगर शुद्ध आर्थिक पहलुओं को देखें तो भी इस मिथक की कोई सुन्दर तस्वीर नहीं दिखती. ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या में कमी के मामले में एन एस एस ओ की रिपोर्ट के अनुसार 2004 और 2012 के बीच में ग़रीबी में सबसे ज़्यादा कमी उड़ीसा में आई (20.2 {09002dbf131a3dd638c766bc67f289d0640033338bee1ac2eb3568ad7ccae38d}) और सबसे कम गुजरात में (8.6{09002dbf131a3dd638c766bc67f289d0640033338bee1ac2eb3568ad7ccae38d}). रोज़गार के मामले तो हालात बेहद खराब हैं. एन एस एस ओ के ही आंकड़े बताते हैं कि पिछले बारह सालों में रोज़गार में वृद्धि की दर लगभग शून्य तक पहुँच गयी है. ग्रामीण क्षेत्र में संवृद्धि के बावजूद रोज़गार में बढ़ोत्तरी नहीं हुई है. जिस तरह की कृषि भूमि की बिक्री और खरीद की नीतियाँ बनाई गयीं हैं, छोटे और मध्यम किसान अपने खेत लगातार बेच रहे हैं. बदहाली के शिकार इस वर्ग को तुरत पैसे तो मिल जा रहे हैं लेकिन इससे रोजगारहीन लोगों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है. ग्रामीण क्षेत्रों में स्पेशल इकान्मिक जोंस वगैरह बनने से जिस तरह की नौकरियां सृजित हो रही हैं, वे स्थानीय लोगों के अनुरूप नहीं हैं.
विकास के इस मिथक के प्रचार में किस तरह जान बूझकर मीडिया वाम द्वारा शासित राज्यों को नज़रंदाज़ करती है इसका एक उदाहरण हाल में आई नॅशनल सैम्पल सर्वे आफिस की रिपोर्ट से मिलता है. इसको अगर देखें तो 2004 से 2011 के बीच मैनुफेक्चरिंग क्षेत्र में सबसे ज्यादा नौकरियों का सृजन पश्चिम बंगाल के उस वाम शासनकाल में हुआ जिसे बदनाम करने के लिए मीडिया और उसके चम्पू अर्थशास्त्री पूरा जोर लगा देते हैं. इस मामले में न केवल गुजरात उससे पीछे रहा बल्कि महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्य भी. मध्य प्रदेश और उड़ीसा जैसे राज्यों में तो इस दौर में ऋणात्मक वृद्धि पाई गयी. लेकिन मीडिया के निशाने पर हमेशा ही वाम की “असफलता” रही. (देखें, द हिन्दू, पेज 12, 26 अप्रैल, 2014)
अन्य सूचकों की बात की जाय तो 2012 में भारत के अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों में गुजरात के डिपाजिट्स की हिस्सेदारी थी 4.8 प्रतिशत जो आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र से कम थी. इन बैंकों द्वारा दिए गए कुल ऋणों में गुजरात की भागीदारी 4.4{09002dbf131a3dd638c766bc67f289d0640033338bee1ac2eb3568ad7ccae38d} थी जो फिर महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु से कम थी. इन बैंकों में/से गुजरात की प्रति व्यक्ति जमा और प्रति व्यक्ति ऋण तमिलनाडू, कर्नाटक, महाराष्ट्र और यहाँ तक कि केरला से भी कम थी. ज़ाहिर है जब राज्य पूँजी एकत्रण में पीछे रहा तो ग़रीबी दूर करने में आगे कैसे रह सकता था? 2011 में प्रति व्यक्ति आय के मामले में यह पांचवें नंबर पर रहा तो 2004 से 2009 के दौर में औद्योगिक विकास के मामले में छठवें स्थान पर.
सबसे चौंकाने वाले आंकड़े तो उस प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के है जिसका सबसे ज्यादा शोर मचाया जाता है. ‘निवेशक अनुरूप राज्य’ के अपने गलाफाड़ शोर के बावजूद इस क्षेत्र में भी उपलब्धि उतनी नहीं जितनी दिखाई जाती है. हर दो साल पर होने वाली बहु प्रचारित “वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल निवेशक समिट” भी अपनी चमक खोती जा रही है. 2003 में जहां हस्ताक्षर किये गए एम ओ यूज में से 73{09002dbf131a3dd638c766bc67f289d0640033338bee1ac2eb3568ad7ccae38d} ज़मीन पर उतारे जा सके वहीँ 2011 आते आते कुल समझौतों में से केवल 13{09002dbf131a3dd638c766bc67f289d0640033338bee1ac2eb3568ad7ccae38d} ही कारगर हो सके. इस मामले में अन्य राज्यों की तुलना में उसकी उपलब्धि कोई बेहतर नहीं रही. 2006 से 2010 के बीच गुजरात ने 5.35 लाख करोड़ के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के समझौतों पर हस्ताक्षर किया तो उनसे 6.47 लाख नए रोजगारों की उम्मीद जताई गयी, इसी दौर में महाराष्ट्र और तमिलनाडु ने समझौते तो क्रमशः 4.2 लाख करोड़ और 1.63 लाख करोड़ के ही किये लेकिन इनमें क्रमशः 8.63 और 13.09 लाख नौकरियों की क्षमता बताई गयी.

(अशोक कुमार पाण्डेय की फेसबुक वाल से)

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