Home देश मुलायम के बयान का मर्म मुस्लिम तुष्टिकरण ही है…

मुलायम के बयान का मर्म मुस्लिम तुष्टिकरण ही है…

-कुमारेन्द्र सिंह सेंगर||

नेताओं की बदजुबानी हमेशा से चर्चा का विषय और विवाद की जड़ बनती रही है और विद्रपता ये कि इस बदजुबानी में बहुतायत में महिलाओं को निशाना बनाया जाता रहा है. कभी पुरानी बीवी के मजा न देने का बयान, तो कभी टंच माल का बखेड़ा. इधर हालिया चुनावी मौसम में भी कई नेता भटके और बिखरे. दिल्ली के क्षणिक मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर बारम्बार भगोड़ा का आरोप लगता रहा तो वे खिसियाहट में किसी की बेटी तो नहीं भगाई है का बयान दे बैठे. इधर सपा मुखिया mulayam singh मुस्लिम युवाओं की पैरवी करते-करते बलात्कारियों को फाँसी से बचाते-बचाते बलात्कारियों का समर्थन तक कर बैठे तो उन्हीं की पार्टी के एक और नेता अबू आज़मी अपने मुखिया के सुर में सुर मिलाते हुए एक कदम आगे निकल गए. उन्होंने तो सहमति से सेक्स के लिए महिलाओं तक को फाँसी पर लटकाने की वकालत कर डाली. और भी नेतागण ऐसे रहे हैं, जिन्होंने अपने विवादित बयानों से राजनैतिक मर्यादाओं को, सामाजिकता को, नैतिकता को तार-तार किया है किन्तु बाकी सबकी चर्चा के इतर सपा मुखिया मुलायम सिंह का बयान पर बहस इसलिए महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि उनके बयान में एकसाथ कई सामाजिक पहलू जुड़ जाते हैं.

मुलायम सिंह का बयान एकसाथ महिलाओं, पुरुषों, मुस्लिमों, युवाओं, बलात्कार, बलात्कारियों, उनकी सजा, कानून आदि को समाहित किये है. मुलायम सिंह अपने बयान में बलात्कार की सजा के रूप में फाँसी न देने की बात करते हैं; लड़के-लड़कियों की दोस्ती होने फिर टूट जाने पर लड़की द्वारा रेप का आरोप लगाने की बात करते हैं; लड़कों से गलती होने की बात करते हैं; मुम्बई के तीन लड़कों को फाँसी की सजा होने की बात करते हैं. यदि मुलायम सिंह के बयान का सन्दर्भ लिया जाये तो एक बात स्पष्ट होती है कि उन्हें बलात्कारियों को फाँसी देने में तकलीफ है; उन्हें लड़कों को आरोपी बनाये जाने में तकलीफ है; कानून के गलत होने का दर्द है. हो सकता है कि एकाधिक मामलों में लड़कों को गलत तरीके से फँसा दिया जाता हो, जैसा कि आजकल दहेज़ निरोधक कानून में हो रहा है, किन्तु सभी मामलों में ऐसा होता हो ये सही नहीं. मुलायम सिंह के बयान का एक पहलू ये भी है कि वे इसे उत्तर प्रदेश की एक रैली में देते हैं. उनके इस बयान के पीछे का सार कहीं न कहीं उस मुस्लिम वर्ग को, उस मुस्लिम युवा वर्ग को अपनी ओर आकर्षित करना है जो सपा से छिटकता सा दिख रहा है. यदि मुलायम सिंह को फाँसी की सजा से एतराज होता तो वे सिर्फ उसी को आधार बनाते; यदि लड़कों को जबरन फँसाने का दर्द होता तो वे सिर्फ उसी को अपने बयान का केंद्र-बिंदु बनाते, किन्तु ऐसा कुछ हुआ नहीं और हाँ, बलात्कार होने पर तो उन्हें कोई पीढ़ा का अनुभव हुआ ही नहीं. यदि उन्हें दर्द था तो मुम्बई शक्ति मिल रेप मामले के आरोपियों (जिसमें मुस्लिम भी है) को हुई फाँसी की सजा पर और इसी को आधार बनाकर वे बाकी विवाद खड़ा कर गए.

यहाँ समझने वाली बात है कि सपा की पूरी राजनीति मुसलमानों को केंद्र में रखकर होती रही है और आज भी हो रही है. देखा जाये तो मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को अयोध्या में मंदिर न बनने देने, बाबरी मस्जिद का निर्माण करा देने के सपने दिखा-दिखा कर वोट लेते रहे किन्तु लगभग दो वर्ष पूर्व के उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा राम जन्मभूमि परिसर पर दिए फैसले, जिसमें उक्त भूमि को जन्मभूमि से जुड़े लोगों की बताया गया, के बाद मुलायम सिंह के पास अयोध्या, बाबरी मस्जिद के नाम पर मुस्लिमों को भरमाने का, उन्हें अपने हक़ में खड़ा करने का कोई अस्त्र नहीं बचा था. ऐसे में कभी शहीदों को मुस्लिम बताकर, कभी अर्थव्यवस्था में उनका सर्वाधिक योगदान बताकर वोट लेने का जुगाड़ किया जा रहा है. मुलायम का विवादित बयान भी उसी श्रंखला की एक कड़ी है, जिसके सहारे मुस्लिमों को, मुस्लिम युवाओं को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया गया है.

मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिशें होनी चाहिए, युवाओं के संरक्षण-संवर्धन की बात होनी चाहिए, कानूनों में बदलाव की बात होनी चाहिए, लचर कानूनों को समाप्त करने या उनमें सुधार करने की बात होनी चाहिए पर इसका अर्थ सिर्फ तुष्टिकरण से नहीं लगाया जाना चाहिए; इसके लिए उस पीढ़ा को नहीं भुला दिया जाना चाहिए जो एक महिला भोगती है; उन परिस्थितियों को नहीं भुलाना चाहिए जो दिन-प्रति-दिन महिला-विरोधी होती जा रही हैं; उस कुत्सित मानसिकता को नहीं विस्मृत किया जाना चाहिए जो प्रत्येक महिला को बाजारू समझती है; ऐसे विकृत लोगों को नहीं भूलना चाहिए जो किसी भी आयु-वर्ग की महिला को सिर्फ अपनी वासना का शिकार बना लेना चाहते हैं; लेकिन मुलायम सिंह यादव ने ऐसा ही किया. उन्होंने सबको विस्मृत करते हुए सिर्फ और सिर्फ ये याद रखा कि बलात्कार की सजा फाँसी नहीं होनी चाहिए; उन्होंने सिर्फ ये याद रखा कि लड़कों से गलतियाँ हो जाती हैं; उनको ये याद रहा कि मुम्बई रेप काण्ड में आरोपियों को फाँसी हुई है लेकिन उन्होंने याद नहीं रखा कि आज बच्चियाँ भी सुरक्षित नहीं हैं; उनको याद नहीं आया कि हैवान वृद्ध महिलाओं को भी अपनी हवस का शिकार बना रहे हैं; उन्होंने याद करने की कोशिश नहीं की कि इसी उत्तर प्रदेश में घर में घुसकर महिलाओं के साथ बलात्कार किये जा रहे हैं; उनको याद नहीं रहा कि दिल्ली रेप केस में क्या हुआ था. दरअसल उन्हें कुछ याद नहीं है या फिर वे कुछ और याद करना भी नहीं चाहते. उन्हें सिर्फ याद है अपना प्रधानमंत्री न बन पाना; उन्हें बार-बार याद आता है कारसेवकों पर गोलियां चलवाना; उन्हें याद आता है किसी भी तरह से मुसलमानों का वोट-बैंक अपनी तरफ कर लेना; उन्हें याद रहता है चुनाव आयोग द्वारा आज़म खान को प्रतिबंधित करना. इसी सबको याद करते हुए वे लड़कों से गलती हो जाने की मासूमियत बयान करते हैं; इसी को याद करते हुए वे फाँसी की सजा को समाप्त करने की बात करते हैं; इसी को याद करते हुए खुद को प्रधानमंत्री बनाये जाने की अपील करते हैं; इसी को याद करते हुए अपने एक-एक आदमी को आज़म खान बन जाने की धमकी तक देते हैं. वे सब कहते हैं, सब याद रखते हैं; कन्या विद्या धन वितरित करते हैं पर कन्याओं की सुरक्षा को नजरंदाज़ करते हैं; महिलाओं का सपा में सर्वाधिक सम्मान होने की बात करते हैं पर उनके लिए सुरक्षित माहौल बना पाने में असमर्थ रहते हैं; खुद को प्रधानमंत्री बनाये जाने की गुहार लगाते हैं किन्तु देश की रक्षा कर रहे सैनिकों को हिन्दू-मुस्लिम में बाँटना चाहते हैं. सिर्फ मुस्लिम वोट-बैंक की खातिर, मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए दिए गए इस तरह के बयान से विकृत मानसिकता वीभत्स होकर सामने आएगी, आपराधिक प्रवृत्ति और हैवानियत के साथ अपराध करेगी. सत्यता का निर्धारण अब सभ्य माने जाने वाले समाज को करना, उसका मर्म समझना होगा.

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