Home देश कहीं सोच बूढ़ी न हो जाए…

कहीं सोच बूढ़ी न हो जाए…

-सतीश मिश्र||

2014 के आम चुनावों में कुछ और पता चला हो या नहीं, लेकिन एक बात तो साफ है. देश की आबादी में 65{09002dbf131a3dd638c766bc67f289d0640033338bee1ac2eb3568ad7ccae38d} तक की उपस्थिति होने के बावजूद 35 साल से कम के युवा वर्ग में भटकाव, दिग्भ्रम, वैचारिक व चारित्रिक उलझन के साथ-साथ चिंतन की ‘कट-पेस्ट’ प्रवृत्ति अजीब-सा विरोधाभास पैदा कर रही है. खुद को पढ़ा-लिखा, समझदार, जागरूक, बौद्धिक होने का दावा करने वाले मिडिल क्लास युवाओं की भेड़चाल मानसिकता, हिंसक प्रवृत्ति और असामाजिकता देखने के बाद दिमाग में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या देश की युवा जनसंख्या परिपक्व फैसले लेने के काबिल बन गई है? क्या वह देश चलाने के लिए तैयार है? आज ‘आप’ के घोषणापत्र में चुनाव लड़ने की उम्र 25 से घटाकर 21 करने की बात ने बरबस ही कई ऐसे प्रश्न खड़े कर दिए हैं जिसका दूर-दूर तक कोई जवाब नहीं मिल रहा.AAP_MANIFESTO_RELE_1658872f

युवाशक्ति के सहारे दुनिया में कई बार नई इबारतें लिखी जा चुकी हैं. क्रांतियां हुईं. कई बार सत्ता परिवर्तन हुए. लेकिन उनमें सक्षम और जागरूक नेतृत्व था जो बाद में मील का पत्थर बना. उनमें कोई भी केजरी जैसा रणछोड़दास नहीं था. जब सेनापति अपने पीछे चलने वाली सेना को मोर्चे तक ले जाने के बाद खुद भाग खड़ा हो तो उससे बड़ी त्रासदी और कुछ नहीं हो सकती. यह भारत का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि यहां किसी युवा ने अपनी नेतृत्व क्षमता के बूते देश को अपने पीछे होने को विवश किया हो. ऐसा कभी नहीं हुआ. कुछ आए जरूर लेकिन उनमें समर्पण, प्रतिबद्धता और फौलादी इरादों का अकाल था.

लकड़ी के सहारे कमर झुकाए चल रहे गांधी व जयप्रकाश नारायण की छवि को पीछे धकेलकर चंद्रशेखर ने जब कांग्रेस में रहकर उसकी वैचारिक सोच बदलने की बात कहते हुए इंदिराजी से पंगा लिया था तब देश के युवा चिंतन में झंकार आई थी. लेकिन इसके बाद क्या हुआ, कुछ भी नहीं. युवा सोच को समर्थन न मिला तो वह सोच ही बूढ़ी हो गई. यह कहने में मुझे तनिक भी संकोच नहीं कि इसके बाद सीधे केजरीवाल ही थे जिन्होंने देश की युवा सोच से थोड़ी तारतम्यता बिठाई. यह बात और है कि युवा ब्रैकेट में न होने के बावजूद यूथ ब्रिगेड के उसी वर्ग को उन्होंने टारगेट किया और अपने विमान के टेकऑफ के लिए ‘निर्भया’ नामक रनवे का बखूबी इस्तेमाल किया. अन्ना के बूढ़े कंधों पर सवार होकर आगे बढ़ने के बाद उन्हें खुद समझ में नहीं आ रहा था कि प्लेन आसमान में कैसे पहुंचाया जाए. ऐसे में, उन्हें बूस्टर मिला ‘निर्भया’ के बलिदान का और उन्होंने युवा वर्ग में आई इन्हीं हिलोरों को जमकर भुनाया. लेकिन आज उनका विमान हिचकोले लेकर जमींदोज हो चुका है. पिछले दो महीने से ‘आप’ और केजरी के लोकप्रियता ग्राफ में आई अलार्मिंग गिरावट और उसकी बदौलत युवा वर्ग में ‘इस देश का कुछ नहीं हो सकता’ की हताशा वाली भावना ने सबसे ज्यादा नुकसान किया है.

इसमें यह प्रश्न उठता है कि क्या देश का युवा मतदाता सोशल मीडिया, टीवी, एफएम रेडियो, अखबार, वेबसाइट, एसएमएस के सहारे युवा वर्ग पर हो रहे वैचारिक हमले को झेल पाएगा? अबकी बार किसकी सरकार हो या किसकी काज-क्रांति हो, क्या युवा वर्ग यह बताने की स्थिति में है? कतई नहीं. भयाक्रांत होकर वह दिग्भ्रमित हो चुका है और धर्मान्धता के बिजनसमन्स के लिए यही सही खेती होती है. वास्तव में तो धर्मान्धता का जुनून दुनिया के हर कोने को ग्रसित कर चुका है. कोसोवो और बोस्निया से लेकर मुजफ्फरनगर तक हर समस्या को इसी चश्मे से देखा जाना ही इस समय सबसे बड़ी समस्या है.

एक उदाहरण वाराणसी का ही लें. यहां उधार के सिंदूर बने ‘नमो’ बनारस को वापी (गुजरात का औद्योगिक शहर) बनाने की बात नहीं करते बल्कि ‘ज्ञानवापी’ पर आर-पार कर देने का आश्वासन देते हैं और युवा उसी पर ताली बजाते गाफिल हैं.

चलते-चलते
भई ये तो मानना ही पड़ेगा कि समय बदल गया है वरना वो भी वक़्त था जब एक पोस्टर पर दूसरा पोस्टर लगाना हक़ हुआ करता था और आज वही इतना बड़ा अपराध कि बड़ौदा में मधुसूदन मिस्त्री जेल में हैं.

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