खुद बेसहारा मगर दूसरों को दे रहे सहारा..

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निःशुल्क बेसहारा बच्चों को पढ़ाना, झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले बच्चों को शिक्षित करना, जहां जगह मिली वहां क्लास लगाना, बच्चों को पढ़ाने के लिए हर रोज साइकिल से लम्बी दूरी तय करना, टॉफी खिलौने व कापी किताब देकर बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करना. वह सब बगैर छत के नीचे रात में गुजारने वाले आदित्य कुमार के जीवन में शुमार हो गया.10

हर रोज तड़के घर से निकलना आदित्य कुमार को साइकिल वाले गुरू जी या फिर साइकिल पाठशाला के नाम से पहचान है. उनकी पाठशाला में न तो कोई फीस लगती, न ही किसी यूनीफार्म की जरूरत पड़ती है. हर रोज वह निर्धारित समय पर क्लास लगाने पहुँच जाते है. बच्चे भी उन्हें देखकर क्लास में पहुँच जाते वर्तमान समय में राजधानी के पांच स्थानो पर मलिन बस्तियों में अपनी कक्षायें लगातेे हैं. साइकिल वाले गुरू जी के पहुँचते ही सुबह 7 बजे कुड़ियाघाट, 10 बजे डालीगंज, 12 बजे जानकीपुरम, 3 बजे बिनायकपुरम, शाम 5 बजे बालू अड्डा पर पढ़ने वाले बच्चों का मजमा लग जाता. आदित्य कुमार का उद्देश्य बच्चों की छुपी प्रतिभा को तराशना व उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है. उन्होंने जीवनपर्यन्त गरीब व बेसहारा बच्चों को शिक्षा देने की ठान ली है. बाकी बच्चे जीवन को आदर्शो के साथ जीने की तम्मन्ना है.

करीब 25 सौ बच्चों को मुफ्त शिक्षा दे चुके आदित्य को गुरेज नहीं कि रात कहाँ बीतेगी और दिन कहाँ. कब खाना मिलेगा, कब सोना होगा. जहाँ जगह मिलती वहाँ रात गुजार देते. उन्हें इस बात की मलाल है कि हर कोई अपने-अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर चिंतित रहते लेकिन बेसहारा बच्चों की शिक्षा को लेकर कोई चिंतित नहीं रहता.

बेसहारा व गरीब बच्चों को शिक्षा देना आदित्य का कर्तव्य बन गया है. उन्होंने अपनी साइकिल में बोर्ड लगाये है. जिससे हर किसी की नजर उस दिशा में पड़ सके. 20 सालों से गरीब व बेसहारा बच्चों को साक्षर बना रहे है. बच्चों को कॉपी किताब, पेन-पेंशल व अन्य स्टेशनरी स्वयं उपलब्ध कराते हैं. ग्रेजुएट आदित्य ने अपना आधा जीवन संघर्ष करते बिताया और आगे भी उनका जीवन संघर्ष में बीतेगा.

प्रदेश सरकार से कई बार गुहार लगाने के बावजूद किसी प्रकार की राहत नहीं मिल पायी. अब तक उनके शिक्षित किये हुए दर्जनों लोग न्यायिक सेवा से लेकर प्राइवेट सेक्टर में अच्छे आहोदे पर कार्य कर रहे है. कई बार शिक्षा विभाग अधिकारियों से बात होती है तो सराहना की जाती है. लेकिन आला अधिकारी सहयोग के नाम पर चुप्पी साध जाते है. इस सराहनीय कार्य के लिए लिम्का बुक की तरफ से एक पत्र भी आया है. लेकिन अधिकारियों का सहयोग न मिलने के कारण वे उपेक्षित है. जीवन पर्यन्त बेसहारा गरीब बच्चों को शिक्षा देने का उद्देश्य लेकर चल रहे आदित्य कुमार अब धन के अभाव में साइकिल रूपी पाठशाला में काफी रूकावटें आ रही हैं. आदित्य से सम्पर्क 9305744452 कर सकते है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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